कानूनी सहायता

 कानूनी सहायता

हमारे देश में कानून में गरीब व असहाय लोगों को कानूनी सहायता देने की व्यवस्था की गई है।  सीपीसी के आदेश दो के नियम 10(क) नया प्रावधान किया गया है कि न्यायालय में कोई भी व्यक्ति बिना सुने न रहे  और वह व्यक्ति यह ना कह सके कि उसे उसके मामले में बिना सुने ही निर्णय दिया गया। 

सीपीसी में यह प्रावधान किया गया है कि यदि किसी मामले में किसी पक्ष कार के हितों की रक्षा करने के लिए कोई वकील नहीं है तो कोर्ट ऐसे व्यक्ति के हितों की पैरवी के लिए किसी वकील को नियुक्त कर सकता है। 

सीपीसी के आदेश 3233 के अनुसार निम्न गरीब व्यक्ति कानूनी सहायता प्राप्त कर सकता है-

• उस व्यक्ति को कानूनी सहायता मिल सकती है जिसके पास मुकदमा करने के लिए और कोर्ट की फीस जमा करने के लिए पर्याप्त साधन न ह। 

• तलाक के मामले में कोई भी औरत कानूनी सहायता प्राप्त कर सकती ह। 

• अनुसूचित जाति एवं जनजाति परिवार का कोई भी व्यक्ति कानूनी सहायता प्राप्त कर सकता ह। 

• जिस व्यक्ति के पास डिग्री के निष्पादन में कुर्क नहीं की जा सकने वाली संपत्ति तथा वादग्रस्त विषय के अतिरिक्त ₹1000 से अधिक की संपत्ति न है। 

• भरण पोषण के मामले में कोई भी व्यक्ति कानूनी सहायता ले सकता है। 

• बलात्कार से पीड़ित कोई भी स्त्री निशुल्क कानूनी सहायता पाने की हकदार होती है। 

• यदि किसी औरत का अपहरण हो गया हो तो वह औरत सरकार से कानूनी सहायता प्राप्त कर सकती है। 

• यदि जुर्म करने वाला व्यक्ति 16 वर्ष से कम उम्र का हो तो वह भी कानूनी सहायता पाने का हकदार होता है। 

• यदि किसी औरत का अपहरण हो गया हो तो भारत सरकार से कानूनी सहायता प्राप्त कर सकती है। 

• कोई भी ऐसा कह दी या व्यक्ति जिसकी सालाना कमाई 11000 से कम हो तो वह व्यक्ति सरकार से कानूनी सहायता की मांग कर सकता है। 

• कोई भी बालक, स्त्री ,मानन व्यापार, बेगार से पीड़ित व्यक्ति, निरोग यह व्यक्ति निरयोग्य व्यक्ति, लोको  उपद्रव से पीड़ित व्यक्ति, जातिगत हिंसा से पीड़ित व्यक्ति, जातिगत अत्याचार से पीड़ित व्यक्ति, बाढ़ से पीड़ित व्यक्ति, सूखे से पीड़ित व्यक्ति, औद्योगिक उपद्रव से पीड़ित व्यक्ति, मानसिक रूप से पीड़ित व्यक्ति का कानूनी सहायता प्राप्त करने के हकदार माने गए हैं। 

सीपीसी उन्नीस सौ आठ के आदेश 44 के अनुसार निर्धन व्यक्ति बिना न्यायालय शुल्क दिए अपीलीय न्यायालय में अपील कर सकता है।  सीपीसी की धारा 303 के अनुसार जिस व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई शुरू की गई है उस व्यक्ति को यह अधिकार होगा कि वह अपनी प्रतिरक्षा अपनी पसंद के वकील से करवा सकता है। आईपीसी की धारा 304 के अनुसार जब किसी व्यक्ति का विचारण सेशन न्यायालय में किया जा रहा हो और उस व्यक्ति के पास स्वयं का वकील ना हो तो कोट उसके लिए सरकार के खर्च पर वकील की व्यवस्था करता है। 

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