Section 229 Contract Act 1872


Section 229 Contract Act 1872 in Hindi and English 



Section 229 Contract Act 1872 :Consequences of notice given to agent — Any notice given to or information obtained by the agent, provided it be given or obtained in the course of the business transacted by him for the principal, shall, as between the principal and third parties, have the same legal consequences as if it had been given to or obtained by the principal.

Illustrations

(a) A is employed by B to buy from C certain goods, of which C is the apparent owner, and buys them accordingly. In the course of the treaty for the sale, A learns that the goods really belonged to D, but B is ignorant of that fact. B is not entitled to set-off a debt owing to him from C against the price of the goods.

(b) A is employed by B to buy from C goods of which C is the apparent owner. A was, before he was so employed, a servant of C, and then learnt that the goods really belonged to D, but B is ignorant of that fact. In spite of the knowledge of his agent, B may set-off against the price of the goods a debt owing to him from C.



Supreme Court of India Important Judgments And Case Law Related to Section 229 of Contract Act 1872 :

Collector Of Customs, Cochin vs Trivandrum Rubber Works Ltd. on 11 November, 1998

Lalit Kumar Jain vs Union Of India on 21 May, 2021



भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 229 का विवरण :  -  अभिकर्ता को दी गई सूचना के परिणाम -- अभिकर्ता को दी गई किसी सूचना या उसके द्वारा अभिप्राप्त किसी जानकारी का, जहाँ तक कि मालिक और पर-व्यक्तियों का सम्बन्ध है, वहीं विधिक परिणाम होगा मानो वह मालिक को दी गई या उसके द्वारा अभिप्राप्त की गई हो, परन्तु यह तब जब कि वह अभिकर्ता द्वारा मालिक के लिए संव्यवहृत कारबार के अनुक्रम में दी या अभिप्राप्त की गई हो।

दृष्टान्त

(क) 'ग' से वह माल जिसका 'ग' दृश्यमान स्वामी है खरीदने के लिए 'ख' द्वारा 'क' नियोजित किया जाता है और वह तद्नुसार उसे खरीदता है। विक्रय की बातचीत के अनुक्रम में 'क' को पता चलता है कि वह माल वास्तव में 'ग' का है किन्तु ‘ख’ को यह तथ्य ज्ञात नहीं है। 'ग' से अपने को शोध्य एक ऋण उस माल की कीमत के विरुद्ध मुजरा करने का ‘ख’ हकदार नहीं है।

(ख) 'ग' से वह माल जिसका 'ग' दृश्यमान स्वामी है खरीदने के लिए 'ख' द्वारा 'क' नियोजित किया जाता है। 'क' इस प्रकार नियोजित होने से पूर्व 'ग' का सेवक था और तब उसे मालूम हुआ था कि वह माल वास्तव में 'ग' का 13 है, किन्तु ‘ख’ को यह तथ्य ज्ञात नहीं है। अपने अभिकर्ता को यह ज्ञात होते हुए भी 'ग' से अपने को शोध्य ऋण ‘ख’ उस माल की कीमत के विरुद्ध मुजरा कर सकेगा।


 


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