Section 237 Contract Act 1872


Section 237 Contract Act 1872 in Hindi and English 

Section 237 Contract Act 1872 : Liability of principal inducing belief that agent's unauthorized acts were authorized – When an agent has, without authority, done acts or incurred obligations to third persons on behalf of his principal, the principal is bound by such acts or obligations, if he has by his words or conduct induced such third persons to believe that such acts and obligations were within the scope of the agent's authority.


 (a) A consigns goods to B for sale, and gives him instructions not to sell under a fixed price. C, being ignorant of B's instructions, enters into a contract with B to buy the goods at a price lower than the reserved price. A is bound by the contract.

(b) A entrusts B with negotiable instruments endorsed in blank. B sells them to C in violation of private orders from A. The sale is good

Supreme Court of India Important Judgments And Case Law Related to Section 237 of Contract Act 1872 :

Harshad J. Shah & Anr vs L.I.C. Of India & Ors on 4 April, 1997

State Of Orissa vs United India Insurance Co.on 1 April, 1997

Delhi Electric Supply vs Basanti Devi And Anr on 28 September, 1999

Delhi Electric Supply vs Basanti Devi And Anr on 28 September, 1999

M/S. Dilawari Exporters vs M/S. Alitalia Cargo & Ors on 16 April, 2010

भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 237 का विवरण :  -  यह विश्वास उत्प्रेरित करने वाले मालिक का दायित्व कि अभिकर्ता के अप्राधिकृत कार्य प्राधिकृत थे -- जब कि अभिकर्ता ने प्राधिकार के बिना अपने मालिक की ओर से कार्य किए हों या पर-व्यक्तियों के प्रति बाध्यताएँ उपगत की हों तब मालिक ऐसे कार्यों या बाध्यताओं से आबद्ध होगा, यदि मालिक ने अपने शब्दों या आचरण से ऐसे पर-व्यक्तियों को यह विश्वास करने के लिए उत्प्रेरित किया हो कि ऐसे कार्य और बाध्यताएँ उस अभिकर्ता के प्राधिकार के विस्तार के भीतर थीं।


(क) 'क' विक्रय के लिए माल ‘ख’ को प्रेषित करता है और उसे अनुदेश देता है कि वह उसे नियत कीमत से कम पर न बेचे। ‘ख’ को दिये गए अनुदेशों को न जानते हुए 'ग' आरक्षित कीमत से कम कीमत पर उस माल को खरीदने की ‘ख’ से संविदा करता है। ‘क’ उस संविदा से आबद्ध है।

(ख) 'क' ऐसी परक्राम्य लिखत, जिन पर निरंक पृष्ठांकन है, 'ख' के पास न्यस्त करता है। 'क' के प्राइवेट आदेशों का अतिक्रमण कर ‘ख’ उन्हें 'ग' को बेच देता है। विक्रय ठीक है

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