Section 141 Contract Act 1872


Section 141 Contract Act 1872 in Hindi and English 

Section 141 Contract Act 1872 :Surety's right to benefit of creditor's securities — A surety is entitled to the benefit of every security which the creditor has against the principal debtor at the time when the contract of suretyship is entered into, whether the surety knows of the existence of such security or not; and if the creditor loses, or without the consent of the surety, parts with such security, the surety is discharged to the extent of the value of the security.


(a) C, advances to B, his tenant, 2,000 rupees on the guarantee of A. C has also a further security for the 2,000 rupees by a mortgage of B's furniture. C, cancels the mortgage. B becomes insolvent and C sues A on his guarantee. A is discharged from liability to the amount of the value of the furniture.

(b) C, a creditor, whose advance to B is secured by a decree, receives also a guarantee for that advance from 1. C afterwards takes B's goods in execution under the decree, and then, without the knowledge of A, withdraws the execution. A is discharged.

(c) A, as surety for B, makes a bond jointly with B to C, to secure a loan from C to B. Afterwards, C obtains from B a further security for the same debt. Subsequently, C gives up the further security. A is not discharged.

Supreme Court of India Important Judgments And Case Law Related to Section 141 of Contract Act 1872 :

Industrial Finance Corporation vs Thletdc.An&Naonrosr.E Spinning on 12 April, 2002

Industrial Finance Corporation vs Thletdc.An&Naonrosr.E; on 12 April, 2002

State Bank Of Saurashtra vs Chitranjan Rangnath Raja And Anr on 30 April, 1980

Amrit Lal Goverdhan Lalan vs State Bank Of Travancore & Ors on 11 April, 1968

State Of Madhya Pradesh vs Kaluram on 5 September, 1966

State Bank Of India vs Madras Bolts & Nuts (P) Ltd. And on 11 January, 1996

S. Chattanatha Karayalar vs The Central Bank Of India And on 9 March, 1965

Lalit Kumar Jain vs Union Of India on 21 May, 2021

भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 141 का विवरण :  -   लेनदार की प्रतिभूतियों को फायदा उठाने का प्रतिभू का अधिकार -- प्रतिभू हर ऐसी प्रतिभूति के फायदे का हकदार है जो उस समय, जब प्रतिभूत्व की संविदा की जाए, लेनदार को मूल ऋणी के विरुद्ध प्राप्त हो, चाहे प्रतिभू उस प्रतिभूति के अस्तित्व को जानता हो या नहीं, और यदि लेनदार उस प्रतिभूति को खो दे या प्रतिभू की सम्मति के बिना उस प्रतिभूति को विलग कर दे तो प्रतिभू उस प्रतिभूति के मूल्य के परिमाण तक उन्मोचित हो जाएगा।


 (क) 'क' की प्रत्याभूति पर 'ग' अपने अभिधारी ‘ख’ को 2,000 रुपये उधार देता है। 'ग' के पास उन 2,000 रुपयोंके लिए 'ख' के फर्नीचर के बन्धक के रूप में एक और प्रतिभूति है। 'ग' उस बन्धक को रद्द कर देता है। 'ख' दिवालिया हो जाता है और 'ख' की प्रत्याभूति के आधार पर 'क' के विरुद्ध 'ग' वाद लाता है। ‘क’ उस फर्नीचरके मूल्य की रकम तक दायित्व से उन्मोचित हो गया है 

 (ख) एक लेनदार 'ग' को, जिसका ‘ख’ को दिया हुआ उधार डिक्री द्वारा प्रतिभूत है, उस उधार के लिए 'क' से भी प्रत्याभूति मिलती है। तत्पश्चात् 'ग' उस डिक्री के निष्पादन में ‘ख’ के माल को कुर्क करा लाता है, और तब ‘क’ की जानकारी के बिना उस निष्पादन का प्रत्याहरण कर लेता है। ‘क’ उन्मोचित हो जाता है।

(ग) 'ग' से 'ख' के लिए उधार प्राप्त करने को 'ख' के साथ संयुक्तत: ‘क’ एक बन्धपत्र ‘ख’ के प्रतिभू के तौर पर 'ग' को लिख देता है। तत्पश्चात् 'ग' उस ऋण के लिये ‘ख’ से एक अतिरिक्त प्रतिभूति अभिप्राप्त करता है। । तत्पश्चात् 'ग' उस अतिरिक्त प्रतिभूति को छोड़ देता है। 'क' उन्मोचित नहीं होता है।

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