Section 38 The Industrial Disputes Act, 1947

  

Section 38 The Industrial Disputes Act, 1947: 


 Power to make rules.-

(1) The appropriate Government may, subject to the condition of previous publication, make rules for the purpose of giving effect to the provisions of this Act.

(2) In particular and without prejudice to the generality of the foregoing power, such rules may provide for all or any of the following matters, namely:--

(a) the powers and procedure of conciliation officers, Boards, Courts, 5 Labour Courts, Tribunals and National Tribunals] including rules as to the summoning of witnesses, the production of documents relevant to the subject- matter of an inquiry or investigation, the number of members necessary to form a quroum and the manner of submission of reports and awards;(aa) 1 the form of arbitration agreement, the manner in which it may be signed by the parties, 2 the manner in which a notification may be issued under sub- section (3A) of section 10A,] the powers of the arbitrator named in the arbitration agreement and the procedure to be followed by him;

(aaa) the appointment of assessors in proceedings under this Act;]

(ab) 3 the constitution of Grievance Settlement Authorities referred to in section 9C, (section 38.) the manner in which industrial disputes may be referred to such authorities for settlement, the procedure to be followed by such authorities in the proceedings in relation to disputes referred to them and the period within which such preceedings shall be completed;]

(b) the constitution and functions of and the filling of vacancies in Works Committees, and the procedure to be followed by such Committees in the discharge of their duties;

(c) the allowances admissible to members of Courts 4 and Boards and presiding officers of Labour Courts, Tribunals and National Tribunals] and to assessors and witnesses;

(d) the ministerial establishment which may be allotted to a Court, Board, 5 Labour Court, Tribunal or National Tribunal] and the salaries and allowances payable to members of such establishments;

(e) the manner in which and the persons by and to whom notice of strike or lock- out may be given and the manner in which such notices shall be communicated;

(f) the conditions subject to which parties may be represented by legal practitioners in proceedings under this Act before a Court, 5 Labour Court, Tribunal or National Tribunal];

(g) any other matter which is to be or may be prescribed.

(3) Rules made under this section may provide that a contravention thereof shall be punishable with fine not exceeding fifty rupees.

(4) 1 All rules made under this section shall, as soon as possible after they are made, be laid before the State Legislature or, where the appropriate Government is the Central Government, before both Houses of Parliament.]

(5) 2 Every rule made by the Central Government under this section shall be laid, as soon as may be after it is made, before eachHouse of Parliament while it is in session for a total period of thirty days which may be comprised in one session or in 1 two or more successive sessions, and if, before the expiry of the session immediately following the session or the successive sessions aforesaid] both Houses agree in making any modification in the rule, or both Houses agree that the rule should not be made, the rule shall thereafter have effect only in such modified form or be of no effect, as the case may be; so, however, that any such modification or annulment shall be without prejudice to the validity of anything previously done under that rule.]



Supreme Court of India Important Judgments And Leading Case Law Related to Section 38 The Industrial Disputes Act, 1947: 

The United Commercial Bank Ltd vs Their Workmen(And Other on 9 April, 1951

Workmen Of M/S. Delhi Cloth And vs Management Of M/S. Delhi Cloth And ... on 17 October, 1969

The Associated Cement Companies vs Its Workmen & Another on 5 May, 1959

Dr. Devendra M. Surti vs State Of Gujarat on 2 May, 1968

The Automobile Products Of India vs Rukmaji Bala And Others(And on 3 February, 1955

The Bharat Bank Ltd., Delhi vs Employees Of The Bharat Bank  on 26 May, 1950

Jalan Trading Co. (Private Ltd.) vs Mill Mazdoor Union(With on 5 August, 1966

Grindlays Bank Ltd vs Central Government Industrial on 12 December, 1980

Brooke Bond India Ltd vs The Workmen on 22 July, 1981

Uttaranchal Forest Development  vs Jabar Singh And Ors on 12 December, 2006



औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 38 का विवरण - 


(2) विशिष्टतः और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी विषयों के लिए या उनमें से किसी के लिए उपबन्ध कर सकेंगे, अर्थात्ः-

(क) सुलह अधिकारियों, बोर्डों, न्यायालयों, 3[श्रम न्यायालयों, अधिकरणों और राष्ट्रीय अधिकरण] की शक्तियां और प्रक्रिया, जिनके अन्तर्गत साक्षियों को समन करने, जांच या अन्वेषण की विषय-वस्तु से सुसंगत दस्तावेजों को पेश करने, गणपूर्ति के लिए आवश्यक सदस्य-संख्या और रिपोर्टों तथा अधिनिर्णयों को निवेदित करने की रीति विषयक नियम आते हैं;

 4[(कक) माध्यस्थम् करार का प्ररूप, वह रीति जिससे पक्षकार उस पर हस्ताक्षर कर सकेंगे, 5[वह रीति जिससे    धारा 10क की उपधारा (3क) के अधीन अधिसूचना निकाली जा सकेगी,] माध्यस्थम् करार में नामित मध्यस्थ की शक्तियां और वह प्रक्रिया जिसका उसके द्वारा अनुसरण किया जाना है;

(ककक) इस अधिनियम के अधीन की कार्यवाहियों में असेसरों की नियुक्ति;](ख) कर्म समितियों का गठन उसके कृत्य और उनमें की रिक्तियों का भरा जाना और वह प्रक्रिया जिसका अनुसरण ऐसी समितियों द्वारा अपने कर्तव्यों के निर्वहन में किया जाना है;

 7[(ग) श्रम न्यायालय, अधिकरण और राष्ट्रीय अधिकरण के पीठासीन अधिकारियों के वेतन और भत्ते तथा उनकी नियुक्ति के लिए निर्बंधन और शर्तें, जिनके अंतर्गत न्यायालयों, बोर्डों के सदस्यों और असेसरों तथा साक्षियों को अनुज्ञेय भत्ते भी हैं;]

(घ) वह अनुसचिवीय स्थापन जो न्यायालय, बोर्ड, 1[श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण] को आबंटित किया जा सकेगा और ऐसे स्थापनों के सदस्य को संदेय संबलम् और भत्ते

(ङ) वह रीति जिससे और वे व्यक्ति जिनके द्वारा और जिन्हें हड़ताल या तालाबन्दी की सूचना दी जा सकेगी औऱ वह रीति जिससे ऐसी सूचनाएं संसूचित की जाएंगी;

 (च) वे शर्तें जिनके अध्यधीन रहते हुए पक्षकारों का प्रतिनिधित्व विधि-व्यवसायियों द्वारा किसी न्यायालय, 5[श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण] के समक्ष इस अधिनियम के अधीन की कार्यवाहियों में किया जा सकेगा;

(छ) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाना है या किया जाए ।

(3) इस धारा के अधीन बनाए गए नियम यह उपबन्ध कर सकेंगे कि उनका उल्लंघन पचास रुपए से अनधिक के जुर्माने से दण्डनीय होगा ।

 2[(4) इस धारा के अधीन बनाए गए सभी नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथासंभव शीघ्र, राज्य विधान-मंडल के समक्ष, या जहां कि समुचित सरकार केन्द्रीय सरकार है वहां संसद् के दोनों सदनों के समक्ष, रखे जाएंगे ।]

 3[(5) इस धारा के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा  4[दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्वट दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]



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