Section 59 Negotiable Instruments Act, 1881


Section 59 Negotiable Instruments Act, 1881 in Hindi and English 

Section 59 Negotiable Instruments Act, 1881 :The holder of a negotiable instrument, who has acquired it after dishonour, whether by nonacceptance or non-payment, with notice thereof, or after maturity, has only, as against the other parties, the rights thereon of his transferor.

Accommodation note or bill — Provided that any person who, in good faith and for consideration, becomes the holder, after maturity, of a promissory note or bill of exchange made, drawn or accepted without consideration, for the purpose of enabling some party thereto to raise money thereon, may recover the amount of the note or bill from any prior party:


The acceptor of a bill of exchange. when he accepted it, deposited with the drawer certain goods as a collateral security for the payment of the bill, with power to the drawer to sell the goods and apply the proceeds in discharge of the bill if it were not paid at maturity. The bill not having been paid at maturity, the drawer sold the goods and retained the proceeds, but indorsed the bill to A. A's title is subject to the same objection as the drawer is title.

Supreme Court of India Important Judgments And Case Law Related to Section 59 of Negotiable Instruments Act, 1881 :

Kumaran vs State Of Kerala And Anr on 5 May, 2017

परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा 59 का विवरण :  - परक्राम्य लिखत के उस धारक को जिसने उसे अप्रतिग्रहण या असंदाय द्वारा उसके अनादर के पश्चात् उसकी सूचना सहित या परिपक्वता के पश्चात् अर्जित किया है, उस पर अन्य पक्षकारों के विरुद्ध केवल वे ही अधिकार प्राप्त हैं जो उसके अंतरक के थे ।

सौकर्य पत्र या विपत्र -- परन्तु जो कोई भी व्यक्ति सद्भावपूर्वक और प्रतिफलार्थ किसी ऐसे वचनपत्र या विनिमय-पत्र का धारक उनकी परिपक्वता के पश्चात् हो जाता है जो प्रतिफल के बिना इस प्रयोजन से रचा, लिखा या प्रतिगृहीत किया गया था कि उसका कोई पक्षकार उसके आधार पर धन ले सकने के लिए समर्थ हो जाए वह किसी भी पूर्विक पक्षकार से उस वचन-पत्र या विनिमय-पत्र की रकम वसूल कर सकेगा ।

एक विनिमय-पत्र के प्रतिगृहीता ने उस समय, जबकि उसने उसे प्रतिगृहीत किया था, लेखीवाल के पास कुछ माल उस विनिमय -पत्र के संदाय के लिए साम्पाश्र्विक प्रतिभूति के रूप में लेखीवाल को यह शक्ति देकर निक्षिप्त कर दिया था कि यदि उस विनिमय-पत्र की परिपक्वता पर विनिमय-पत्र का संदाय न किया जाए, तो वह माल को बेच दे और उसके आगमों को विनिमय-पत्र के चुकाने में लगा दे । परिपक्वता पर विनिमयपत्र का संदाय न किए जाने पर लेखीवाल ने माल को बेच दिया और आगमों को प्रतिधृत कर लिया किन्तु विनिमय–पत्र क को पृष्ठांकित कर दिया । क का हक उसी आक्षेप के अध्यधीन है, जिसके अध्यधीन लेखीवाल का हक है ।

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