Section 38 The Army Act, 1950

 

Section 38 The Army Act, 1950 in Hindi and English 



Section 38 The Army Act, 1950  :. Desertion and aiding desertion.

(1) Any person subject to this Act who deserts or attempts to desert the service shall, on conviction by

court- martial, if he commits the offence on active service or when under orders for active service, be

liable to suffer death or such less punishment as is in this Act mentioned; and if he commits the

offence under any other circumstances, be liable to suffer imprisonment for a term which may extend

to seven years or such less punishment as is in this Act mentioned.

(2) Any person subject to this Act who, knowingly harbours any such deserter shall, on conviction by

court- martial, be liable to suffer imprisonment for a term which may extend to seven years or such

less punishment as is in this Act mentioned.

(3) Any person subject to this Act who, being cognizant of any desertion or attempt at desertion of a

person subject to this Act, does not forthwith give notice to his own or some other superior officer, or

take any steps in his power to cause such person to be apprehended, shall, on conviction by courtmartial, be liable to suffer imprisonment for a term which may extend to two years or such less

punishment as is in this Act mentioned.



Supreme Court of India Important Judgments And Case Law Related to Section 38 of The Army Act, 1950  :

Capt. Virendra Kumar Through His vs Chief Of The Army Staff, New Delhi on 13 February, 1986

Union Of India & Ors vs Sunil Kumar Sarkar on 28 February, 2001

Union Of India & Ors vs Vishav Priya Singh on 5 July, 2016




सेना अधिनियम, 1950 की धारा 38 का विवरण :  - अभित्यजन और अभित्यजन में सहायता करना - (1) इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति, जो सेवा का अभित्यजन करेगा या करने का प्रयत्न करेगा वह सेना-न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर -

उस दशा में जिसमें कि ऐसा अपराध वह सक्रिय सेवा पर करेगा या तब करेगा, जब वह सक्रिय सेवा पर जाने के आदेश के अधीन है मृत्यु या ऐसा लघुतर दण्ड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा, तथा

उस दशा में जिसमें कि ऐसा अपराध वह किन्हीं परिस्थितियों में करेगा कारावास, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी या ऐसा लघुतर दण्ड जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा।

(2) इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति जो जानते हुए ऐसे किसी अभित्यजन को संश्रय देगा, वह सेना-न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसा लघुतर दण्ड, जो इस अधिनियम में वर्णित हो, भोगने के दायित्व के अधीन होगा।

(3) इस अधिनियम के अध्यधीन का कोई व्यक्ति जो इस अधिनियम के अध्यधीन के किसी व्यक्ति के किसी अभित्यजन या अभित्यजन के प्रयत्न के संज्ञान रखते हुए तत्काल अपने स्वयं के या किसी अन्य वरिष्ठ आफिसर को सूचना देगा या ऐसे व्यक्ति को पकड़वाने के लिए अपनी शक्ति में कोई कार्रवाई नहीं करेगा, सेना-न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसा लघुतर दण्ड, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भोगने के दायित्व के अधीन होगा।



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