Section 30 The Trade Marks Act, 1999

 

Section 30 The Trade Marks Act, 1999: 

 Limits on effect of registered trade mark.—

(1) Nothing in section 29 shall be construed as preventing the use of a registered trade mark by any person for the purposes of identifying goods or services as those of the proprietor provided the use—

(a) is in accordance with honest practices in industrial or commercial matters, and

(b) is not such as to take unfair advantage of or be detrimental to the distinctive character or repute of the trade mark.

(2) A registered trade mark is not infringed where—

(a) the use in relation to goods or services indicates the kind, quality, quantity, intended purpose, value, geographical origin, the time of production of goods or of rendering of services or other characteristics of goods or services;

(b) a trade mark is registered subject to any conditions or limitations, the use of the trade mark in any manner in relation to goods to be sold or otherwise traded in, in any place, or in relation to goods to be exported to any market or in relation to services for use or available or acceptance in any place or country outside India or in any other circumstances, to which, having regard to those conditions or limitations, the registration does not extend;

(c) the use by a person of a trade mark—

(i) in relation to goods connected in the course of trade with the proprietor or a registered user of the trade mark if, as to those goods or a bulk or which they form part, the registered proprietor or the registered user conforming to the permitted use has applied the trade mark and has not subsequently removed or obliterated it, or has at any time expressly or impliedly consented to the use of the trade mark; or

(ii) in relation to services to which the proprietor of such mark or of a registered user conforming to the permitted use has applied the mark, where the purpose and effect of the use of the mark is to indicate, in accordance with the fact, that those services have been performed by the proprietor or a registered user of the mark;

(d) the use of a trade mark by a person in relation to goods adapted to form part of, or to be accessory to, other goods or services in relation to which the trade mark has been used without infringement of the right given by registration under this Act or might for the time being be so used, if the use of the trade mark is reasonably necessary in order to indicate that the goods or services are so adapted, and neither the purpose nor the effect of the use of the trade mark is to indicate, otherwise than in accordance with the fact, a connection in the course of trade between any person and the goods or services, as the case may be;

(e) the use of a registered trade mark, being one of two or more trade marks registered under this Act which are identical or nearly resemble each other, in exercise of the right to the use of that trade mark given by registration under this Act.

(3) Where the goods bearing a registered trade mark are lawfully acquired by a person, the sale of the goods in the market or otherwise dealing in those goods by that person or by a person claiming under or through him is not infringement of a trade by reason only of—

(a) the registered trade mark having been assigned by the registered proprietor to some other person, after the acquisition of those goods; or

(b) the goods having been put on the market under the registered trade mark by the proprietor or with his consent.

(4) Sub-section (3) shall not apply where there exists legitimate reasons for the proprietor to oppose further dealings in the goods in particular, where the condition of the goods, has been changed or impaired after they have been put on the market.



Supreme Court of India Important Judgments And Leading Case Law Related to Section 30 The Trade Marks Act, 1999: 

Whirlpool Corporation vs Registrar Of Trade Marks, Mumbai & on 26 October, 1998

Whirlpool Corporation vs Registrar Of Trade Marks, Mumbai & on 26 October, 1998

Jagatjit Industries Limited vs The Intelectual Prop Appellate on 20 January, 2016

Toyota Jidosha Kabushiki Kaisha vs M/S Prius Auto Industries Limited on 14 December, 2017

Patel Field Marshal Agencies And vs P.M Diesels Ltd. And Ors. on 29 November, 2017

Union Of India vs Association Of Unified Telecom on 24 October, 2019

Ruston & Hornsby Ltd vs The Zamindara Engineering Co on 8 September, 1969

American Home Products  vs Mac Laboratories Private Limited on 30 September, 1985



व्यापार चिह्न अधिनियम, 1999 की धारा 30 का विवरण : 

 रजिस्ट्रीकृत व्यापार चिह्न के प्रभाव की सीमाएं-(1) धारा 29 की किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह किसी व्यक्ति द्वारा स्वत्वधारी के व्यापार चिह्न के रूप में किसी माल या सेवाओं की पहचान के प्रयोजनों के लिए रजिस्ट्रीकृत व्यापार चिह्न के उपयोग को निवारित करता है, परन्तु यह तब जब कि वह उपयोग-

(क) औद्योगिक या वाणिज्यिक मामलों से सद्भाविक पद्धतियों के अनुसार हो; और

(ख) ऐसा न हो जो व्यापार चिह्न के सुभिन्न स्वरूप या ख्याति का अनुचित लाभ प्राप्त करता हो या उसके लिए अहितकर हो ।

(2) किसी रजिस्ट्रीकृत व्यापार चिह्न का अतिलंघन नहीं होता है-

(क) जहां माल या सेवओं के संबंध में उसका उपयोग माल के प्रकार, क्वालिटी, मात्रा, आशयित प्रयोजन, मूल्य, भौगोलिक उद्भव, माल के उत्पादन या सेवाओं के लिए जाने का समय या माल या सेवाओं की अन्य विशेषताओं को उपदर्शित करता हो;

(ख) जहां व्यापार चिह्न किन्हीं शर्तों या मर्यादाओं के अधीन रजिस्ट्रीकृत हैं, वहां किसी भी स्थान में, विक्रय किए जाने वाले या अन्यथा व्यापार किए जाने वाले माल के संबंध में या उस माल के संबंध में, जो किसी भी बाजार को निर्यात किए जाने हैं, या उन सेवाओं के संबंध में जो भारत से बाहर किसी स्थान या देश में उपयोग के लिए हैं या स्वीकृति के लिए उपलभ्य हैं, या नहीं अन्य परिस्थितियों में जिनको, उन शर्तों या मर्यादाओं पर ध्यान देते हुए, रजिस्ट्रीकरण का विस्तार नहीं है, उस व्यापार चिह्न के किसी भी रीति में, उपयोग से ;

(ग) जहां किसी व्यक्ति द्वारा किसी व्यापार चिह्न का उपयोग, 

(i) व्यापार के अनुक्रम में, व्यापार चिह्न के स्वत्वधारी या रजिस्ट्रीकृत उपयोक्ता से संसक्त माल के संबंध में है, यदि उस माल या उस प्रपुंज या जिसका वह माल भागरूप है के बारे में रजिस्ट्रीकृत स्वत्वधारी ने या अनुज्ञात के अनुरूपतः रजिस्ट्रीकृत उपयोक्ता ने व्यापार चिह्न लगाया है और तत्पश्चात् उसे हटाया अथवा मिटाया नहीं है या किसी भी समय अभिव्यक्ततः या विवक्षतया, उस व्यापार चिह्न के उपयोग की अनुमति दी है; या

(ii) ऐसी सेवाओं के संबंध में है, जिस पर ऐसे चिह्न के स्वत्वधारी या अनुज्ञात उपयोग के अनुरूपतः रजिस्ट्रीकृत उपयोक्ता ने चिह्न के स्वत्वधारी या अनुज्ञात उपयोग के अनुरूपतः रजिस्ट्रीकृत उपयोक्ता ने चिह्न लगाया है, जहां चिह्न का उपयोग करने का प्रयोजन और प्रभाव तथ्य के अनुसार, यह उपदर्शित करता है कि वे सेवाएं चिह्न के स्वत्वधारी या उसके रजिस्ट्रीकृत उपयोक्ता द्वारा की गई है;

(घ) जहां किसी व्यक्ति द्वारा किसी व्यापार चिह्न को उस माल के संबंध में उपयोग से, जो ऐसे अन्य माल या सेवाओं के भागरूप या उसके उपसाधन होने के लिए अनुकूलित हैं जिस माल के बारे में इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकरण द्वारा दिए गए अधिकार का अतिलंघन किए बिना व्यापार चिह्न का उपयोग किया गया है, या तत्समय किया जा सकता है, यदि यह उपदर्शित करने के लिए कि माल या सेवाएं इस प्रकार अनुकूलित हैं, व्यापार चिह्न का उपयोग युक्तियुक्ततः आवश्यक है, और व्यापार चिह्न के उपयोग को न तो यह उपदर्शित करने का प्रयोजन है और न ही यह प्रभाव है कि व्यापार के अनुक्रम में, यथास्थिति, किसी व्यक्ति और माल में या सेवा में तथ्य के अनुसार, जो संबंध है, उससे भिन्न कोई संबंध है ;

(ङ) जहां इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकरण से मिले हुए व्यापार चिह्न के उपयोग के अधिकार के प्रयोग में ऐसे रजिस्ट्रीकृत व्यापार चिह्न के उपयोग से, जो इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत उन दो या अधिक व्यापार चिह्नों में से एक है, जो एक दूसरे के तद्रूप हैं या निकट सादृश्य रखते हैं ।

(3) जहां रजिस्ट्रीकृत व्यापार चिह्न युक्त माल किसी व्यक्ति द्वारा वैध रूप से अर्जित किया जाता है, वहां उस व्यक्ति द्वारा या उसके अधीन या उसके माध्यम से दावा करने वाले व्यक्ति द्वारा बाजार में उस माल का विक्रय व्यापार चिह्न का अतिलंघन नहीं है, यदि ऐसा केवल इस कारण से है कि-

(क) रजिस्ट्रीकृत व्यापार चिह्न, उस माल के अर्जन के पश्चात् रजिस्ट्रीकृत स्वत्वधारी द्वारा किसी अन्य व्यक्ति को समनुदिष्ट किया गया है; या

(ख) माल या स्वत्वधारी द्वारा या उसकी सहमति से उस रजिस्ट्रीकृत व्यापार चिह्न के अधीन बाजार में लाया गया है ।

(4) उपधारा (3) वहां लागू नहीं होगी जहां स्वत्वधारी के लिए उस माल में आगे व्यवहार का विरोध करने के लिए न्यायसंगत कारण विद्यमान हैं, विशिष्टतया जहां माल को बाजार में लाने के पश्चात् माल की दशा बदल गई है या उसका ह्रास हो गया है ।

 


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