Section 33C The Industrial Disputes Act, 1947

 Section 33C The Industrial Disputes Act, 1947: 


 Recovery of money due from an employer.-

(1) Where any money is due to a workman from an employer under a settlement or an award or under the provisions of 4 Chapter VA or Chapter VB], the workman himself or any other person authorised by him in writing in this behalf, or, in the case of the death of the workman, his assignee or heirs may, without prejudice to any other mode of recovery, make an application to the appropriate Government for the recovery of the money due to him, and if the appropriate Government is satisfied that any money is so due, it shall issue a certificate for that amount to the Collector who shall proceed to recover the same in the same manner as an arrear of land revenue: Provided that every such application shall be made within one year from the date on which the money became due to the workman from the employer: Provided further that any such application may be entertained after the expiry of the said period of one year, if the appropriate Government is satisfied that the applicant had sufficient cause for not making the application within the said period.

(2) Where any workman is entitled to receive from the employer any money or any benefit which is capable of being computed in terms of money and if any question arises as to the amount of money due or as to the amount at which such benefit should be computed, then the question may, subject to any rules that may be made under this Act, be decided by such Labour Court as may be specified in this behalf by the appropriate Government; 1 within a period not exceeding three months:] 2 Provided that where the presiding officer of a Labour Court considers it necessary or expedient so to do, he may, for reasons to be recorded in writing, extend such period by such further period as he may think fit.]

(3) For the purposes of computing the money value of a benefit, the Labour Court may, if it so thinks fit, appoint a commissioner who shall, after taking such evidence as may be necessary, submit a report to the Labour Court and the Labour Court shall determine the amount after considering the report of the commissioner and other circumstances of the case.

(4) The decision of the Labour Court shall be forwarded by it to the appropriate Government and any amount found due by the Labour Court may be recovered in the manner provided for in sub- section (1).

(5) Where workmen employed under the same employer are entitled to receive from him any money or any benefit capable of being computed in terms of money, then, subject to such rules as may be made in this behalf, a single application for the recovery of the amount due may be made on behalf of or in respect of any number of such workmen. Explanation.-- In this section" Labour Court" includes any court constituted under any law relating to investigation and settlement of industrial disputes in force in any State.]]


Supreme Court of India Important Judgments And Leading Case Law Related to Section 33C The Industrial Disputes Act, 1947: 

National Buildings Construction vs Pritam Singh Gill And Others on 29 March, 1972

R. B. Bansilal Abirchand Milis Co. vs Labour Court Nagpur & Ors on 25 November, 1971

Chief Mining Engineer East India  vs Rameswar And Ors on 8 August, 1967

Punjab National Bank Limited vs K. L. Kharbanda on 2 February, 1962

The Sawatram Ramprasad Mills Co. vs Baliram Ukandaji And Another on 9 September, 1965

Vijaya Bank vs Shyamal Kumar Lodh on 6 July, 2010

P.K. Singh And Others vs Presiding Officer & Others on 15 July, 1988

Bombay Gas Co. Ltd vs Gopal Bhiva & Ors on 9 May, 1963

State Bank Of Bikaner & Jaipur vs Shri Hari Har Nath Bhargava on 11 August, 1971

Hindustan Lever Ltd vs Ram Mohan Ray & Ors. (With  on 7 March, 1973



औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 33 ग का विवरण - 

नियोजक से शोध्य धन की वसूली-(1) जहां कि किसी समझौते या अधिनिर्णय के अधीन या 7[अध्याय 5क या अध्याय 5ख] के उपबन्धों के अधीन किसी कर्मकार को नियोजक से कोई धन शोध्य हो, वहां स्वयं वह कर्मकार या उसके द्वारा इस निमित्त लिखित रूप में प्राधिकृत कोई अन्य व्यक्ति, या कर्मकार की मृत्यु हो जाने की दशा में उसका समनुदेशिती या उसके वारिस, उसे शोध्य धन की वसूली के लिए समुचित सरकार से आवेदन, वसूली के किसी अन्य ढंग पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, कर सकेंगे, और यदि समुचित सरकार का समाधान हो जाता है कि कोई धन इस प्रकार शोध्य है, तो वह उस रकम के लिए कलक्टर को एक प्रमाणपत्र भेजेगी जो उसकी वसूली के लिए उसी रीति से अग्रसर होगा जैसे भू-राजस्व की बकाया वसूल की जाती हैः

परन्तु ऐसा हर आवेदन, उस तारीख से, जिसको कर्मकार को नियोजक से धन शोध्य हुआ था, एक वर्ष के भीतर किया जाएगाः

परन्तु यह और कि ऐसा कोई आवेदन एक वर्ष की उक्त कालावधि के अवसान के पश्चात् भी ग्रहण किया जा सकेगा यदि समुचित सरकार का यह समाधान हो जाता है कि उक्त कालावधि के भीतर आवेदन न करने के लिए आवेदक के पास पर्याप्त कारण था ।(2) जहां कि कर्मकार नियोजक से कोई धन या ऐसी प्रसुविधा, जो धन के रूप में संगणित की जा सकती है, प्राप्त करने का हकदार है और शोध्य धन की रकम के बारे में या उस रकम के बारे में, जितनी ऐसी प्रसुविधा के लेखे संगणित की जानी चाहिए, कोई प्रश्न पैदा होता है, तो वह प्रश्न, उन नियमों के अध्यधीन रहते हुए जो इस अधिनियम के अधीन बनाए जाएं, उस श्रम न्यायालय द्वारा जिसे समुचित सरकार इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे विनिश्चित किया जा सकेगा  1[तीन मास से अनधिक कालावधि के भीतर :]

1[परन्तु जहां श्रम न्यायालय का पीठासीन अधिकारी ऐसा करना आवश्यक या समीचीन समझता है, वहां वह ऐसे कारणों सहित जो अभिलिखित किए जाएं, ऐसी कालावधि को ऐसी अतिरिक्त कालावधि के लिए, जो वह उचित समझे, विस्तारित कर सकेगा ।]

(3) किसी प्रसुविधा का धन-मूल्य संगणित करने के प्रयोजनों के लिए, श्रम न्यायालय, यदि वह ऐसा करना ठीक समझे, एक आयुक्त की नियुक्ति कर सकेगा जो ऐसा साक्ष्य लेने के पश्चात् जो आवश्यक हो, श्रम न्यायालय को रिपोर्ट निवेदित करेगा और श्रम न्यायालय आयुक्त की रिपोर्ट और मामले की अन्य परिस्थितियों पर विचार करने के पश्चात् रकम अवधारित करेगा ।

(4) श्रम न्यायालय का विनिश्चय उसके द्वारा समुचित सरकार को अग्रेषित किया जाएगा और श्रम न्यायालय द्वारा शोध्य पाई गई रकम उपधारा (1) में उपबन्धित रीति से वसूल की जा सकेगी ।

(5) जहां कि एक ही नियोजक के अधीन नियोजित कर्मकार उससे कोई धन या कोई ऐसी प्रसुविधा, जो धन के रूप में संगणित की जा सकती है, प्राप्त करने के हकदार हों, वहां उन नियमों के अध्यधीन रहते हुए जो इस निमित्त बनाए जाएं, ऐसे कितने ही कर्मकारों की ओर से या उनकी बाबत एक ही आवेदन शोध्य रकम की वसूली के लिए किया जा सकेगा ।

स्पष्टीकरण-इस धारा में “श्रम न्यायालय" के अन्तर्गत ऐसा न्यायालय आता है जो किसी भी राज्य में प्रवृत्त किसी ऐसी विधि के अधीन गठित किया गया हो जो औद्योगिक विवादों के अन्वेषण और समझौते से संबंधित है



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