Section 134 Contract Act 1872

 

Section 134 Contract Act 1872 in Hindi and English 



Section 134 Contract Act 1872 :Discharge of surety by release or discharge of principal debtor - The surety is discharged by any contract between the creditor and the principal debtor, by which the principal debtor is released, or by any act or omission of the creditor, the legal consequence of which is the discharge of the principal debtor.

Illustrations

(a) A gives a guarantee to C for goods to be supplied by C to B. C supplies goods to B, and afterwards B becomes embarrassed and contracts with his creditors (including C) to assign to them his property in consideration of their releasing him from their demands. Here B is released from his debt by the contract with C, and A is discharged from his suretyship.

(b) A contracts with B to grow a crop of indigo on A's land and to deliver it to B at a fixed rate, and C guarantees Aš performance of this contract. B diverts a stream of water which is necessary for irrigation of Aš land, and thereby prevents him from raising the indigo. C is no longer liable on his guarantee.

(c) A contracts with B for a fixed price to build a house for B within a stipulated time. B supplying the necessary timber. C guarantees A's performance of the contract. B omits to supply the timber. C is discharged from his suretyship.


Supreme Court of India Important Judgments And Case Law Related to Section 134 of Contract Act 1872 :

Lalit Kumar Jain vs Union Of India on 21 May, 2021

Maharashtra State Electricity vs Official Liquidator, High Court, on 13 October, 1982

Industrial Finance Corporation vs Thletdc.An&Naonrosr.E Spinning on 12 April, 2002

Industrial Finance Corporation vs Thletdc.An&Naonrosr.E; on 12 April, 2002

National Textile Corporation vs State Bank Of India & Ors on 8 August, 2006

Punjab National Bank vs State Of U.P. And Ors. on 16 January, 2001



भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 134 का विवरण :  -  मूल ऋणी की निर्मुक्ति या उन्मोचन से प्रतिभू का उन्मोचन -- लेनदार और मूल ऋणी के बीच किसी ऐसी संविदा से, जिसके द्वारा मूल ऋणी निर्मुक्त हो जाए या लेनदार के किसी ऐसे कार्य या लोप से, जिसका विधिक परिणाम मूल ऋणी का उन्मोचन हो, प्रतिभू उन्मोचित हो जाता है।

दृष्टान्त

(क) 'ग' द्वारा 'ख' को प्रदाय किए जाने वाले माल के लिए 'ग' को 'क' प्रत्याभूति देता है। ‘ख’ को ‘ग' माल प्रदार करता है और तत्पश्चात् ‘ख’ संकट में पड़ जाता है और अपने लेनदारों से (जिनके अन्तर्गत 'ग' भी है) उनकी मांगों से अपने को निर्मुक्त किए जाने के प्रतिफलस्वरूप, उनको अपनी सम्पत्ति समनुदेशित करने की संविदा यहाँ 'ग' के साथ की गई इस संविदा द्वारा ‘ख’ अपने ऋण से निर्मुक्त हो जाता है और 'क' अपने प्रतिभूत्व से उन्मोचित हो जाता है।

(ख) 'क' अपनी भूमि पर नील की फसल उगाने और उसे नियत दर पर 'ख' को परिदत्त करने की संविदा ‘ख’ से करता है और 'ग' इस संविदा के 'क' द्वारा पालन किए जाने की प्रत्याभूति देता है। 'क' एक जलधारा को जो ‘क’ की भूमि की सिंचाई के लिए आवश्यक है, मोड़ देता है और तद्द्वारा उसे नील उगाने से निवारित कर देता है। 'ग' अब अपनी प्रत्याभूति पर दायी नहीं रहा।

(ग) 'ख' के लिए एक गृह अनुबद्ध समय के भीतर और नियत कीमत पर बनाने की संविदा 'ख' से 'क' करता है, जिसके लिए आवश्यक काष्ठ 'ख' द्वारा दिया जाएगा। 'ग' इस संविदा के 'क' द्वारा पालन किए जाने की | प्रत्याभूति देता है। ‘ख’ काष्ठ देने का लोप करता है। 'ग' अपने प्रतिभूत्व से उन्मोचित हो जाता है।


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