Section 133 Contract Act 1872

 

Section 133 Contract Act 1872 in Hindi and English 



Section 133 Contract Act 1872 :Discharge of surety by variance in terms of contract — Any variance, made without the surety's consent, in the terms of the contract between the principal debtor and the creditor, discharges the surety as to transactions subsequent to the variance.

Illustrations

(a) A becomes surety to C for B's conduct as manager in C's bank. Afterwards, B and C contract, without A's consent, that B's salary shall be raised, and that he shall become liable for one-fourth of the losses on overdrafts. B allows a customer to over-draw, and the bank loses a sum of money. A is discharged from his suretyship by the variance made without his consent, and is not liable to make good this loss.

(b) A guarantees C against the misconduct of B in an office to which B is appointed by C, and of which the duties are defined by an Act of the Legislature. By a subsequent Act, the nature of the office is materially altered. Afterwards, B misconducts himself. A is discharged by the change from future liability under his guarantee, though the misconduct of B is in respect of a duty not affected by the later Act.

(c) C agrees to appoint B as his clerk to sell goods at a yearly salary, upon A's becoming surety to C for B's duly accounting for moneys received by him as such clerk. Afterwards, without A's knowledge or consent, C and B agree that B should be paid by a commission on the goods sold by him and not by a fixed salary. A is not liable for subsequent misconduct of B.

(d) A gives to C a continuing guarantee to the extent of 3,000 rupees for any oil supplied by C to B on credit. Afterwards B becomes embarrassed, and, without the knowledge of A, B and C contract that C shall continue to supply B with oil for ready money, and that the payments shall be applied to the then, existing debts between B and C. A is not liable on his guarantee for any goods supplied after this new arrangement.

(e) C contracts to lend B 5,000 rupees on the 1st March. A guarantees repayment. C pays the 5,000 rupees to B on the 1st January, A is discharged from his liability, as the contract has been varied, inasmuch as C might sue B for the money before the first of March.


Supreme Court of India Important Judgments And Case Law Related to Section 133 of Contract Act 1872 :

Amrit Lal Goverdhan Lalan vs State Bank Of Travancore & Ors on 11 April, 1968

Lalit Kumar Jain vs Union Of India on 21 May, 2021

Mardia Chemicals Ltd. Etc. Etc vs U.O.I. & Ors. Etc. Etc on 8 April, 2004

State Bank Of India vs V. Ramakrishnan on 14 August, 2018

Committee Of Creditors Of Essar vs Satish Kumar Gupta on 15 November, 2019

Arun Kumar Jagatramka vs Jindal Steel And Power Ltd. on 15 March, 2021



भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 133 का विवरण :  -  संविदा के निबन्धनों में फेरफार से प्रतिभू का उन्मोचन -- जो भी फेरफार मूल ऋणी और लेनादार के बीच की संविदा के निबन्धनों में प्रतिभू की सम्मति के बिना किया जाए, वह उस फेरफार के पश्चात्वर्ती संव्यवहारों के बारे में प्रतिभू का उन्मोचन कर देता है।

दृष्टान्त

(क) 'ग' के बैंक में प्रबंधक के तौर पर ख के आचरण के लिए 'ग' के प्रति 'क' प्रतिभू होता है। तत्पश्चात् 'क' की सम्मति के बिना 'ख' और 'ग' संविदा करते हैं कि 'ख' का संबलम् बढ़ा दिया जाएगा और ओवरड्राफ्टों से हुई हानि की एक चौथाई का 'ख' दायी होगा। ‘ख’ एक ग्राहक को ओवरड्राफ्ट करने देता है और बैंक को कुछ धन की हानि होती है। ‘क’ उसकी सम्मति के बिना किए गए फेरफार के कारण अपने प्रतिभूत्व से उन्मोचित हो जाता है और इस हानि को पूरा करने का दायी नहीं है।

(ख) 'क' एक ऐसे पद पर 'ख' के रहते हुए उसके अवचार के विरुद्ध 'ग' को प्रत्याभूति देता है जिस पद पर 'ग' द्वारा ‘ख’ नियुक्त किया जाता है और जिसके कर्तव्य विधान-मण्डल के एक अधिनियम द्वारा परिभाषित हैं। एक पश्चात्वर्ती अधिनियम द्वारा उस पद की प्रकृति तात्विक रूप से बदल दी जाती है। तत्पश्चात् 'ध' अवचार करता है। इस तब्दीली के कारण ‘क’ अपनी प्रत्याभूति के अधीन भावी दायित्व से उन्मोचित हो जाता है, यद्यपि ‘ख’ का वह अवचार ऐसे कर्तव्य के सम्बन्ध में है जिस पर पश्चात्वर्ती अधिनियम का प्रभाव नहीं पड़ता।

(ग) “ग' अपना माल बेचने के लिए वार्षिक सम्बलम् पर 'ख' को अपना लिपिक नियुक्त करने का करार इस बात पर करता है कि ऐसे लिपिक के नाते ‘ख’ द्वारा प्राप्त धन का उसके द्वारा सम्यक् हिसाब किए जाने के लिए 'ग' के प्रति ‘क’ प्रतिभू हो जाए। तत्पश्चात् 'क' के ज्ञान या सम्मति के बिना ‘ग' और 'ख' करार करते हैं कि 'ख' को पारिश्रमिक उसके द्वारा बेचे गए माल पर कमीशन के रूप में न कि नियत सम्बलम् के रूप में दिया जाएगा। ‘ख के पश्चातुवर्ती अवचार के लिए 'क' दायी नहीं है।

()'ग' द्वारा ‘ख’ को उधार प्रदाय किए जाने वाले तेल के लिए 'क' 3,000 रुपये तक की चलत प्रत्याभूति 'ग' को देता है। तत्पश्चात् ‘ख’ संकट में पड़ जाता है और 'क' के ज्ञान के बिना 'ख' और 'ग' संविदा करते हैं कि 'ख' को 'ग' नकद धन पर तेल प्रदाय करता रहेगा और वे संदाय, जो किए जाएं, ‘ख’ और ‘ग के उस समय वर्तमान ऋणों के लिए उपयोजित किए जाएंगे। 'क' इस नये ठहराव के पश्चात् दिये गए किसी भी माल के लिए अपनी प्रत्याभूति के अधीन संदाय का दाय नहीं है।

(ङ) ‘ख’ को पहली मार्च को 5,000 रुपये उधार देने की संविदा 'ग' करता है। ‘क’ उस ऋण के प्रतिसंदाय की प्रत्याभूति करता है। 'ग' 5,000 रुपये ‘ख’ को पहली जनवरी को देता है। ‘क’ अपने दायित्व से उन्मोचित हो जाता है, क्योंकि संविदा में यह फेरफार हो गई है कि 'ग' रुपयों के लिए 'ख' पर पहली मार्च से पूर्व वाद ला सकता है।


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