Section 102 The Army Act, 1950

 

Section 102 The Army Act, 1950 in Hindi and English 



Section 102 The Army Act, 1950  :Duty of commanding officer in regard to detention.

(1) It shall be the duty of every commanding officer to take care that a person under his command when charged with an offence is not detained in custody for more than forty- eight hours after the committal of such person into custody is reported to him, without the charge being investigated, unless investigation within that period seems to him to be impracticable having regard to the public service.

(2) The case of every person being detained in custody beyond a period of forty- eight hours, and the reason thereof, shall be reported by the commanding officer to the general or other officer to whom application would be made to convene a general or district court- martial for the trial of the person charged.

(3) In reckoning the period of forty- eight hours specified in sub- section (1), Sundays and other public holidays shall be excluded.

(4) Subject to the provisions of this Act, the Central Government may make rules providing for the manner in which and the period for which any person subject to this Act may be taken into and detained in military custody, pending the trial by any competent authority for any offence committed by him.


Supreme Court of India Important Judgments And Case Law Related to Section 102 of The Army Act, 1950  :

R. Viswan & Others vs Union Of India & Others on 6 May, 1983

Ram Sarup vs The Union Of India And Another on 12 December, 1963

Bhuwneshwar Singh vs Union Of India (Uoi) And Ors. on 1 September, 1993




सेना अधिनियम, 1950 की धारा 102 का विवरण :  -  निरोध के सम्बन्ध में कमान आफ़िसर का कर्तव्य - (1) हर कमान आफिसर का यह कर्तव्य होगा कि वह इस बात की सतर्कता बरते कि जो व्यक्ति उसके समादेश के अधीन है, उस पर किसी अपराध का आरोप लगाए जाने पर वह व्यक्ति उस आरोप का अन्वेषण किए गए बिना उस समय के पश्चात्, जब उस व्यक्ति की अभिरक्षा में सुपुर्द किए जाने की रिपोर्ट ऐसे आफिसर को की गई है, तब के सिवाय जब कि अड़तालीस घंटे के अन्दर ऐसे अन्वेषण का किया जाना लोक सेवा की दृष्टि से उसे असाध्य प्रतीत होता हो, अड़तालीस घंटे से अधिक के लिए अभिरक्षा में निरुद्ध न किया जाए।

(2) हर ऐसे व्यक्ति के मामले की, जो अड़तालीस घंटों से अधिक की कालावधि के लिए अभिरक्षा में निरुद्ध किया हुआ है और ऐसे निरुद्ध किए जाने के कारण की रिपोर्ट कमान आफिसर द्वारा उस जनरल या अन्य आफिसर को की जाएगी जिससे उस व्यक्ति का जिस पर आरोप है विचारण करने के लिए जनरल या डिस्ट्रिक्ट सेना-न्यायालय संयोजित करने का आवेदन किया जाएगा।

(3) उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट अड़तालीस घंटों की कालावधि की गणना करने में रविवार और अन्य लोकावकाश दिन अपवर्जित किए जाएंगे।

(4) इस अधिनियम के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए, केन्द्रीय सरकार वह रीति और वह कालावधि उपबन्धित करने वाले नियम बना सकेगी जिसमें और जिसके लिए कि वह कोई भी व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अध्यधीन है, उसके द्वारा किए गए किसी

अपराध के लिए किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा किए जाने वाले विचारण के लम्बित रहने तक सैनिक अभिरक्षा में लिया और निरुद्ध किया जा सकेगा।



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