Section 7A The Industrial Disputes Act, 1947

 

Section 7A The Industrial Disputes Act, 1947: 

Tribunals.-

(1) The appropriate Government may, by notification in the Official Gazette, constitute one or more Industrial Tribunals for the adjudication of industrial disputes relating to any matter, whether specified in the Second Schedule or the Third Schedule 5 and for performing such other functions as may be assigned to them under this Act].

(2) A Tribunal shall consist of one person only to be appointed by the appropriate Government.

(3) A person shall not be qualified for appointment as the presiding officer of a Tribunal unless--

(a) he is, or has been, a Judge of a High Court; or

(aa) 1 he has, for a period of not less than three years, been a District Judge or an Additional District Judge; 2 xxx] 2

(4) The appropriate Government may, if it so thinks fit, appoint two persons as assessors to advise the Tribunal in the proceeding before it.


Supreme Court of India Important Judgments And Leading Case Law Related to Section 7A The Industrial Disputes Act, 1947: 

H.H. The Maharana Sahib Shri vs The State Of Rajasthan And Others on 3 October, 1963

The Atlas Cycle Industries, Ltd. vs Their Workmen on 8 February, 1962

State Of Kerala vs B. Renjit Kumar & Ors on 5 June, 2008

Union Of India And Others vs A.S. Amarnath on 27 November, 1997

Gujarat Steel Tubes Ltd vs Gujarat Steel Tubes Mazdoor Sabha on 19 November, 1979

State Of Assam vs Horizon Union & Anr on 23 September, 1966

Workmen Employed By Hindustan vs Hindustan Lever Limited on 28 August, 1984

R. B. Bansilal Abirchand Milis Co vs Labour Court Nagpur & Ors on 25 November, 1971

Chemicals & Fibres Of India Ltd vs D. G. Bhoir & Ors on 2 May, 1975

M/S. Hamdard (Wakf) Laboratories vs Deputy Labour Commr. & Ors on 27 April, 2007




औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 7क का विवरण - 

अधिकरण-(1) समुचित सरकार चाहे द्वितीय अनुसूची में चाहे तृतीय अनुसूची में विनिर्दिष्ट किसी भी विषय सम्बन्धी औद्योगिक विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए 6[और ऐसे अन्य कृत्यों का पालन करने के लिए जो इस अधिनियम के अधीन उन्हें सौंपे जाएं] एक या अधिक औद्योगिक अधिकरण, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, गठित कर सकेगी ।

(2) अधिकरण केवल एक व्यक्ति से गठित होगा, जिसकी नियुक्ति समुचित सरकार द्वारा की जाएगी ।

(3) कोई भी व्यक्ति अधिकरण के पीठासीन अधिकारी के रूप में नियुक्त किए जाने के लिए तब तक अर्हित नहीं होगा जब तक कि वह-

(क) उच्च न्यायालय का न्यायाधीश न हो, या न रह चुका हो, अथवा

1956 के अधिनियम सं० 36 की धारा 4 द्वारा (10-3-1957 से) धारा 7 के स्थान पर प्रतिस्थापित ।

1964 के अधिनियम सं० 36 की धारा 3 द्वारा (19-12-1964 से) अंतःस्थापित ।

1982 के अधिनियम सं० 46 की धारा 3 द्वारा (21-8-1984 से) खण्ड (ग) का लोप किया गया ।

1964 के अधिनियम सं० 36 की धारा 3 द्वारा (19-12-1964 से) खण्ड (क) और खण्ड (ख) को क्रमशः खण्ड (घ) और खण्ड (ङ) के रूप में पुनःअक्षरांकित किया गया ।

2010 के अधिनियम सं० 24 की धारा 4 द्वारा अंतःस्थापित ।

1982 के अधिनियम सं० 46 की धारा 4 द्वारा (21-8-1984 से) अंतःस्थापित ।

1 [(कक) कम से कम तीन वर्ष की कालावधि तक जिला न्यायाधीश या अपर जिला न्यायाधीश न रह चुका हो; 2॥।

3[(ख) ऐसा उप मुख्य श्रम आयुक्त (केन्द्रीय) या राज्य श्रम विभाग का संयुक्त आयुक्त न हो या न रह चुका हो, जिसके पास विधि में डिग्री और श्रम विभाग में कम-से-कम सात वर्ष का अनुभव हो, जिसके अन्तर्गत सुलह अधिकारी के रूप में तीन वर्ष का अनुभव भी हैः

परन्तु ऐसा कोई उप मुख्य श्रम आयुक्त या संयुक्त श्रम आयुक्त तब तक नियुक्त नहीं किया जाएगा, जब तक कि वह, पीठसीन अधिकारी के रूप में नियुक्त किए जाने से पूर्व, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार की सेवा से त्यागपत्र नहीं दे देता है; या

(ग) भारतीय विधिक सेवा का श्रेणी 3 में अधिकारी न हो या न रह चुका हो और उसके पास उस श्रेणी में तीन वर्ष का अनुभव न हो ।]

(4) समुचित सरकार, यदि वह ऐसा करना ठीक समझे, अधिकरण को उसके समक्ष की कार्यवाही में सलाह देने के लिए, दो व्यक्तियों को असेसरों के रूप में नियुक्त कर सकेगी ।



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