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Important Characteristics of Constitution of India in Hindi

भारत के संविधान की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। Explain the various characteristics of the Constitution of India? भारत का संविधान एक पवित्र दस्तावेज है इसमें विश्व के प्रमुख संविधान ओं की विशेषताएं समाहित हैं यह संविधान निर्मात्री सभा के 2 वर्ष 11 माह 18 दिन के सतत प्रयत्न, अध्ययन विचार, विमर्श चिंतन एवं परिश्रम का निचोड़ है इसे 26 जनवरी 1950 को संपूर्ण भारत पर लागू किया गया। भारत के संविधान की प्रमुख विशेषताएं निम्नांकित हैं-
1. विशालतम संविधान- सामान्यतया संविधान का आकार अत्यंत छोटा होता है संविधान में मोटी मोटी बातों का उल्लेख कर दिया जाता है और अन्य बातें  अर्थान्वयन के लिए छोड़ दी जाती हैं लेकिन भारत का संविधान इसका अपवाद है भारत के संविधान का आकार ने तो अत्यधिक छोटा रखा गया है और ना ही अत्यधिक बड़ा हमने सभी आवश्यक बातें समाहित करते हुए संतुलित आकार का रखा है। संविधान के मूल प्रारूप में 22 भाग 395 अनुच्छेद तथा 9 अनुसूचियां थी कालांतर में संशोधनों के साथ साथ इनमें अभिवृद्धि होती गई।  सर आई जेनिंग्स के शब्दों में भारत का संविधान विश्व का सबसे बड़ा और सबसे विस्तृत संविधान है आ…

गरीकपति वीरवा बनाम एन. सुमिया चौधरी

गरीकपति वीरवा बनाम एन. सुमिया चौधरी भूमिका यह प्रकरण सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 की धारा 96, 109 एवं 110 से संबंधित है इसमें संविधान का अनुच्छेद 133, 135, 136 एवं 395 भी अंतर वलित है इस प्रकरण में उच्चतम न्यायालय के समक्ष मुख्य विचारणीय बिंदु अपील के अधिकार की व्याख्या का था। तथ्य प्रत्यर्थी एन. सुमिया चौधरी ने अन्य व्यक्तियों के साथ मिलकर 22. 4. 1949 को अधीनस्थ न्यायालय में एक वाद दायर किया जो 14. 11. 1950 को खारिज कर दिया गया उक्त निर्णय के विरुद्ध वादी प्रत्यय अर्थी द्वारा उच्च न्यायालय में अपील की गई जो 4. 3.1955 को स्वीकार कर ली गई तथा वादी-प्रत्यर्थी का वाद डिक्री कर दिया गया इस पर प्रतिवादी अपील आर्थी द्वारा उच्चतम न्यायालय में अपील करने की अनुमति चाही गई लेकिन वह इस कारण नहीं दी गई क्योंकि वादग्रस्त संपत्ति का मूल्य केवल 11400 रुपए ही था जबकि अपील के लिए कम से कम ₹20000 की संपत्ति होना जरूरी था प्रतिवादी अपीलार्थी ने उच्चतम न्यायालय से विशेष इजाजत मांगी।  उच्चतम न्यायालय के समक्ष अपील आरती की ओर से यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि- क.  अपील करने का अधिकार एक विशेष अधिकार है जिसे …

डीटी पट्टाभिरामा स्वामी बनाम एस. हनमैय्या

डीटी पट्टाभिरामा स्वामी बनाम एस. हनमैय्या भूमिका यह मामला सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 की धारा 100 से संबंधित है इसमें  उच्चतम न्यायालय के समक्ष द्वितीय अपील की ग्राहयता का प्रश्न अंतर वलित था। तथ्य मामले के तथ्य संक्षेप में इस प्रकार हैं इसमें वादी नरासरावपेट नामक स्थान में  स्थित मंदिर के देवता पट्टाभिरामा स्वामी है सन 1868 में बिहार के एक परिवार ने लगभग 12 एकड़ भूमि देवता को समर्पित की थी तथा एक न्यास का सृजन किया था कालांतर में वादी की भूमि पर काम करने वाले व्यक्तियों की मजदूरी के लिए न्यास की ओर से एक अनुबंध उन कार्य करने वाले व्यक्तियों के साथ जो इस मामले में प्रतिवादी संख्या 6 से लगाकर 23  तक है इस आशय  का किया गया कि वे तथाकथित भूमि अपने पास रखेंगे उन व्यक्तियों द्वारा उक्त भूमि का विक्रय कर दिया गया इस पर वादी-देवता की ओर से प्रतिवादी गण के विरुद्ध भूमि का कब्जा प्राप्त करने के लिए वाद दायर किया गया। प्रतिवादी संख्या 1 लगायत 5 द्वारा उत्तर में यह कहा गया कि वे भूमि की वास्तविक क्रेता होने से उसके स्वामी है तथा वादी का उस पर कोई अधिकार नहीं है भूमि पर कब्जा भी उनका ही है विचार…

Seth Hukumchand vs Maharaj Bahadur Singh | सेठ हुकुमचंद बनाम महाराज बहादुर सिंह

Seth Hukumchand vs Maharaj Bahadur Singh | सेठ हुकुमचंद बनाम महाराज बहादुर सिंह भूमिका यह प्रकरण सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 के आदेश 1 नियम 8 से संबंधित है। इसमें पूजा के अधिकार की घोषणा का  प्रश्न अंतर् वलित था। तथ्य प्रकरण के तथ्य संक्षेप में इस प्रकार हैं सन 1918 में श्वेतांबर जैन समाज ने पर्वतों पर स्थित संपत्ति तीर्थ स्थान आदि पालगंज के राजा से खरीद कर उस पर अपना स्वामित्व स्थापित किया समाज ने उस पर पुजारियों नौकरों एवं यात्रियों के लिए कुछ मकान एवं धर्मशाला बनाई तथा संतरियों व चौकीदारों की नियुक्ति की श्वेतांबर जैन समाज ने वहां एक दरवाजा बनाने की योजना भी बनाई ताकि यात्री आदि पर्वत पर आसानी से जा सके दिगंबर जैन समाज ने इस दरवाजे (फाटक) पर आपत्ति की।  उनका यह कहना था कि श्वेतांबर जैन समाज वाले दरवाजा बना कर दिगंबर जैन समाज के मार्ग के उपयोग में व्यवधान पैदा करना चाहते हैं दिगंबर जैन समाज की ओर से सन 1920 में श्वेतांबर जैन समाज के विरुद्ध सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 के आदेश 1 नियम 8 के अंतर्गत एक वाद दायर किया। वाद में यह कहा गया कि पर्वत का प्रत्येक पत्थर पवित्र है यहां मकान एवं…

Shri Sinha Ramanuja vs Ramanuja | श्री सिन्हा रामानुजा बनाम रामानुजा

Shri Sinha Ramanuja vs Ramanuja |  श्री सिन्हा रामानुजा बनाम रामानुजा भूमिका यह मामला सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 की धारा 9 एवं धारा 100 से संबंधित है इसमें उच्चतम न्यायालय के समक्ष सिविल प्रकृति के वाद के निर्धारण तथा तथ्य संबंधी मुद्दे पर अपीलीय न्यायालय की शक्तियों का प्रश्न अंतर्वलित था। तथ्य मामले के तथ्य संक्षेप में इस प्रकार हैं तिरूनेल वैली जिले में अलवर तिरु नगरी में भगवान विष्णु का एक अत्यंत प्राचीन मंदिर है इस मंदिर को आदिनाथ अलवर मंदिर के नाम से जाना जाता है कालांतर में इस मंदिर के चारों तरफ छोटे-मोटे 20 मंदिर और बन गए इनमें से तीन मंदिर भगवान विष्णु के मंदिर में और शेष बाहर बनाए गए विशेष अवसरों पर इन मंदिरों की मूर्तियां एक दूसरे मंदिर में लाई ले जाए जाती थी इसी दौरान पुजारियों के बीच पूजा की प्रधानता तथा प्रशंसा पत्र की प्राप्ति को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया इस पर चेन्नई हिंदू धार्मिक संस्थान बोर्ड ने सन 1927 में प्राथमिकता का क्रम निर्धारित करते हुए एक सूची तैयार की जिसमें रामानुजाचारिया मंदिर के पुजारियों को अन्य पुजारियों की अपेक्षा निम्नांकित दिनों के लिए प्राथमिकता …

Narayan Bhagwant Rao vs Gopal Vinayak | नारायण भगवंत राव बनाम गोपाल विनायक

Narayan Bhagwant Rao vs Gopal Vinayak | नारायण  भगवंत राव बनाम गोपाल विनायक भूमिका यह मामला संविधान के अनुच्छेद 133 तथा सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 के आदेश 1  नियम 3 व 10 की व्याख्या से संबंधित है। तथ्य संक्षेप में मामले के तथ्य इस प्रकार है वादी  अपील आर्थी नारायण भगवंतराव गणपति महाराज का वंशज है गणपति महाराज की मृत्यु सन 1701 में 98 बरस की आयु में हो गई थी जब गणपति महाराज की आयु 72 वर्ष की थी तब उन्हें स्वपन में यह कहा गया कि ताम्रपर्णी नदी में उन्हें 'वेंकटेश बालाजी' की प्रतिमा मिलेगी। तदनुसार उन्हें वहां बालाजी की मूर्ति मिली जिसे उन्होंने जुनार (जिला पूना) स्थित अपने मकान में स्थापित किया। गणपति महाराज की मृत्यु के बाद उनके जेष्ठ पुत्र मिम्माया को  भी स्वप्न में यह कहा गया कि जुन्नार गांव नष्ट हो जाएगा इसलिए मूर्ति को वहां से हटा लिया जाए इस पर मीमाया की मृत्यु के बाद उसके पुत्र बापा जी बूबा ने पेशवा से नासिक में गोदावरी नदी के किनारे भूमि प्राप्त कर वहां मंदिर का निर्माण करवाया और उसमें मूर्ति की स्थापना की इस मंदिर में होलकर एवं सिंधिया का भी रुपया लगा था सन 1774 में प…

S M Zakati vs B M Borkar | एस. एम. जकाती बनाम बी. एम. बोरकर

S M Zakati vs B M Borkar |  एस. एम. जकाती बनाम बी. एम. बोरकर भूमिका यह मामला सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 की धारा 53 आदेश 21 नियम 94 तथा हिंदू विधि के अंतर्गत पुत्र  के पवित्र कर्तव्य से संबंधित है। तथ्य संक्षेप में इस मामले के तथ्य इस प्रकार हैं एम. बी. जकाती नाम का एक व्यक्ति धारवाड़ कोआपरेटिव बैंक में प्रबंध निदेशक के पद पर कार्यरत था जब बैंक का समापन हुआ तब  परिसमापक ने जकाती को अपकरण का दोषी बताते हुए उसके विरुद्ध ₹15000 बकाया निकाले 21 अप्रैल 1942 को सहकारी विभाग के उप रजिस्ट्रार ने जकाती को उक्त राशि जमा कराने का आदेश दिया इसे निष्पादन हेतु कलेक्टर के पास भेजा गया कलेक्टर ने आदेश के निष्पादन में भू राजस्व कानून के अंतर्गत जकाती के मकान को कुर्क कर लिया 24 नवंबर 1942 को मकान की नीलामी का आदेश दिया गया 24 दिसंबर 1942 को इस आशय की घोषणा की गई तथा 2 फरवरी 1943 नीलामी की तारीख तय की गई 16 जनवरी 1943 को जकाती द्वारा नीलाम रोके जाने हेतु प्रार्थना की गई जिसे अस्वीकार कर दिया गया निर्धारित तिथि 2 फरवरी 1943 को मकान नीलाम किया गया प्रतिवादी एस. एम. बोटकर नहीं यह मकान खरीदा 23 फरवरी 194…