Section 137 The Army Act, 1950

 

Section 137 The Army Act, 1950 in Hindi and English 



Section 137 The Army Act, 1950  :Commissions for examination of withness.

(1) Whenever, in the course of a trial by court- martial, it appears to the Court that the examination of a witness is necessary for the ends of justice, and that the attendance of such witness cannot be procured without an amount of delay, expense or inconvenience which, in the circumstances of the case, would be unreasonable, such Court may address the Judge Advocate General in order that a commission to take the evidence of such witness may be issued.

(2) The Judge Advocate General may then, if he thinks necessary, issue a commission to any district magistrate or magistrate of the first class, within the local limits of whose jurisdiction such witness resides, to take the evidence of such witness.

(3) The magistrate or officer to whom the commission is issued, or, if he is the district magistrate, he or such magistrate of the first class as he appoints in this behalf, shall proceed to the place where the witness is or shall summon the witness before him and shall take down his evidence in the same manner, and may for this purpose exercise the same powers, as in trials of warrant- cases under the 2 code of Criminal Procedure, 1973 ] (2 of 1974 .) on any corresponding law in force in 1 the State of Jammu and Kashmir].

(4) When the witness resides in a tribal area or in any place outside India, the commission may be issued in the manner specified in 2 Chapter XXII of the Code of Criminal Procedure, 1973 ] (2 of 1974 .) or of any corresponding law om force in 1 the State of Jammu and Kashmir].

(5) In this and the next succeeding section, the expression" Judge Advocate General" includes a Deputy Judge Advocate General.



Supreme Court of India Important Judgments And Case Law Related to Section 137 of The Army Act, 1950  :



सेना अधिनियम, 1950 की धारा 35 का विवरण :  - साक्षियों की परीक्षा के लिए कमीशन – (1) जब कभी सेना-न्यायालय द्वारा किए जा रहे विचारण के अनुक्रम में, न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि न्याय के उद्देश्यों के लिए यह आवश्यक है कि साक्षी की परीक्षा की जाए और ऐसे साक्षी की हाजिरी इतने विलम्ब, व्यय या असुविधा के बिना, जितना मामले की परिस्थितियों में अनुचित होगा, नहीं कराई जा सकती है, तब ऐसा न्यायालय जज-एडवोकेट जनरल को इस वास्ते संबोधित कर सकेगा कि उस साक्षी का साक्ष्य लेने के लिए कमीशन निकाला जाए।

(2) यदि जज-एडवोकेट जनरल तब यदि आवश्यक समझे, तो वह साक्षी का साक्ष्य लेने के लिए किसी ऐसे जिला मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट के नाम, जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के अन्दर वह साक्षी निवास करता है, कमीशन निकाल सकेगा।

(3) वह मजिस्ट्रेट या आफिसर जिसके नाम कमीशन निकाला गया है या यदि वह जिला मजिस्ट्रेट है, तो वह या ऐसा प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट जो उसने इस निमित्त नियुक्त किया है, उस स्थान को जाएगा जहां साक्षी है, या साक्षी को अपने समक्ष आने के लिए समन करेगा और उसी रीति से उसका साक्ष्य लिखेगा, और इस प्रयोजन के लिए उन्हीं शक्तियों का प्रयोग कर सकेगा जो दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के या [जम्मू-कश्मीर राज्य] में प्रवृत्त तत्समान विधि के अधीन वारंट मामलों के विचारणों के लिए है।

(4) जबकि साक्षी किसी जनजाति क्षेत्र में या भारत के बाहर किसी स्थान में निवास करता है, तब कमीशन उस रीति में निकाला जा सकेगा जो दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के अध्याय 22 या जम्मू-कश्मीर राज्य में प्रवृत्त किसी तत्समान विधि में विनिर्दिष्ट है।

(5) इस और निकट आगामी धारा में, जज-एडवोकेट जनरल के अन्तर्गत डिप्टी एडवोकेट जनरल आता है।



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