Section 145 Contract Act 1872

 

Section 145 Contract Act 1872 in Hindi and English 



Section 145 Contract Act 1872 :Implied promise to indemnify surety - In every contract of guarantee there is an implied promise by the principal debtor to indemnify the surety, and the surety is entitled to recover from the principal debtor whatever sum he has rightfully paid under the guarantee, but no sums which he has paid wrongfully

Illustrations

(a) B is indebted to C, and A is surety for the debt. C demands payment from A, and on his refusal sues him for the amount. A defends the suit, having reasonable grounds for doing so, but he is compelled to pay the amount of debt with costs. He can recover from B the amount paid by him for costs, as well as the principal debt.


(b) C lends B a sum of money, and A, at the request of B, accepts a bill of exchange drawn by B upon A to secure the amount. C, the holder of the bill, demands payment of it from A, and, on A's refusal to pay, sues him upon the bill. A, not having reasonable grounds for so doing, defends the suit, and has to pay the amount of the bill and costs. He can recover from B the amount of the bill, but not the sum paid for costs, as there was no real ground for defending the action.


(c) A guarantees to C, to the extent of 2,000 rupees, payment for rice to be supplied by C to B. C supplies to B rice to a less amount than 2,000 rupees, but obtains from A payment of the sum of 2,000 rupees in respect of the rice supplied. A cannot recover from B more than the price of the rice actually supplied


Supreme Court of India Important Judgments And Case Law Related to Section 145 of Contract Act 1872 :

Lalit Kumar Jain vs Union Of India on 21 May, 2021


भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 145 का विवरण :  -  प्रतिभू की क्षतिपूर्ति करने का विवक्षित वचन -- प्रत्याभूति की हर संविदा में प्रतिभू की क्षतिपूर्ति किए जाने का मूल ऋणी का विवक्षित वचन रहता है, और प्रतिभू किसी भी धनराशि को, जो उसने प्रत्याभूति के अधीन अधिकारपूर्वक दी हो; मूल ऋणी से वसूल करने का हकदार है, किन्तु उन धनराशियों को नहीं जो उसने अनाधिकारपूर्वक दी हों।

दृष्टान्त

(क) 'ग' का ‘ख’ ऋणी है और 'क' उस ऋण के लिए प्रतिभू है। 'ग' संदाय की माँग ‘क’ से करता है और उसके इन्कार करने पर उस रकम के लिए उस पर वाद लाता है। प्रतिरक्षा के लिए युक्तियुक्त आधार होने से ‘क’ वाद में प्रतिरक्षा करता है, किन्तु वह त्राण की रकम को खर्च समेत संदत्त करने के लिए विवश किया जाता है। वह मूल ऋण तथा अपने द्वारा दी गई खर्चे की रकम को भी ‘ख’ से वसूल कर सकता है।

(ख) 'ख' को 'ग' कुछ धन उधार देता है, और 'ख' की प्रार्थना पर 'क', उस रकम को प्रतिभूत करने के लिए 'ख' द्वारा  ‘क के ऊपर लिखे गए विनिमय-पत्र को प्रतिग्रहीत करता है। विनिमय-पत्र का धारक 'ग' उसके संदाय की माँग ‘क’ से करता है और ‘क’ के इन्कार करने पर उसके विरुद्ध उस विनिमय-पत्र पर वाद लाता है। 'क' प्रतिरक्षा करने के लिए युक्तियुक्त आधार न रखते हुए वाद में प्रतिरक्षा करता है और उसे विनिमय-पत्र की रकम और खर्चा | देना पड़ता है। वह विनिमय-पत्र की रकम ‘ख से वसूल कर सकता है किन्तु खर्च के लिए दी गई राशि वसूल नहीं कर सकता, क्योंकि उस अनुयोग में प्रतिरक्षा करने के लिए कोई वास्तविक आधार नहीं था।

(ग) ‘ग' द्वारा 'ख' को प्रदाय किये जाने वाले चावल के लिए, 'क' 2,000 रुपये तक का संदाय प्रत्याभूत करता है। ‘ख’ को ‘ग' 2,000 रुपये से कम की रकम का चावल प्रदाय करता है किन्तु प्रदाय किए गए चावल के लिए 'क' से 2,000 रुपये की राशि का संदाय अभिप्राप्त कर लेता है। ‘क’ वास्तव में प्रदाय किए गए चावल की कीमत से अधिक ‘क’ से वसूल नहीं कर सकता।


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