Section 123 The Army Act, 1950

 

Section 123 The Army Act, 1950 in Hindi and English 



Section 123 The Army Act, 1950  :Liability of offender who ceases to be subject to Act.

(1) Where an offence under this Act had been committed by any person while subject to this Act, and he has ceased to be so subject, he may be taken into and kept in military custody, and tried and punished for such offence as if he continued to be so subject.

1. Subs. by Act 37 of 1992, s. 9.

(2) No such person shall be tried for an offence, unless his trial commences 1[ within a period of three years after he had ceased to be subject to this Act; and in computing such period, the time during which such person has avoided arrest by absconding or concealing himself or where the institution of the proceeding in respect of the offence has been stayed by an injunction or order, the period of the continuance of the injunction or order, the day on which it was issued or made, and the day on which it was withdrawn, shall be excluded:] Provided that nothing contained in this sub- section shall apply to the trial of any such person for an offence of desertion or fraudulent enrolment or for any of the offences mentioned in section 37 or shall affect the jurisdiction of a criminal court to try any offence triable by such court as well as by a court- martial.

(3) When a person subject to this Act is sentenced by a court- martial to transportation or imprisonment, this Act shall apply to him during the term of his sentence, though he is cashiered or dismissed from the regular Army, or has otherwise ceased to be subject to this Act, and he may be kept, removed, imprisoned and punished as if he continued to be subject to this Act.

(4) When a person subject to this Act is sentenced by a court- martial to death, this Act shall apply to him till the sentence is carried out.


Supreme Court of India Important Judgments And Case Law Related to Section 123 of The Army Act, 1950  :

Union Of India & Ors vs Major General Madan Lal Yadav on 22 March, 1996

Union Of India & Ors vs R.K.L.D. Azad on 9 August, 1995

Maj. (Retd.) Hari Chand Pahwa vs Union Of India (Uoi) And Anr. on 26 July, 1994

Union Of India & Ors vs V.N. Singh on 8 April, 2010

U.O.I. & Ors vs Harjeet Singh Sandhu on 11 April, 2001

Union Of India vs P.S.Gill on 27 November, 2019

Brig L. I. Singh Ysm vs Union Of India on 17 December, 2019



सेना अधिनियम, 1950 की धारा 123 का विवरण :  - उस अपराधी का दायित्व जो इस अधिनियम के अधीन नहीं रह जाता है - (1) जहां कि इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी व्यक्ति द्वारा उस समय किया गया था जब कि वह इस अधिनियम के अध्यधीन था और वह ऐसे अध्यधीन नहीं रह गया है वहां उसे सैनिक अभिरक्षा में ले लिया और रखा जा सकेगा तथा ऐसे अपराध के लिए ऐसे विचारित और दंडित किया जा सकेगा मानो वह ऐसे अध्यधीन बना रहा हो।

(2) ऐसा कोई भी व्यक्ति किसी अपराध के लिए विचारित नहीं किया जाएगा जब तक कि उसके विचारण का प्रारम्भ उसके इस अधिनियम के अध्यधीन न रह जाने के पश्चात् तीन वर्ष की कालावधि के अंदर न हो जाए ; और ऐसी कालावधि की संगणना करने में, वह समय, जिसके दैरान ऐसा व्यक्ति फरार होकर या अपने को छिपाकर गिरफ्तारी से बचता है या जहां किसी अपराध की बाबत कार्यवाही का संस्थित किया जाना किसी व्यादेश या आदेश द्वारा रोक दिया गया है, वहां व्यादेश या आदेश के बने रहने की कालावधि, वह दिन, जिस दिन वह जारी किया गया था या दिया गया था और वह दिन, जिस दिन उसे वापस लिया गया था, अपवर्जित किया जाएगा :

परन्तु इस उपधारा में अन्तर्विष्ट कोई भी बात अभित्यजन या कपटपूर्ण अभ्यावेदन के अपराध के लिए या धारा 37 में वर्णित अपराधों में से किसी के लिए किसी व्यक्ति के विचारण को लागू नहीं होगी और न ऐसे किसी अपराध का विचारण करने की दण्डन्यायालय की अधिकारिता पर प्रभाव डालेगी जो ऐसे न्यायालय द्वारा तथा सेना - न्यायालय द्वारा भी विचारणीय है।

(3) जब कि इस अधिनियम के अध्यधीन के किसी व्यक्ति को किसी सेना-न्यायालय द्वारा निर्वासन या कारावास का दंडादेश दिया जाता है तब यह अधिनियम उसके दंडादेश की अवधि के दौरान उसको लागू होगा यद्यपि वह नियमित सेना से पदच्यूत सकलंन पदच्युत कर दिया जाता है या अन्यथा इस अधिनियम के अध्यधीन नहीं रह गया है तथा ऐसे रखा, हटाया, कारावासित और दण्डित किया जा सकेगा मानो वह इस अधिनियम के अध्यधीन बना रहा है।

(4) जब कि इस अधिनियम के अध्यधीन के किसी व्यक्ति को, किसी सेना-न्यायालय द्वारा मृत्यु का दण्डादेश दिया जाता है, तब यह अधिनियम उसको तब तक लागू होगा जब तक कि वह दण्डादेश कार्यान्वित नहीं कर दिया जाता।



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