Section 139 Contract Act 1872


Section 139 Contract Act 1872 in Hindi and English 

Section 139 Contract Act 1872 :Discharge of surety by creditor's act or omission impairing surety's eventual remedy - If the creditor does any act which is inconsistent with the rights of the surety, or omits to do any act which his duty to the surety requires him to do, and the eventual remedy of the surety himself against the principal debtor is thereby impaired, the surety is discharged.


(a) B contracts to build a ship for C for a given sum, to be paid by instalments as the work reaches certain stages. A becomes surety to C for B's due performance of the contract. C, without the knowledge of A, prepays to B the last two instalments. A is discharged by this prepayment.

(b) C lends money to B on the security of a joint and several promissory note made in C's favour by B, and by A as surety for B, together with a bill of sale of B's furniture, which gives power to C to sell the furniture, and apply the proceeds in discharge of the note. Subsequently, C sells the furniture, but, owing to his misconduct and wilful negligence, only a small price is realized. A is discharged from liability on the note.

 © A puts M as apprentice to B, and gives a guarantee to B for M's fidelity. B promises on his part that he will at least once a month, see M make up the cash. B omits to see this done as promised, and M embezzles. A is not liable to B on his guarantee.

Supreme Court of India Important Judgments And Case Law Related to Section 139 of Contract Act 1872 :

M/S.H.D.F.C vs Gautam Kumar Nag & Ors on 20 January, 2012

State Bank Of Saurashtra vs Chitranjan Rangnath Raja And Anr on 30 April, 1980

Pandit Ishwardas vs State Of Madhya Pradesh And Ors. on 9 January, 1979

Industrial Finance Corporation vs Thletdc.An&Naonrosr.E Spinning on 12 April, 2002

Industrial Finance Corporation vs Thletdc.An&Naonrosr.E; on 12 April, 2002

Lalit Kumar Jain vs Union Of India on 21 May, 2021

Infrastructure Leasing vs B.P.L. Limited on 9 January, 2015

Trustees Of Port Of Bombay vs The Premier Automobiles Ltd. And on 15 February, 1974

भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 139 का विवरण :  -  लेनदार के ऐसे कार्य या लोप से, जिसे प्रतिभू के पारिणामिक उपचार का ह्रास है, प्रति का उन्मोचन -- यदि लेनदार कोई ऐसा कार्य करे, जो प्रतिभू के अधिकारों से असंगत हो या किसी ऐसे कार्य को करने का लोप करे, जिसके किए जाने की प्रतिभू के प्रति उसका कर्तव्य अपेक्षा करता हो और मूल ऋणी के विरुद्ध प्रतिभूके अपने पारिणामिक उपचार का तद्द्वारा ह्रास हो तो प्रतिभू उन्मोचित हो जाएगा।


(क) 'ग' के लिए 'ख' निश्चित धनराशि के बदले एक पोत निर्माण करने की संविदा करता है, जो धनराशि काम के जैसे-जैसे अमुक प्रक्रमों तक पहुँचे, वैसे-वैसे ही किस्तों में दी जानी है। ‘ख’ द्वारा संविदा के सम्यक् पालन के लिए 'ग' के प्रति 'क' प्रतिभू हो जाता है। 'क' के ज्ञान के बिना 'ख' को अंतिम दो किस्तों का पूर्व संदाय ‘ग कर देता है। इस पूर्व संदाय के कारण 'क' उन्मोचित हो जाता है।

(ख) 'ख' के फर्नीचर के ऐसे विक्रयाधिकार-पत्र के साथ, जो 'ग' को यह शक्ति देता है कि वह फर्नीचर बेच दे और उसके आगमों को वचन-पत्र के उन्मोचन में उपयोजित कर ले। 'ग' के पक्ष में 'ख' के प्रतिभूके रूप में 'क' द्वारा लिखे गए संयुक्त एवं पृथक् वचन-पत्र की प्रतिभूति पर 'ख' को 'ग' धन उधार देता है। तत्पश्चात् ‘ग उस फर्नीचर को बेच देता है, किन्तु उस उपचार और उसके द्वारा जानबूझकर की गई उपेक्षा के कारण केवल थोड़ी कीमत प्राप्त होती है। ‘क’ उस वचन-पत्र के दायित्व से उन्मोचित हो जाता है।

(ग) 'ड' को 'ख' के पास शिक्षु के रूप में 'क' रखता है और ख' को 'ड' की विश्वस्तता की प्रत्याभूति देता है। ‘ख’ अपनी ओर से वचन देता है कि वह प्रति मास कम से कम एक बार देख लेगा कि 'ड' ने रोकड़ का मिलान कर लिया है। ‘ख’ ऐसा करने का लोप करता है और 'ड' गबन कर लेता है। ‘ख’ के प्रति 'क' अपनी प्रत्याभूति पर दायी नहीं है।

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