Section 36 The Industrial Disputes Act, 1947

 

Section 36 The Industrial Disputes Act, 1947: 


Representation of parties.-

(1) A workman who is a party to a dispute shall be entitled to be represented in any proceeding under this Act by--

(a) 2 any member of the executive or office bearer] of a registered trade union of which he is a member:

(b) 2 any member of the executive or other office bearer] of a federation of trade unions to which the trade union referred to in clause (a) is affiliated;

(c) where the worker is not a member of any trade union, by 2 any member of the executive or other office bearer] of any trade union connected with, or by any other workman employed in, the industry in which the worker is employed and authorized in such manner as may be prescribed.

(2) An employer who is a party to a dispute shall be entitled to be represented in any proceeding under this Act by--

(a) an officer of an association of employers of which he is a member;

(b) an officer of a federation of association of employers to which the association referred to in clause (a) is affiliated;

(c) where the employer is not a member of any association of employers, by an officer of any association of employers connected with, or by any other employer engaged in,

Supreme Court of India Important Judgments And Leading Case Law Related to Section 36 The Industrial Disputes Act, 1947: 

the industry in which the employer is engaged and authorized in such manner as may be prescribed.

(3) No party to a dispute shall be entitled to be represented by a legal practitioner in any conciliation proceedings under this Act or in any proceedings before a Court.

(4) In any proceeding 1 before a Labour Court, Tribunal or National Tribunal], a party to a dispute may be represented by a legal practitioner with the consent of the other parties to the proceeding and 2 with the leave of the Labour Court, Tribunal or National Tribunal, as the case may be].


औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 36 का विवरण - 

 पक्षकारों का प्रतिनिधित्व-(1) वह कर्मकार जो विवाद में पक्षकार है इस बात का हकदार होगा कि इस अधिनियम के अधीन किसी भी कार्यवाही में उसका प्रतिनिधित्व-

(क) उस रजिस्ट्रीकृत व्यवसाय संघ की, जिसका वह सदस्य है, 2[कार्यपालिका के किसी सदस्य या अन्य पदाधिकारी] द्वारा,

(ख) व्यवसाय संघों के उस परिसंघ की, जिससे खंड (क) में निर्दिष्ट व्यवसाय संघ संबद्ध है, 1[कार्यपालिका के किसी सदस्य या अन्य पदाधिकारी] द्वारा,

(ग) जहां कि कर्मकार किसी व्यवसाय संघ का सदस्य नहीं है वहां, उस उद्योग से, जिसमें कर्मकार नियोजित है, संसक्त किसी व्यवसाय संघ की 1[कार्यपालिका के किसी सदस्य या अन्य पदाधिकारी] द्वारा या उस उद्योग में नियोजित ऐसे अन्य कर्मकार द्वारा जो ऐसी रीति से प्राधिकृत है, जैसी विहित की जाए,किया जाए ।

(2) वह नियोजक जो विवाद में पक्षकार है इस बात का हकदार होगा कि इस अधिनियम के अधीन की किसी भी कार्यवाही में उसका प्रतिनिधित्व-

(क) उस नियोजक-संगम के, जिसका वह सदस्य है, किसी अधिकारी द्वारा;

(ख) नयोजक-संगमों के, उस परिसंघ के, जिससे खंड (क) में निर्दिष्ट संगम संबद्ध है, किसी अधिकारी द्वारा;

(ग) जहां कि नियोजक किसी नियोजक-संगम का सदस्य नहीं है, वहां, उस उद्योग से, जिसमें वह नियोजक लगा हुआ है संसक्त नियोजक-संगम के ऐसे अधिकारी द्वारा या उसमें लगे हुए ऐसे अन्य नियोजक द्वारा जो ऐसी रीति से प्राधिकृत है, जैसी विहति की जाए,किया जाए ।

(3) विवाद का कोई भी पक्षकार इस बात का हकदार न होगा कि इस अधिनियम के अधीन की सुलह कार्यवाहियों में या न्यायालय के समक्ष की कार्यवाहियों में उसका प्रतिनिधित्व किसी विधि-व्यवसायी द्वारा किया जाए ।

(4) विवाद के किसी भी पक्षकार का प्रतिनिधित्व 3[श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण के समक्षट किसी कार्यवाही में, कार्यवाही के अन्य पक्षकारों की सम्मति से और, 4[यथास्थिति, श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण की इजाजत से] विधि-व्यवसाय द्वारा किया जा सकेगा ।]



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