Shafhi Mohammad vs The State Of Himachal Pradesh in Hindi | शफी मोहम्मद बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य

Shafhi Mohammad vs The State Of Himachal Pradesh in Hindi | शफी मोहम्मद बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य


Shafhi Mohammad vs The State Of Himachal Pradesh

भारत में कहीं पर भी जब कोई क्राइम होता है और पुलिस उस क्राइम सीन तक पहुंचती है तब तक उस जगह पर क्राइम के निशान खत्म हो गए हैं या उसके साथ छेड़छाड़ हो गई है . भारत में लोगों के अंदर भी क्राइम सीन पर छेड़छाड़ ना करनी की जागरूकता नहीं है और ना ही पुलिस में क्राइम सीन को प्रिजर्व करके रखने की जानकारी है. जिसकी वजह से बहुत से क्रिमिनल केस में सांसों की कमी पाई जाती है. इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा एक बहुत ही महत्वपूर्ण जजमेंट दी गई है.3 अप्रैल 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने एक जजमेंट दी थी जजमेंट का नाम था सफी मोहम्मद वर्सेस स्टेट ऑफ हिमाचल प्रदेश. इस केस की सुनवाई के दौरान एक सवाल कोर्ट के सामने आया की क्या आपराधिक जांच में वीडियोग्राफी और डिजिटल फोटोग्राफी का इस्तेमाल किया जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार से पूछा की क्या आपराधिक जांच में नई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके मामले की जांच की जा सकती है या नहीं. सरकार ने इस विषय पर एक कमेटी बनाई जिसने विचार विमर्श करने के बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में रिपोर्ट सौंपी और कहा कि नई टेक्नोलॉजी वीडियोग्राफी और डिजिटल फोटोग्राफी का इस्तेमाल अगर क्राइम सीन पर किया जाए तो उससे क्रिमिनल इन्वेस्टिगेशन में काफी फायदा होगा. साथ ही सरकार ने यह भी कहा डिजिटल डाटा में गड़बड़ी होने की संभावना है मगर सही से इसका इस्तेमाल किया गया तो क्रिमिनल इन्वेस्टिगेशन में इसका बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है. इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने एमईएस क्यूरी ( कोर्ट का मित्र) ने भी अपनी राय दी ,सेंट्रल गवर्नमेंट ने भी दी और एक्सपोर्ट कमेटी ने भी अपनी राय दी. एक्सपर्ट कमेटी का कहना था कि इस प्रोजेक्ट को सबसे पहले पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर शुरू करना चाहिए. जिस भी शहर की आबादी 50 हजार से अधिक है  वहां के कुछ पुलिस स्टेशन में इसकी शुरुआत की जाए. बाद में यूनियन टेरिटरी के किसी एक थाने में शुरू की जाए. और समय-समय पर इस प्रोजेक्ट रिपोर्ट भी चेक की जाए की क्रिमिनल इन्वेस्टिगेशन में वीडियोग्राफी और  डिजिटल फोटोग्राफी के इस्तेमाल का क्या फायदा हो रहा है और इसमें क्या परेशानी आ रही है. और धीरे-धीरे पूरे देश में वीडियोग्राफी और डिजिटल फोटोग्राफी का क्राइम इन्वेस्टीगेशन में इस्तेमाल हो. इसमें यह भी कहा गया कि थाने में साल में कितने क्राइम होते हैं उसी के हिसाब से कितने फोटोग्राफर थाने में रखने हैं या भी निर्धारित किया जाए. अगर सरकार के पास उस समय प्रशिक्षित फोटोग्राफर नहीं है तो प्राइवेट फोटोग्राफर को कैसे हाय किया जाए. और किसके पास इसकी जिम्मेदारी हो. सरकार ने पूरा खाका तैयार करके कोर्ट को दीया जिसके आधार पर कोर्ट ने चाहा कि गृह मंत्रालय राज्य सरकारों के साथ मिलते हुए देशभर में से लागू करें. 3 अप्रैल 2018 को यह जजमेंट सुप्रीम कोर्ट ने दी थी. मगर पिछले तीन-चार सालों मैं इस विषय पर कोई खास काम देखने को नहीं मिला.


Landmark Cases of India / सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले

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