Section 33 The Industrial Disputes Act, 1947

 

Section 33 The Industrial Disputes Act, 1947: 


 Conditions of service, etc., to remain unchanged under certain circumstances during pendency of proceedings.-

(1) During the pendency of any conciliation proceeding before a conciliation officer or a Board or of any proceeding before 2 an arbitrator or] a Labour Court or Tribunal or National Tribunal in respect of an industrial dispute, no employer shall--

(a) in regard to any matter connected with the dispute, alter, to the prejudice of the workmen concerned in such dispute, the conditions of service applicable to them immediately before the commencement of such proceeding; or

(b) for any misconduct connected with the dispute, discharge or punish, whether by dismissal or otherwise, any workmen concerned in such dispute, save with the express permission in writing of the authority before which the proceeding is pending.

(2) During the pendency of any such proceeding in respect of an industrial dispute, the employer may, in accordance with the standing orders applicable to a workman concerned in such dispute 2 or, where there are no such standing orders, in accordance with the terms of the contract, whether express or implied, between him and the workman],--

(a) alter, in regard to any matter not connected with the dispute, the conditions of service applicable to that workman immediately before the commencement of such proceeding; or

(b) for any misconduct not connected with the dispute, or discharge or punish, whether by dismissal or otherwise, that workman: Provided that no such workman shall be discharged or dismissed, unless he has been paid wages for one month and an application has been made by the employer to the authority before which the proceeding is pending for approval of the action taken by the employer.

(3) Notwithstanding anything contained in sub- section (2), no employer shall, during the pendency of any such proceeding in respect of an industrial dispute, take any action against any protected workman concerned in such dispute--

(a) by altering, to the prejudice of such protected workman, the conditions of service applicable to him immediately before the commencement of such proceedings; or

(b) by discharging or punishing, whether by dismissal or otherwise, such protected workman, save with the express permission in writing of the authority before which the proceeding is pending. Explanation.-- For the purposes of this sub- section, a" protected workman", in relation to an establishment, means a workman who, being 1 a member of the executive or other office bearer] of a registered trade union connected with the establishment, is recognised as such in accordance with rules made in this behalf.

(4) In every establishment, the number of workmen to be recognised as protected workmen for the purposes of sub- section (3) shall be one per cent. of the total number of workmen employed therein subject to a minimum number of five protected workmen and a maximum number of one hundred protected workmen and for the aforesaid purpose, the appropriate Government may make rules providing for the distribution of such protected workmen among various trade unions, if any, connected with the establishment and the manner in which the workmen may be chosen and recognised as protected workmen.

(5) Where an employer makes an application to a conciliation officer, Board, 2 an arbitrator, a] labour Court, Tribunal or National Tribunal under the proviso to sub- section (2) for approval of the action taken by him, the authority concerned shall, without delay, hear such application and pass, 3 within a period of three months from the date of receipt of such application], such order in relation thereto as it deems fit:] 4 Provided that where any such authority considers it necessary or expedient so to do, it may, for reasons to be recorded in writing, extend such period by such further period as it may think fit: Provided further that no proceedings before any such authority shall lapse merely on the ground that any period specified in this sub- section had expired without such proceedings being completed.]


Supreme Court of India Important Judgments And Leading Case Law Related to Section 33 The Industrial Disputes Act, 1947: 

Punjab Beverages Pvt. Ltd., vs Suresh Chand And Anr on 21 February, 1978

Jalan Trading Co. (Private Ltd.) vs Mill Mazdoor Union(With on 5 August, 1966

The Management Of Hotel Imperial, vs Hotel Workers' Union on 21 May, 1959

Shankar Chakravarti vs Britannia Biscuit Co.Ltd. & Anr on 4 May, 1979

The Punjab National Bank, Ltd vs Its Workmen on 24 September, 1959

Rajasthan State R.T.C. & Anr vs Satya Prakash on 9 April, 2013

Jaipur Zila Sahakari Bhoomi Vikas vs Ram Gopal Sharma & Ors on 17 January, 2002

Jaipur Zila Sah. Bhoomi Vikas Bank vs Shri Ram Gopal Sharma & Ors on 17 January, 2002

The Management Of Ranipur  vs Bhuban Singh And Others on 21 April, 1959

The Automobile Products Of India vs Rukmaji Bala And Others(And on 3 February, 1955



औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 33 का विवरण - 

कार्यवाहियों के लम्बित रहने के दौरान सेवा की शर्तों आदि का कतिपय परिस्थितियों में न बदला जाना-(1) किसी औद्योगिक विवाद की बाबत किसी सुलह अधिकारी या बोर्ड के समक्ष की किसी सुलह कार्यवाही के या 5[किसी मध्यस्थ या] श्रम न्यायालय या अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण के समक्ष की किसी कार्यवाही के लम्बित रहने के दौरान कोई भी नियोजक, ऐसे प्राधिकारी की, जिसके समक्ष कार्यवाही लम्बित है, लिखित अभिव्यक्त अनुज्ञा के बिना-

न तो उस विवाद से संसक्त किसी विषय के बारे में उन सेवा की शर्तों को, जो ऐसी कार्यवाही के प्रारम्भ से ठीक पहले ऐसे विवाद से संपृक्त कर्मकारों को लागू होती हैं, इस प्रकार परिवर्तित करेगा कि उन कर्मकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े; और(ख) न ऐसे विवाद से संपृक्त किसी कर्मकार को, विवाद से संसक्त किसी अवचार के लिए, चाहे पदच्युति द्वारा या अन्यथा, उन्मोचित या दंडित करेगा ।

(2) किसी औद्योगिक विवाद की बाबत ऐसी किसी कार्यवाही के लम्बित रहने के दौरान, नियोजक, ऐसे विवाद से संपृक्त कर्मकार को लागू स्थायी आदेशों के अनुसार 3[या जहां कि ऐसे कोई स्थायी आदेश नहीं हैं वहां अपने और कर्मकार के बीच हुई किसी संविदा के अभिव्यक्त या विवक्षित निबन्धनों के अनुसार-]

(क) उन सेवा की शर्तों को, जो ऐसी कार्यवाही के प्रारम्भ से ठीक पहले उस कर्मकार को लागू होती है, विवाद से असंसक्त किसी विषय के बारे में परिवर्तित, अथवा

(ख) उस कर्मकार को विवाद से असंसक्त किसी अवचार के लिए, चाहे पदच्युति द्वारा या अन्यथा, उन्मोचित   दंडित, कर सकेगाः

परन्तु ऐसा कोई भी कर्मकार तब उन्मोचित या पदच्युत नहीं किया जाएगा जब तक कि उसे एक मास की मजदूरी दे दी गई हो और नियोजक ने उस प्राधिकारी से, जिसके समक्ष कार्यवाही लंबित है, अपने द्वारा की गई कार्यवाही के अनुमोदन के लिए आवेदन न कर दिया हो ।

(3) उपधारा (2) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, नियोजक किसी औद्योगिक विवाद की बाबत ऐसी किसी कार्यवाही के लम्बित रहने के दौरान, उस प्राधिकारी की लिखित अभिव्यक्त अनुज्ञा के बिना, जिसके, समक्ष कार्यवाही लम्बित है, ऐसे विवाद से सम्पृक्त किसी संरक्षित कर्मकार के विरुद्ध कोई ऐसी कार्रवाही नहीं करेगा जो-

(क) उन सेवा की शर्तों को, जो ऐसी कार्यवाही के प्रारम्भ से ठीक पहले उसे लागू थीं ऐसे परिवर्तित कर दे कि परिवर्तन का ऐसे संरक्षित कर्मकार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े, अथवा

(ख) ऐसे संरक्षित कर्मकार को पदच्युति द्वारा या अन्यथा उन्मोचित या दंडित करे ।

स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए किसी स्थापन के सम्बन्ध में संरक्षित कर्मकार" से वह कर्मकार अभिप्रेत है जिसे उस स्थापन से संसक्त रजिस्ट्रीकृत व्यवसाय संघ 1[की कार्यपालिका का कोई सदस्य या अन्य पदाधिकारी] होते हुए, इस निमित्त बनाए गए नियमों के अनुसार इस रूप में मान्यताप्राप्त है ।

(4) हर स्थापन में, ऐसे कर्मकारों की संख्या, जिन्हें उपधारा (3) के प्रयोजनों के लिए संरक्षित कर्मकारों के रूप में मान्यताप्राप्त होगी, उसमें नियोजित कर्मकारों की कुल संख्या का एक प्रतिशत होगी, किन्तु संरक्षित कर्मकारों की संख्या कम से कम पांच और अधिक से अधिक एक सौ होगी, और पूर्वोक्त प्रयोजन के लिए समुचित सरकार स्थापन से संसक्त विभिन्न व्यवसाय संघों के, यदि कोई हों, बीच ऐसे संरक्षित कर्मकारों के वितरण के लिए और ऐसी रीति के लिए, जिससे कर्मकार संरक्षित कर्मकारों के रूप में चुने जा सकेंगे और उन्हें मान्यता दी जा सकेगी, उपबन्ध करने वाले नियम बना सकेगी ।

(5) जहां कि कोई नियोजक अपने द्वारा की गई कार्रवाई के अनुमोदन के लिए उपधारा (2) के परन्तुक के अधीन सुलह अधिकारी, बोर्ड, 2[मध्यस्थ,] श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण से आवेदन करता है, वहां सम्पृक्त प्राधिकारी अविलम्ब ऐसे आवेदन की सुनवाई करेगा और उसके सम्बन्ध में 1[ऐसे आवेदन की प्राप्ति की तारीख से तीन मास की कालावधि के भीतर] ऐसा आदेश देगा जैसा वह ठीक समझेः]

2[परन्तु जहां ऐसा कोई प्राधिकरण ऐसा करना आवश्यक या समीचीन समझता है, वहां वह ऐसे कारणों सहित जो अभिलिखित किए जाएं, ऐसी कालावधि को ऐसी अतिरिक्त कालावधि के लिए जो वह उचित समझे, विस्तारित कर सकेगाः

परन्तु यह और कि ऐसे किसी प्राधिकरण के समक्ष कोई कार्यवाही केवल इस आधार पर व्यपगत नहीं होगी कि इस उपधारा में विनिर्दिष्ट कालावधि, ऐसी कार्यवाहियों के पूरा होने के बिना ही, समाप्त हो गई थी ।]



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