Section 11 The Industrial Disputes Act, 1947

 

Section 11 The Industrial Disputes Act, 1947: 

  Procedure and powers of conciliation officers, Boards, Courts and Tribunals.- 3

(1) Subject to any rules that may be made in this behalf, an arbitrator, a Board, Court, Labour Court, Tribunal or National Tribunal shall follow such procedure as the arbitrator or other authority concerned may think fit.]

(2) A conciliation officer or a member of a Board, 4 or Court or the presiding officer of a Labour Court, Tribunal or National Tribunal]

may for the purpose of inquiry into any existing or apprehended industrial dispute, after giving reasonable notice, enter the premises occupied by any establishment to which the dispute relates.

(3) Every Board, Court, 1 Labour Court, Tribunal and National Tribunal] shall have the same powers as are vested in a Civil Court under the Code of Civil Procedure, 1908 (5 of 1908 ), when trying a suit, in respect of the following matters, namely:--

(a) enforcing the attendance of any person and examining him on oath;

(b) compelling the production of documents and material objects;

(c) issuing commissions for the examination of witnesses;

(d) in respect of such other matters as may be prescribed; and every inquiry or investigation by a Board, Court, 2 Labour Court, Tribunal or National Tribunal], shall be deemed to be a judicial proceeding within the meaning of sections 193 and 228 of the Indian Penal Code (45 of 1860 ).

(4) A conciliation officer 3 may enforce the attendance of any person for the purpose of examination of such person or call for] and inspect any document which he has ground for considering to be relevant to the industrial dispute 4 or to be necessary for the purpose of verifying the implementation of any award or carrying out any other duty imposed on him under this Act, and for the aforesaid purposes, the conciliation officer shall have the same powers as are vested in a Civil Court under the Code of Civil Procedure, 1908 (5 of 1908 ), 3 in respect of enforcing the attendance of any person and examining him or of compelling the production of documents].

(5) 5 A Court, Labour Court, Tribunal or National Tribunal may, if it so thinks fit, appoint one or more persons having special knowledge of the matter under consideration as assessor or assessors to advise it in the proceeding before it.

(6) All conciliation officers, members of a Board or Court and the presiding officers of a Labour Court, Tribunal or National Tribunal shall be deemed to be public servants within the meaning of section 21 of the Indian Penal Code (45 of 1860 ).

(7) Subject to any rules made under this Act, the costs of, and incidental to, any proceeding before a Labour Court, Tribunal or National Tribunal shall be in the discretion of that Labour Court,

Tribunal or National Tribunal and the Labour Court, Tribunal or National Tribunal, as the case may be, shall have full power to determine by and to whom and to what extent and subject to what conditions, if any, such costs are to be paid, and to give all necessary directions for the purposes aforesaid and such costs may, on application made to the appropriate Government by the person entited, be recovered by that Government in the same manner as an arrear of land revenue.]

(8) 1 Every 2 Labour Court, Tribunal or National Tribunal] shall be deemed to be Civil Court for the purposes of 3 sections 345, 346 and 348 of the Code of Criminal Procedure, 1973 (5 of 1898 ).]



Supreme Court of India Important Judgments And Leading Case Law Related to Section 11 The Industrial Disputes Act, 1947: 

The Life Insurance Corporation Of  vs D. J. Bahadur & Ors on 10 November, 1980

Grindlays Bank Ltd vs Central Government Industrial on 12 December, 1980

Express Newspapers (Private) vs The Union Of India And Others(And on 8 January, 1958

M/S. Haryana Suraj Malting Ltd. vs Phool Chand on 18 May, 2018

Punjab National Bank Ltd vs Sri Ram Kanwar, Industrial  on 20 December, 1956

Life Insurance Corporation Of  vs Sunil Kumar Mukherjee & Ors on 22 November, 1963

Gujarat Steel Tubes Ltd vs Gujarat Steel Tubes Mazdoor Sabha on 19 November, 1979

Express Newspapers (Private) vs The Union Of India (Uoi) And Ors. on 19 March, 1958

The Tata Oil Mills Co. Ltd vs K.V. Gopalan And Ors on 15 April, 1965

The Bharat Bank Ltd., Delhi vs Employees Of The Bharat Bank on 26 May, 1950



औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 11 का विवरण - 

सुलह अधिकारियों, बोर्डों, न्यायालयों और अधिकरणों की प्रक्रिया और शक्तियां- 1[(1) उन नियमों के अध्यधीन रहते हुए जो इस निमित्त बनाए जाएं, मध्यस्थ, बोर्ड, न्यायालय, श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण ऐसी प्रक्रिया का अनुसरण करेगा, जैसी मध्यस्थ या अन्य प्राधिकारी, जो सम्पृक्त हो, ठीक समझे ।]

(2) सुलह अधिकारी, या बोर्ड का सदस्य, 2[या न्यायालय या श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण का पीठासीन अधिकारी], किसी विद्यमान या आशंकित औद्योगिक विवाद की जांच के प्रयोजन के लिए, युक्तियुक्त सूचना देने के पश्चात्, किसी ऐसे परिसर में प्रवेश कर सकेगा जो किसी ऐसे स्थापन के अधिभोग में हो जिससे वह विवाद संबद्ध हो ।

(3) हर बोर्ड, न्यायालय, 3[श्रम न्यायालय, अधिकरण और राष्ट्रीय अधिकरण] को निम्नलिखित विषयों की बाबत, अर्थात्ः-

                (क) किसी व्यक्ति को हाजिर कराने और शपथ पर उसकी परीक्षा करने के लिए,

                (ख) दस्तावेज और भौतिक पदार्थ पेश करने को विवश करने के लिए,

                (ग) साक्षियों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालने के लिए,

                (घ) ऐसे अन्य विषयों की बाबत, जैसे विहित किए जाएं,

वही शक्तियां होंगी जो वाद का विचारण करते समय सिविल न्यायालय में सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन निहित होती हैं और बोर्ड, न्यायालय, 4[श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण] द्वारा की जाने वाली हर जांच या अन्वेषण को भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धाराओं 193 और 228 के अर्थ के अन्दर न्यायिक कार्यवाही समझा जाएगा ।

(4) सुलह अधिकारी 5[किसी व्यक्ति की परीक्षा करने के प्रयोजन के लिए ऐसे व्यक्ति की हाजिरी प्रवर्तित करा सकेगा या किसी ऐसी दस्तावेज को मंगा सकेगा] और उसका निरीक्षण कर सकेगा, जिसके बारे में उसके पास यह समझने का आधार हो कि वह औद्योगिक विवाद से सुसंगत है 6[या किसी अधिनिर्णय के कार्यान्वयन को सत्यापित करने या इस अधिनियम के अधीन उस पर अधिरोपित किसी अन्य कर्तव्य का पालन करने के लिए आवश्यक है और पूर्वोक्त प्रयोजनों के लिए 2[किसी व्यक्ति की हाजिरी प्रवर्तित कराने और उसकी परीक्षा करने या दस्तावेजों को पेश करने के लिए विवश करने की बाबत] सुलह अधिकारी को वे ही शक्तियां होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन सिविल न्यायालय में निहित होती हैं ।]1[(5) यदि न्यायालय, श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण ऐसा करना ठीक समझे तो वह विचाराधीन विषय का विशिष्ट ज्ञान रखने वाले एक या अधिक व्यक्तियों को अपने समक्ष की कार्यवाहियों में सलाह देने के लिए असेसर या असेसरों के रूप में नियुक्त कर सकेगा ।

(6) सभी सुलह अधिकारी, बोर्ड या न्यायालय के सदस्य और श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण के पीठासीन अधिकारी भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ के अन्दर लोक सेवक समझे जाएंगे 

(7) श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण के समक्ष की किसी कार्यवाही के और उससे आनुषंगिक खर्चों को दिलाना इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों के अध्यधीन रहते हुए उस श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण के विवेकाधिकार में होगा और, यथास्थिति, उस श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण को यह अवधारित करने की, कि ऐसे खर्च जिसके द्वारा और जिसको और कितने तक तथा किन शर्तों के, यदि कोई हों, अध्यधीन रहते हुए दिए जाने हैं, और पूर्वोक्त प्रयोजनों के लिए सभी आवश्यक निदेश देने की पूरी शक्ति होगी और ऐसे खर्च, हकदार व्यक्ति द्वारा समुचित सरकार को आवेदन किए जाने पर, उस सरकार द्वारा उस रीति से वसूल किए जा सकेंगे जैसे भू-राजस्व की बकाया वसूल की जाती है ।]

 2[(8) हर 3[श्रम न्यायालय, अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण] 4[दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 345, 346 और 348] के प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा ।]

 5[(9) श्रम न्यायालय या अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण द्वारा दिए गए प्रत्येक पंचाट, जारी किए गए आदेश या उसके समक्ष किए गए समझौते का निष्पादन सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के आदेश 21 के अधीन सिविल न्यायालय के आदेशों और डिक्री के निष्पादन के लिए अधिकथित प्रक्रिया के अनुसार किया जाएगा ।

(10) यथास्थिति, श्रम न्यायालय या अधिकरण या राष्ट्रीय अधिकरण किसी पंचाट, आदेश या समझौते को, अधिकारिता रखने वाले किसी सिविल न्यायालय को पारेषित करेगा और ऐसा सिविल न्यायालय उस पंचाट, आदेश या समझौते का निष्पादन ऐसे करेगा मानो वह उसके द्वारा पारित की गई कोई डिक्री हो ।


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