Section 126 Indian Evidence Act 1872

 

Section 126 Indian Evidence Act 1872 in Hindi and English



Section 126 Evidence Act 1872 :Professional communications -- No barrister, attorney, pleader or vakil shall at any time be permitted, unless with his client's express consent, to disclose any communication made to him in the course and for the purpose of his employment as such barrister, pleader, attorney or vakil by or on behalf of his client, or to state the contents or condition of any document with which he has become acquainted in the course and for the purpose of his professional employment, or to disclose any advice given by him to his client in the course and for the purpose of such employment :

Provided that nothing in this section shall protect from disclosure :-

(1) any such communication made in furtherance of any illegal purpose,

(2) any fact observed by any barrister, pleader, attorney or vakil, in the course of his employment as such, showing that any crime or fraud has been committed since the commencement of his employment.

It is immaterial whether the attention of such barrister, pleader, attorney or vakil was or was not directed to such fact by or on behalf of his client,

Explanation -- The obligation stated in this section continues after the employment has ceased.

Illustrations

(a) A, a client, says to B, an attorney -- "I have committed forgery and I wish you to defend me."

As the defense of a man known to be guilty is not a criminal purpose, this communication is protected from disclosure.

(b) A, a client, says to B, an attorney -- “I wish to obtain possession of property by the use of a forged deed on which I request you to sue.

This communication, being made in furtherance of a criminal purpose is not protected from disclosure.

(c) A being charged with embezzlement, retains B, an attorney, to defend him. In the course of the proceedings B observes that an entry has been made in A's account book, charging A with the sum said to have been embezzled, which entry was not in the book at the commencement of his employment.

This being a fact observed by B in the course of his employment, showing that a fraud has been committed since the commencement of the proceedings, it is not protected from disclosure.



Supreme Court of India Important Judgments And Case Law Related to Section 126 Indian Evidence Act 1872:

Superintendent & Remembrancer Of vs Satyen Bhowmick And Ors on 15 January, 1981

Khatri & Ors. Etc vs State Of Bihar & Ors on 10 March, 1981

Md.Ajmal Md.Amir Kasab @Abu vs State Of Maharashtra on 29 August, 2012

The State Of Punjab vs Sodhi Sukhdev Singh on 15 November, 1960

People'S Union For Civil vs Union Of India on 16 December, 2003

People'S Union For Civil vs Union Of India on 16 December, 2003



भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 126 का विवरण :  -  वृत्तिक संसूचनाएं -- कोई भी बैरिस्टर, अटर्नी, प्लीडर या वकील अपने कक्षीकार की अभिव्यक्त सम्मति के सिवाय ऐसी किसी संसूचना को प्रकट करने के लिए, जो उसके ऐसे बैरिस्टर, अटर्नी, प्लीडर या वकील की हैसियत में नियोजन के अनुक्रम में या के प्रयोजनार्थ उसके कक्षीकार द्वारा, या की ओर से उसे दी गई हो अथवा किसी दस्तावेज की, जिससे वह अपने वृत्तिक नियोजन के अनुक्रम में या के प्रयोजनार्थ परिचित हो गया है, अन्तर्वस्तु या दशा कथित करने को अथवा किसी सलाह को, जो ऐसे नियोजन के अनुक्रम में या के प्रयोजनार्थ उसने अपने कक्षीकार को दी है, प्रकट करने के लिए किसी भी समय अनुज्ञात नहीं किया जाएगा:

परन्तु इस धारा की कोई भी बात निम्नलिखित बात को प्रकटीकरण से संरक्षण न देगी--

(1) किसी भी अवैध प्रयोजन को अग्रसर करने में दी गई कोई भी ऐसी संसूचना,

(2) ऐसा कोई भी तथ्य जो किसी बैरिस्टर, प्लीडर, अटर्नी या वकील ने अपनी हैसियत में नियोजन के अनुक्रम में संप्रेक्षित किया हो, और जिससे दर्शित हो कि उसके नियोजन के प्रारंभ के पश्चात् कोई अपराध या कपट किया गया है।

यह तत्वहीन है कि ऐसे बैरिस्टर, प्लीडर, अटर्नी या वकील का ध्यान ऐसे तथ्य के प्रति उसके कक्षीकार के द्वारा या की ओर से आकर्षित किया गया था या नहीं।

स्पष्टीकरण -- इस धारा में कथित बाध्यता नियोजन के अवसित हो जाने के उपरान्त भी बनी रहती है।

दृष्टांत

(क) कक्षीकार क, अटर्नी ख से कहता है, “मैने कूटरचना की है और मैं चाहता हूं कि आप मेरी प्रतिरक्षा करें"। यह संसूचना प्रकटन से संरक्षित है, क्योंकि ऐसे व्यक्ति की प्रतिरक्षा आपराधिक प्रयोजन नहीं है, जिसका दोषी होना ज्ञात हो।

(ख) कक्षीकार क, अटर्नी ख से कहता है, “मैं संपत्ति पर कब्जा कूटरचित विलेख के उपयोग द्वारा अभिप्राप्त करना चाहता हूं और इस आधार पर वाद लाने की मैं आपसे प्रार्थना करता हूं''।

यह संसूचना आपराधिक प्रयोजन के अग्रसर करने में की गई होने से प्रकटन से संरक्षित नहीं है।

(ग) क पर गबन का आरोप लगाए जाने पर वह अपनी प्रतिरक्षा करने के लिए अटर्नी ख को प्रतिधारित करता है। कार्यवाही के अनुक्रम में ख देखता है कि क की लेखाबही में यह प्रविष्टि की गई है कि क द्वारा उतनी रकम देनी है जितनी के बारे में अभिकथित है कि उसका गबन किया गया है, जो प्रविष्टि उसके नियोजन के आरंभ के समय उस बही में नहीं थी।

यह ख द्वारा अपने नियोजन के अनुक्रम में सम्प्रेक्षित ऐसा तथ्य होने से, जिससे दर्शित होता है कि कपट उस कार्यवाही के प्रारंभ होने के पश्चात् किया गया है, प्रकटन से संरक्षित नहीं है।


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