Protection of Human Rights Act in Hindi | मानव अधिकार सरंक्षण अधिनियम, 1993
Protection of Human Rights Act in Hindi | मानव अधिकार सरंक्षण अधिनियम, 1993
मानव अधिकार सरंक्षण अधिनियम 1993 भारत की संसद के द्वारा बनाया गया था। यह कानून भारत के द्वारा अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से भारत की जिम्मेदारी को आगे बढ़ाते हुए बनाया गया था। इस कानून में ८ चैप्टर तथा ४३ धाराएं है। इसके द्वारा भारत के संविधान तथा संयुक्त राष्ट्र के द्वारा जो मानवाधिकार प्रत्येक व्यक्ति को मिले हुए हैं उनका सरंक्षण करना है। मानव अधिकार सरंक्षण अधिनियम, १९९३ के द्वारा यह सुनिश्चित किया गया है की भारत में एक राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग बने। उसके सदस्य कौन बन सकते हैं, उनकी योग्यता क्या होनी चाहिए, उनकी जिम्मेदारियां क्या होंगी, उनके अधिकार क्या होंगे, काम करने की प्रक्रिया क्या होगी, अत्यादि ? यह सब इस कानून में विस्तार से दिया गया है। इस कानून में यह भी बताया गया है की राज्यों में भी मानवाधिकार आयोग बनेंगे तथा उनके बारे में भी विस्तार से कानून में दिया गया है।
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कुछ जानकारियां तथा पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न -
मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष कौन हैं ?
जस्टिस अरुण कुमार मिश्रा (रिटायर्ड जज, सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया )
मानव अधिकार संरक्षण क्या है?
मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 2 के अनुसार ''मानव अधिकारों'' का अर्थ है संविधान के अंतर्गत गांरटित अथवा अंतरराष्ट्रीय प्रसंविदाओं में सम्मिलित तथा भारत में न्यायालयों द्वारा प्रवर्तनीय जीवन, स्वतंत्रता, समानता तथा व्यक्ति की गरिमा से संबंधित अधिकार।
मानव अधिकार संरक्षण कब लागू हुआ?
राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने 12 अक्टूबर, 1993 को मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के तहत अपने स्थापना काल से ही मानव अधिकारों के संवर्द्धन एवं संरक्षण के कार्य को करते हुए अपने 24 वर्ष पूरे कर लिए हैं।
मानव अधिकार कितने होते है?
संविधान द्वारा मूल रूप से सात मूल अधिकार प्रदान किए गए थे- समानता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, शोषण के विरुद्ध अधिकार, धर्म, संस्कृति एवं शिक्षा की स्वतंत्रता का अधिकार, संपत्ति का अधिकार तथा संवैधानिक उपचारों का अधिकार।
आयोग कहां पर स्थित है तथा इसके संपर्क नम्बर क्या हैं ?
राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग
मानव अधिकार भवन, ब्लॉक-सी,
जी.पी.ओ. कम्प्लेक्स, आई.एन.ए., नई दिल्ली - 110023
सुविधा केन्द्र (मदद) : (011) 24651330, 24663333
मोबाइल नं. - 9810298900 (शिकायतों के लिए 24 घंटे)
फैक्स : (011) 24651332
ई मेल: cr[dot]nhrc[at]nic[dot]in
वेबसाइट : www.nhrc.nic.in
क्या आयोग स्वायत्ता है ?
हाँ, आयोग की स्वायत्तता में अन्य बातों के साथ-साथ इसके अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति, उनके कार्यकाल का निर्धारण तथा इस संबंध में सांविधिक गारंटी, उनको दिए गए स्टेटस तथा किस प्रकार आयोग के लिए उत्तारदायी स्टाफ है - अपना अन्वेषण दल उनकी नियुक्ति तथा उनका संचालन करना शामिल हैं - आयोग की वित्तीय स्वायत्तता का वर्णन अधिनियम की धारा 32 में किया गया है।
आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली समिति, जिसमे लोकसभा का स्पीकर, गृहमंत्री, लोकसभा एवं राज्यसभा में विपक्ष के नेता तथा सदस्य के रूप में राज्य सभा के उपाध्यक्ष शामिल होते हैं, की सिफारिशों के आधार पर राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
क्या शिकायत किसी भी भाषा में हो सकती है ?
शिकायतें हिंदी, अंग्रेजी अथवा संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किसी भी भाषा में हो सकती हैं। शिकायतें स्वत: स्पष्ट अपेक्षित हैं। शिकायतों पर किसी प्रकार का शुल्क नहीं लिया जाता। आयोग जब कभी आवश्यक समझे अन्य सूचना अथवा आरोपों के समर्थन में हलफनामा दर्ज करने के लिए कह सकता है। आयोग अपने विवेक से टेलीग्राफिक शिकायतों तथा फैक्स अथवा ई-मेल से प्राप्त शिकायतों को स्वीकार कर सकता हैं। आयोग के मोबाइल टेलीफोन नम्बर पर भी शिकायतें की जा सकती हैं।
क्या आयोग का अपना अन्वेषण दल है ?
हाँ, मानव अधिकारों के हनन की शिकायतों पर जांच करने के लिए पुलिस महानिदेशक की अध्यक्षता में आयोग का अपना जांच स्टाफ है। अधिनियम के अंतर्गत किसी अधिकारी अथवा केन्द्र अथवा किसी राज्य सरकार के अन्वेषण अभिकरण की सेवाओं का उपयोग करने के लिए यह आयोग मुक्त है। आयोग जांच कार्य के लिए अनेक मामलों में गैर-सरकारी संगठनों को अपने साथ जोड़ा है।
मानव अधिकार सरंक्षण अधिनियम, 1993
(1994 का अधिनियम संख्यांक 10)
[8 जनवरी, 1994]
मानव अधिकारों के अधिक अच्छे सरंक्षण के लिए राष्ट्रीय मानव अधिकार
आयोग, राज्यों में राज्य मानव अधिकार आयोगों और
मानव अधिकार न्यायालयों का गठन करने
तथा उससे संसक्त या उसके आनुंषणिक
विषयों का उपबंध
करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के चवालीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
अध्याय 1
प्रारंभिक
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम मानव अधिकार सरंक्षण अधिनियम, 1993 है ।
(2) इसका विस्तार संपूर्ण भारत पर है :
परन्तु यह जम्मू-कश्मीर राज्य को केवल वहां तक लागू होगा जहां तक इसका संबंध उस राज्य को यथा लागू संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची 1 या सूची 3 में प्रगणित प्रविष्टियों में से किसी से संबंधित विषयों से है ।
(3) यह 28 सितम्बर, 1993 को प्रवृत्त हुआ समझा जाएगा ।
2. परिभाषाएं-(1) इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) सशस्त्र बल" से नौसेना, सेना और वायु सेना अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत संघ का कोई अन्य सशस्त्र बल है;
(ख) अध्यक्ष" से, यथास्थिति, आयोग का या राज्य आयोग का अध्यक्ष अभिप्रेत है;
(ग) आयोग" से धारा 3 के अधीन गठित राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग अभिप्रेत है;
(घ) मानव अधिकार" से प्राण, स्वतंत्रता, समानता और व्यक्ति की गरिमा से संबंधित ऐसे अधिकार अभिप्रेत हैं जो संविधान द्वारा प्रत्याभूत किए गए हैं या अन्तरराष्ट्रीय प्रसंविदाओं में सन्निविष्ट और भारत में न्यायालयों द्वारा प्रवर्तनीय हैं;
(ङ) मानव अधिकार न्यायालय" से धारा 30 के अधीन विनिर्दिष्ट मानव अधिकार न्यायालय अभिप्रेत है;
[(च) अन्तरराष्ट्रीय प्रसंविदा" से संयुक्त राष्ट्र की महासभा द्वारा 16 दिसंबर, 1966 को अंगीकार की गई सिविल और राजनीतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय प्रसंविदा और आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय प्रसंविदा तथा संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा द्वारा अंगीकार की गई ऐसी अन्य प्रसंविदा या अभिसमय, जो केन्द्रीय सरकार अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे, अभिप्रेत है;]
1[(छ) सदस्य" से, यथास्थिति, आयोग का या राज्य आयोग का सदस्य अभिप्रेत है;]
(ज) राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग" से राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992 (1992 का 19) की धारा 3 के अधीन गठित राष्ट्रीय अल्पंसख्यक आयोग अभिप्रेत है;
1[(झ) राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग" से संविधान के अनुच्छेद 338 में निर्दिष्ट राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग अभिप्रेत है;
(झक) राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग" से संविधान के अनुच्छेद 338क में निर्दिष्ट राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग अभिप्रेत है;]
(ञ) राष्ट्रीय महिला आयोग" से राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम, 1990 (1990 का 20) की धारा 3 के अधीन गठित राष्ट्रीय महिला आयोग अभिप्रेत है;
(ट) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है;
(ठ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;
(ड) लोक सेवक" का वही अर्थ है जो भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 में है;
(ढ) राज्य आयोग" से धारा 21 के अधीन गठित राज्य मानव अधिकार आयोग अभिप्रेत है ।
(2) इस अधिनियम में किसी ऐसी विधि के, जो जम्मू-कश्मीर राज्य में प्रवृत्त नहीं है, प्रति किसी निर्देश का उस राज्य के संबंध में, यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस राज्य में प्रवृत्त किसी तत्स्थानी विधि के, यदि कोई हो, प्रति निर्देश है ।
अध्याय 2
राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग
3. राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग का गठन-(1) केन्द्रीय सरकार, एक निकाय का, जो राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के नाम से ज्ञात होगा, इस अधिनियम के अधीन उसे प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करने और उसे सौंपे गए कृत्यों का पालन करने के लिए, गठन करेगी ।
(2) आयोग निम्नलिखित से मिलकर बनेगा, अर्थात् :-
(क) एक अध्यक्ष, जो उच्चतम न्यायालय का मुख्य न्यायमूर्ति रहा है;
(ख) एक सदस्य, जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश है या रहा है;
(ग) एक सदस्य, जो किसी उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायमूर्ति है या रहा है;
(घ) दो सदस्य, जो ऐसे व्यक्तियों में से नियुक्त किए जाएंगे जिन्हें मानव अधिकारों से संबंधित विषयों का ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव है ।
(3) राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग, [राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग] और राष्ट्रीय महिला आयोग के अध्यक्ष धारा 12 के खंड (ख) से खंड (ञ) में विनिर्दिष्ट कृत्यों के निर्वहन के लिए आयोग के सदस्य समझे जाएंगे ।
(4) एक महासचिव होगा, जो आयोग का मुख्य कार्यपालक अधिकारी होगा और वह आयोग की ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कृत्यों का निर्वहन करेगा, 1[(न्यायिक कृत्यों और धारा 40ख के अधीन विनियम बनाने की शक्ति के सिवाय) जो, यथास्थिति, आयोग या अध्यक्ष उसे प्रत्यायोजित करे ।]
(5) आयोग का मुख्यालय दिल्ली में होगा और आयोग, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से, भारत में अन्य स्थानों पर कार्यालय स्थापित कर सकेगा ।
4. अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति-(1) राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र द्वारा अध्यक्ष और [सदस्यों] को नियुक्त करेगा :
परन्तु इस उपधारा के अधीन प्रत्येक नियुक्ति ऐसी समिति की सिफारिशें प्राप्त होने के पश्चात् की जाएगी जो निम्नलिखित से मिलकर बनेगी, अर्थात् :-
(क) प्रधानमंत्री -अध्यक्ष;
(ख) लोक सभा का अध्यक्ष -सदस्य;
(ग) भारत सरकार के गृह मंत्रालय का भारसाधक मंत्री -सदस्य;
(घ) लोक सभा में विपक्ष का नेता -सदस्य;
(ङ) राज्य सभा में विपक्ष का नेता -सदस्य;
(च) राज्य सभा का उप सभापति -सदस्य :
परन्तु यह और कि उच्चतम न्यायालय का कोई आसीन न्यायाधीश या किसी उच्च न्यायालय का कोई आसीन मुख्य न्यायमूर्ति भारत के मुख्य न्यायमूर्ति से परामर्श करने के पश्चात् ही नियुक्त किया जाएगा, अन्यथा नहीं ।
(2) अध्यक्ष या किसी सदस्य की कोई नियुक्ति केवल इस कारण अविधिमान्य नहीं होगी कि 2[उपधारा (1) के पहले परन्तुक में निर्दिष्ट समिति में किसी सदस्य की कोई रिक्ति है ।]
[5. अध्यक्ष और सदस्यों का त्यागपत्र और हटाया जाना-(1) अध्यक्ष या कोई सदस्य, राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लिखित सूचना द्वारा अपना पद त्याग सकेगा ।
(2) उपधारा (3) के उपबंधों के अधीन रहते हुए अध्यक्ष, या किसी सदस्य को केवल साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर किए गए राष्ट्रपति के ऐसे आदेश से उसके पद से हटाया जाएगा, जो उच्चतम न्यायालय को, राष्ट्रपति द्वारा निर्देश किए जाने पर, उच्चतम न्यायालय द्वारा इस निमित्त विहित प्रक्रिया के अनुसार की गई जांच पर यह रिपोर्ट किए जाने के पश्चात् किया गया है कि, यथास्थिति, अध्यक्ष या ऐसे सदस्य को ऐसे किसी आधार पर हटा दिया जाए ।
(3) उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी, यदि, यथास्थिति, अध्यक्ष या कोई सदस्य,-
(क) दिवालिया न्यायनिर्णीत किया जाता है; या
(ख) अपनी पदावधि में अपने पद के कर्तव्यों के बाहर किसी सवेतन नियोजन में लगता है; या
(ग) मानसिक या शारीरिक शैथिल्य के कारण अपने पद पर बने रहने के अयोग्य है; या
(घ) विकृतचित्त का है और सक्षम न्यायालय की ऐसी घोषणा विद्यमान है; या
(ङ) किसी ऐसे अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया जाता है और कारावास से दण्डादिष्ट किया जाता है जिसमें, राष्ट्रपति की राय में, नैतिक अधमता अंतर्वलित है,
तो राष्ट्रपति, अध्यक्ष या ऐसे सदस्य को, आदेश द्वारा, पद से हटा सकेगा ।]
[6. अध्यक्ष और सदस्यों की पदावधि-(1) अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया कोई व्यक्ति, अपने पद ग्रहण की तारीख से पांच वर्ष की अवधि तक या सत्तर वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने तक, इनमें से जो भी पहले हो, अपना पद धारण करेगा ।
(2) सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया कोई व्यक्ति, अपने पद ग्रहण की तारीख से पांच वर्ष की अवधि तक अपना पद धारण करेगा तथा पांच वर्ष की और अवधि के लिए पुनर्नियुक्ति का पात्र होगा :
परन्तु कोई भी सदस्य सत्तर वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने के पश्चात् अपना पद धारण नहीं करेगा ।
(3) अध्यक्ष या कोई सदस्य, अपने पद पर न रह जाने पर, भारत सरकार के अधीन या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी भी और नियोजन का पात्र नहीं होगा ।]
7. कतिपय परिस्थितियों में सदस्य का अध्यक्ष के रूप में कार्य करना या उसके कृत्यों का निर्वहन-(1) अध्यक्ष की मृत्यु, पदत्याग या अन्य कारण से उसके पद में हुई रिक्ति की दशा में, राष्ट्रपति, अधिसूचना द्वारा, सदस्यों में से किसी एक सदस्य को अध्यक्ष के रूप में तब तक कार्य करने के लिए प्राधिकृत कर सकेगा जब तक ऐसी रिक्ति को भरने के लिए नए अध्यक्ष की नियुक्ति नहीं हो जाती ।
(2) जब अध्यक्ष छुट्टी पर अनुपस्थिति के कारण या अन्य कारण से अपने कृत्यों का निर्वहन करने में असमर्थ है तब सदस्यों में से एक ऐसा सदस्य, जिसे राष्ट्रपति, अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त प्राधिकृत करे, उस तारीख तक अध्यक्ष के कृत्यों का निर्वहन करेगा जिस तारीख को अध्यक्ष अपने कर्तव्यों को फिर से संभालता है ।
[8. अध्यक्ष और सदस्यों की सेवा के निबन्धन और शर्तें-अध्यक्ष और सदस्यों को संदेय वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा के अन्य निबन्धन और शर्तें ऐसी होंगी, जो विहित की जाएं :
परन्तु अध्यक्ष और किसी सदस्य के वेतन और भत्तों में तथा सेवा के अन्य निबन्धनों और शर्तों में उसकी नियुक्ति के पश्चात् उसके लिए अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जाएगा ।]
9. रिक्तियों आदि से आयोग की कार्यवाहियों का अविधिमान्य न होना-आयोग का कोई कार्य या कार्यवाही केवल इस आधार पर प्रश्नगत नहीं की जाएगी या अविधिमान्य नहीं होगी कि आयोग में कोई रिक्ति है या उसके गठन में कोई त्रुटि है ।
10. प्रक्रिया का आयोग द्वारा विनियमित किया जाना-(1) आयोग का अधिवेशन ऐसे समय और स्थान पर होगा, जो अध्यक्ष ठीक समझे ।
[(2) इस अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबंधों के अधीन रहते हुए, आयोग को अपनी प्रक्रिया के लिए विनियम अधिकथित करने की शक्ति होगी ।]
(3) आयोग के सभी आदेश और विनिश्चय महासचिव द्वारा या इस निमित्त अध्यक्ष द्वारा सम्यक् रूप से प्राधिकृत आयोग के किसी अन्य अधिकारी द्वारा अधिप्रमाणित किए जाएंगे ।
11. आयोग के अधिकारी और अन्य कर्मचारिवृन्द-(1) केन्द्रीय सरकार, आयोग को,-
(क) भारत सरकार के सचिव की पंक्ति का एक अधिकारी, जो आयोग का महासचिव होगा; और
(ख) ऐसे अधिकारी के अधीन, जो पुलिस महानिदेशक की पंक्ति से नीचे का न हो, ऐसे पुलिस और अन्वेषण कर्मचारिवृन्द तथा ऐसे अन्य अधिकारी और कर्मचारिवृन्द, जो आयोग के कृत्यों का दक्षतापूर्ण पालन करने के लिए आवश्यक हों, उपलब्ध कराएगी ।
(2) ऐसे नियमों के अधीन रहते हुए, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त बनाए जाएं, आयोग ऐसे अन्य प्रशासनिक, तकनीकी और वैज्ञानिक कर्मचारिवृन्द नियुक्त कर सकेगा, जो वह आवश्यक समझे ।
(3) उपधारा (2) के अधीन नियुक्त अधिकारियों और अन्य कर्मचारिवृन्द के वेतन, भत्ते और सेवा की शर्तें ऐसी होंगी, जो विहित की जाएं ।
अध्याय 3
आयोग के कृत्य और शक्तियां
12. आयोग के कृत्य-आयोग निम्नलिखित सभी या किन्हीं कृत्यों का पालन करेगा, अर्थात् :-
(क) स्वप्रेरणा से या किसी पीड़ित व्यक्ति द्वारा या उसकी ओर के किसी व्यक्ति द्वारा [या उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय के निदेश पर] उसको प्रस्तुत की गई अर्जी पर,-
(i) मानव अधिकारों का किसी लोक सेवक द्वारा अतिक्रमण या दुष्प्रेरण किए जाने की; या
(ii) ऐसे अतिक्रमण के निवारण में किसी लोक सेवक द्वारा उपेक्षा की,
शिकायत के बारे में जांच करना;
(ख) किसी न्यायालय के समक्ष लंबित किसी कार्यवाही में जिसमें मानव अधिकारों के अतिक्रमण का कोई अभिकथन अंतर्वलित है, उस न्यायालय के अनुमोदन से मध्यक्षेप करना;
[(ग) तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में किसी बात के होते हुए भी, राज्य सरकार के नियंत्रण के अधीन किसी जेल या किसी अन्य संस्था का, जहां व्यक्ति उपचार, सुधार या संरक्षण के प्रयोजनों के लिए निरुद्ध या दाखिल किए जाते हैं, वहां के निवासियों के जीवन की परिस्थितियों का अध्ययन करने के लिए, निरीक्षण करना और उन पर सरकार को सिफारिश करना;]
(घ) संविधान या मानव अधिकारों के सरंक्षण के लिए तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि द्वारा या उसके अधीन उपबंधित रक्षोपायों का पुनर्विलोकन करना और उनके प्रभावपूर्ण कार्यान्वयन के लिए उपायों की सिफारिश करना;
(ङ) ऐसी बातों का, जिनके अंतर्गत आतंकवाद के कार्य हैं, और जो मानव अधिकारों के उपभोग में विघ्न डालती हैं, पुनर्विलोकन करना और समुचित उपचारी उपायों की सिफारिश करना;
(च) मानव अधिकारों से संबंधित संधियों और अन्य अन्तरराष्ट्रीय लिखतों का अध्ययन करना और उनके प्रभावपूर्ण कार्यान्वयन के लिए सिफारिशें करना;
(छ) मानव अधिकारों के क्षेत्र में अनुसंधान करना और उसका संवर्धन करना;
(ज) समाज के विभिन्न वर्गों के बीच मानव अधिकारों संबंधी जानकारी का प्रसार करना और प्रकाशनों, संचार विचार, माध्यमों, गोष्ठियों और अन्य उपलब्ध साधनों के माध्यम से इन अधिकारों के संरक्षण के लिए उपलब्ध रक्षोपायों के प्रति जागरुकता का संवर्धन करना;
(झ) मानव अधिकारों के क्षेत्र में कार्यरत गैर-सरकारी संगठनों और संस्थाओं के प्रयासों को उत्साहित करना;
(ञ) ऐसे अन्य कृत्य करना, जो मानव अधिकारों के संवर्धन के लिए आवश्यक समझे जाएं ।
13. जांच से संबंधित शक्तियां-(1) आयोग को, इस अधिनियम के अधीन शिकायतों के बारे में जांच करते समय और विशिष्ट तथा निम्नलिखित विषयों के संबंध में वे सभी शक्तियां होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन किसी वाद का विचारण करते समय सिविल न्यायालय को हैं, अर्थात् :-
(क) साक्षियों को समन करना और हाजिर कराना तथा शपथ पर उनकी परीक्षा करना;
(ख) किसी दस्तावेज को प्रकट और पेश करने की अपेक्षा करना;
(ग) शपथपत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना ;
(घ) किसी न्यायालय या कार्यालय से कोई लोक अभिलेख या उसकी प्रतिलिपि अपेक्षित करना;
(ङ) साक्षियों या दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना;
(च) कोई अन्य विषय, जो विहित किया जाए ।
(2) आयोग को किसी व्यक्ति से, ऐसे किसी विशेषाधिकार के अधीन रहते हुए, जिसका उस व्यक्ति द्वारा तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन दावा किया जाए, ऐसी बातों या विषयों पर इत्तिला देने की अपेक्षा करने की शक्ति होगी, जो आयोग की राय में जांच की विषयवस्तु के लिए उपयोगी हों, या उससे सुसंगत हों और जिस व्यक्ति से, ऐसी अपेक्षा की जाए, वह भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 176 और धारा 177 के अर्थ में ऐसी इत्तिला देने के लिए वैध रूप से आबद्ध समझा जाएगा ।
(3) आयोग या आयोग द्वारा इस निमित्त विशेषतया प्राधिकृत कोई ऐसा अन्य अधिकारी, जो राजपत्रित अधिकारी की पंक्ति से नीचे का न हो, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 100 के उपबंधों के, जहां तक वे लागू हों, अधीन रहते हुए, किसी ऐसे भवन या स्थान में, जिसकी बाबत आयोग के पास यह विश्वास करने का कारण है कि जांच की विषय वस्तु से संबंधित कोई दस्तावेज वहां पाया जा सकता है, प्रवेश कर सकेगा और किसी ऐसे दस्तावेज को अभिगृहीत कर सकेगा अथवा उससे उद्धरण या उसकी प्रतिलिपियां ले सकेगा ।
(4) आयोग को सिविल न्यायालय समझा जाएगा और जब कोई ऐसा अपराध, जो भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 175, धारा 178, धारा 179, धारा 180 या धारा 228 में वर्णित है, आयोग की दृष्टिगोचरता में या उपस्थिति में किया जाता है, तब आयोग, अपराध गठित करने वाले तथ्यों तथा अभियुक्त के कथन को अभिलिखित करने के पश्चात्, जैसा कि दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2)में उपबंधित है, उस मामले को ऐसे मजिस्ट्रेट को भेज सकेगा जिसे उसका विचारण करने की अधिकारिता है और वह मजिस्ट्रेट जिसे कोई ऐसा मामला भेजा जाता है, अभियुक्त के विरुद्ध शिकायत सुनने के लिए इस प्रकार अग्रसर होगा मानो वह मामला दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 346 के अधीन उसको भेजा गया हो ।
(5) आयोग के समक्ष प्रत्येक कार्यवाही को भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और धारा 228 के अर्थ में तथा धारा 196 के प्रयोजनों के लिए न्यायिक कार्यवाही समझा जाएगा और आयोग को दंड प्रकिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 195 और अध्याय 26 के सभी प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा ।
[(6) जहां आयोग ऐसा करना आवश्यक और समीचीन समझता है, वहां वह आदेश द्वारा, उसके समक्ष फाइल की गई या लम्बित किसी शिकायत को उस राज्य के राज्य आयोग को, जिससे इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार निपटारे के लिए शिकायत उद्भूत होती है, अन्तरित कर सकेगा :
परन्तु ऐसी कोई शिकायत तब तक अन्तरित नहीं की जाएगी जब तक कि वह शिकायत ऐसी न हो जिसके संबंध में राज्य आयोग को उसे ग्रहण करने की अधिकारिता न हो ।
(7) उपधारा (6) के अधीन अन्तरित की गई प्रत्येक शिकायत पर राज्य आयोग द्वारा ऐसे कार्रवाई की जाएगी और उसका निपटारा किया जाएगा मानो वह शिकायत आरम्भ में उसके समक्ष फाइल की गई हो ।]
14. अन्वेषण-(1) आयोग, जांच से संबंधित कोई अन्वेषण करने के प्रयोजन के लिए, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार की सहमति से केन्द्रीय सरकार या उस राज्य सरकार के किसी अधिकारी या अन्वेषण अभिकरण की सेवाओं का उपयोग कर सकेगा ।
(2) जांच से संबंधित किसी विषय का अन्वेषण करने के प्रयोजन के लिए कोई ऐसा अधिकारी या अभिकरण, जिसकी सेवाओं का उपधारा (1) के अधीन उपयोग किया जाता है, आयोग के निदेशन और नियंत्रण के अधीन रहते हुए,-
(क) किसी व्यक्ति को समन कर सकेगा और हाजिर करा सकेगा तथा उसकी परीक्षा कर सकेगा;
(ख) किसी दस्तावेज को प्रकट और पेश किए जाने की अपेक्षा कर सकेगा; और
(ग) किसी कार्यालय से किसी लोक अभिलेख या उसकी प्रतिलिपि की अपेक्षा कर सकेगा ।
(3) धारा 15 के उपबंध किसी ऐसे अधिकारी या अभिकरण के समक्ष जिसकी सेवाओं का उपधारा (1) के अधीन उपयोग किया जाता है किसी व्यक्ति द्वारा किए गए किसी कथन के संबंध में वैसे ही लागू होंगे जैसे वे आयोग के समक्ष साक्ष्य देने के अनुक्रम में किसी व्यक्ति द्वारा किए गए किसी कथन के संबंध में लागू होते हैं ।
(4) जिस अधिकारी या अभिकरण की सेवाओं का उपयोग उपधारा (1) के अधीन किया जाता है वह जांच से संबंधित किसी विषय का अन्वेषण करेगा और उस पर आयोग को ऐसी अवधि के भीतर, जो आयोग द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट की जाए, रिपोर्ट देगा ।
(5) आयोग, उपधारा (4) के अधीन उसे दी गई रिपोर्ट में कथित तथ्यों के और निकाले गए निष्कर्षों के, यदि कोई हों, सही होने के बारे में अपना समाधान करेगा और इस प्रयोजन के लिए आयोग ऐसी जांच जिसके अंतर्गत उस व्यक्ति की या उन व्यक्तियों की परीक्षा है, जिसने या जिन्होंने अन्वषेण किया हो या उसमें सहायता की हो, कर सकेगा, जो वह ठीक समझे ।
15. आयोग के समक्ष व्यक्तियों द्वारा किए गए कथन-आयोग के समक्ष साक्ष्य देने के अनुक्रम में किसी व्यक्ति द्वारा किया गया कोई कथन, ऐसे कथन द्वारा मिथ्या साक्ष्य देने के लिए अभियोजन के सिवाय, उसे किसी सिविल या दांडिक कार्यवाही के अधीन नहीं करेगा या उसमें उसके विरुद्ध प्रयुक्त नहीं किया जाएगा :
परन्तु यह तब जब कि ऐसा कथन-
(क) ऐसे प्रश्न के उत्तर में किया जाता है जिसका उत्तर देने के लिए उससे आयोग द्वारा अपेक्षा की जाए; या
(ख) जांच की विषयवस्तु से सुसंगत है ।
16. उन व्यक्तियों की सुनवाई जिन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना संभाव्य है-यदि जांच के किसी अनुक्रम में,-
(क) आयोग किसी व्यक्ति के आचरण की जांच करना आवश्यक समझता है; या
(ख) आयोग की यह राय है कि जांच से किसी व्यक्ति की ख्याति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना संभाव्य है,
तो वह उस व्यक्ति को जांच में सुनवाई और अपनी प्रतिरक्षा में साक्ष्य प्रस्तुत करने का युक्तियुक्त अवसर देगा :
परन्तु इस धारा की कोई बात वहां लागू नहीं होगी जहां किसी साक्षी की विश्वसनीयता पर अधिक्षेप किया जा रहा है ।
अध्याय 4
प्रक्रिया
17. शिकायतों की जांच-आयोग, मानव अधिकारों के अतिक्रमण की शिकायतों की जांच करते समय,-
(i) केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार अथवा उसके अधीनस्थ किसी अन्य प्राधिकारी या संगठन से ऐसे समय के भीतर, जो आयोग द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाए, जानकारी या रिपोर्ट मांग सकेगा :
परन्तु,-
(क) यदि आयोग को नियत समय के भीतर जानकारी या रिपोर्ट प्राप्त नहीं होती है तो वह शिकायत के बारे में स्वयं जांच कर सकेगा;
(ख) यदि जानकारी या रिपोर्ट की प्राप्ति पर, आयोग का यह समाधान हो जाता है कि कोई और जांच अपेक्षित नहीं है अथवा अपेक्षित कार्रवाई संबंधित सरकार या प्राधिकारी द्वारा आरम्भ कर दी गई है या की जा चुकी है तो वह शिकायत के बारे में कार्यवाही नहीं कर सकेगा और शिकायतकर्ता को तद्नुसार सूचित कर सकेगा;
(ii) खंड (i) में अंतर्विष्ट किसी बात पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, यदि आयोग, शिकायत की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए आवश्यक समझता है तो जांच आरम्भ कर सकेगा ।
[18. जांच के दौरान और जांच के पश्चात् कार्रवाई-आयोग, इस अधिनियम के अधीन की गई किसी जांच के दौरान और उसके पूरा होने पर निम्नलिखित कार्रवाई कर सकेगा, अर्थात् :-
(क) जहां जांच से किसी लोक सेवक द्वारा मानव अधिकारों का अतिक्रमण या मानव अधिकारों के अतिक्रमण के निवारण में उपेक्षा या मानव अधिकारों के अतिक्रमण का उत्प्रेरण प्रकट होता है, तो वहां वह संबंधित सरकार या प्राधिकारी को-
(i) शिकायतकर्ता या पीड़ित व्यक्ति या उसके कुटुम्ब के सदस्यों को ऐसा प्रतिकर या नुकसानी का संदाय करने की सिफारिश कर सकेगा, जो आयोग आवश्यक समझे;
(ii) संबंधित व्यक्ति या व्यक्तियों के विरुद्ध अभियोजन के लिए कार्यवाहियां आरम्भ करने या कोई अन्य समुचित कार्रवाई करने के लिए, सिफारिश कर सकेगा, जो आयोग ठीक समझे;
(iii) ऐसी अन्य कार्रवाई करने की सिफारिश कर सकेगा, जिसे वह ठीक समझे;
(ख) उच्चतम न्यायालय या संबंधित उच्च न्यायालय को ऐसे निदेश, आदेश या रिट के लिए जो, वह न्यायालय आवश्यक समझे, अनुरोध करना;
(ग) जांच के किसी प्रक्रम पर सम्बद्ध सरकार या प्राधिकारी को पीड़ित व्यक्ति या उसके कुटुम्ब के सदस्यों को ऐसी तत्काल अन्तरिम सहायता मंजूर करने की, जो आयोग आवश्यक समझे, सिफारिश करना;
(घ) खण्ड (ङ) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, जांच रिपोर्ट की प्रति अर्जीदार या उसके प्रतिनिधि को उपलब्ध कराना;
(ङ) आयोग अपनी जांच रिपोर्ट की एक प्रति अपनी सिफारिशों सहित, संबंधित सरकार या प्राधिकारी को भेजेगा और संबंधित सरकार या प्राधिकारी, एक मास की अवधि के भीतर या ऐसे और समय के भीतर, जो आयोग अनुज्ञात करे, रिपोर्ट पर अपनी टीका-टिप्पणी आयोग को भेजेगा जिसके अन्तर्गत उस पर की गई या की जाने के लिए प्रस्तावित कार्रवाई है;
(च) आयोग, संबंधित सरकार या प्राधिकारी की टीका-टिप्पणी सहित, यदि कोई हो, अपनी जांच रिपोर्ट तथा आयोग की सिफारिशों पर संबंधित सरकार या प्राधिकारी द्वारा की गई या की जाने के लिए प्रस्तावित कार्रवाई को प्रकाशित करेगा ।]
19. सशस्त्र बलों की बाबत प्रक्रिया-(1) इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, आयोग, सशस्त्र बलों के सदस्यों द्वारा मानव अधिकारों के अतिक्रमण की शिकायतों के बारे में कार्रवाई करते समय, निम्नलिखित प्रक्रिया अपनाएगा, अर्थात् :-
(क) आयोग स्वप्रेरणा से या किसी अर्जी की प्राप्ति पर, केन्द्रीय सरकार से रिपोर्ट मांग सकेगा;
(ख) रिपोर्ट की प्राप्ति के पश्चात्, आयोग, यथास्थिति, शिकायत के बारे में कोई कार्यवाही नहीं करेगा या उस सरकार को अपनी सिफारिशें कर सकेगा ।
(2) केन्द्रीय सरकार, सिफारिशों पर की गई कार्रवाई के बारे में आयोग को तीन मास के भीतर या ऐसे और समय के भीतर जो आयोग अनुज्ञात करे, सूचित करेगी ।
(3) आयोग, केन्द्रीय सरकार को की गई अपनी सिफारिशों तथा ऐसी सिफारिशों पर, उस सरकार द्वारा की गई कार्रवाई सहित अपनी रिपोर्ट प्रकाशित करेगा ।
(4) आयोग, उपधारा (3) के अधीन प्रकाशित रिपोर्ट की प्रति, अर्जीदार या उसके प्रतिनिधि को उपलब्ध कराएगा ।
20. आयोग की वार्षिक और विशेष रिपोर्टें-(1) आयोग, केन्द्रीय सरकार को और संबंधित राज्य सरकार को वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा और किसी भी समय ऐसे विषय पर, जो उसकी राय में इतना अत्यावश्यक या महत्वपूर्ण है कि उसको वार्षिक रिपोर्ट के प्रस्तुत किए जाने तक आस्थगित नहीं किया जाना चाहिए, विशेष रिपोर्ट प्रस्तुत कर सकेगा ।
(2) यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार, आयोग की वार्षिक और विशेष रिपोर्टों को आयोग की सिफारिशों पर की गई या की जाने के लिए प्रस्तावित कार्रवाई के ज्ञापन सहित और सिफारिशों की अस्वीकृति के कारणों सहित, यदि कोई हों, यथास्थिति, संसद् या राज्य विधान-मंडल के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगी ।
अध्याय 5
राज्य मानव अधिकार आयोग
21. राज्य मानव अधिकार आयोगों का गठन-(1) कोई राज्य सरकार, इस अध्याय के अधीन राज्य आयोग को प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करने के लिए और सौंपे गए कृत्यों का पालन करने के लिए एक निकाय का गठन कर सकेगी जिसका नामह्ल.(राज्य का नाम) मानव अधिकार आयोग होगा ।
[(2) राज्य आयोग ऐसी तारीख से, जो राज्य सरकार अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे, निम्नलिखित से मिलकर बनेगा, अर्थात् :-
(क) एक अध्यक्ष, जो किसी उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायमूर्ति रहा है;
(ख) एक सदस्य, जो किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश है या रहा है, या राज्य में जिला न्यायालय का न्यायाधीश है या रहा है, और जिसे जिला न्यायाधीश के रूप में कम से कम सात वर्ष का अनुभव है;
(ग) एक सदस्य, जो ऐसे व्यक्तियों में से नियुक्त किया जाएगा जिन्हें मानव अधिकारों से संबंधित विषयों का ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव है ।]
(3) एक सचिव होगा, जो राज्य आयोग का मुख्य कार्यपालक अधिकारी होगा और वह राज्य आयोग की ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कृत्यों का निर्वहन करेगा, जो राज्य आयोग उसे प्रत्यायोजित करे ।
(4) राज्य आयोग का मुख्यालय ऐसे स्थान पर होगा जो राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे ।
(5) कोई राज्य आयोग केवल संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची 2 और सूची 3 में प्रगणित प्रविष्टियों में से किसी से संबंधित विषयों की बाबत मानव अधिकारों के अतिक्रमण किए जाने की जांच कर सकेगा :
परन्तु यदि किसी ऐसे विषय के बारे में आयोग द्वारा या तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन सम्यक् रूप से गठित किसी अन्य आयोग द्वारा पहले से ही जांच की जा रही है तो राज्य आयोग उक्त विषय के बारे में जांच नहीं करेगा :
परन्तु यह और कि जम्मू-कश्मीर मानव अधिकार आयोग के संबंध में, यह उपधारा ऐसे प्रभावी होगी मानो केवल संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची 2 और सूची 3 में प्रगणित प्रविष्टियों में से किसी से संबंधित विषयों की बाबत" शब्द और अंकों के स्थान पर जम्मू-कश्मीर राज्य को यथा लागू संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची 3 में प्रगणित प्रविष्टियों में से किसी से संबंधित विषयों की बाबत और उन विषयों की बाबत जिनके संबंध में उस राज्य के विधान-मंडल को विधियां बनाने की शक्ति है" शब्द और अंक रख दिए गए हों ।
[(6) दो या दो से अधिक राज्य सरकारें, राज्य आयोग के अध्यक्ष या सदस्य की सहमति से, यथास्थिति, ऐसे अध्यक्ष या सदस्य को साथ-साथ अन्य राज्य आयोग का सदस्य नियुक्त कर सकेंगी यदि ऐसा अध्यक्ष या सदस्य ऐसी नियुक्ति के लिए सहमति देता है :
परन्तु उस राज्य की बाबत जिसके लिए, यथास्थिति, सामान्य अध्यक्ष या सदस्य या दोनों नियुक्त किए जाने हैं इस धारा के अधीन की गई प्रत्येक नियुक्ति धारा 22 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट समिति की सिफारिशें अभिप्राप्त करने के पश्चात् की जाएगी ।]
22. राज्य आयोग के अध्यक्ष और [सदस्यों] की नियुक्ति-(1) राज्यपाल अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र द्वारा अध्यक्ष और 2[सदस्यों] को नियुक्त करेगा :
परन्तु इस उपधारा के अधीन प्रत्येक नियुक्ति ऐसी समिति की सिफारिशें प्राप्त होने के पश्चात् की जाएगी, जो निम्नलिखित से मिलकर बनेगी, अर्थात् :-
(क) मुख्य मंत्री -अध्यक्ष;
(ख) विधान सभा का अध्यक्ष -सदस्य;
(ग) उस राज्य के गृह विभाग का भारसाधक मंत्री -सदस्य;
(घ) विधान सभा में विपक्ष का नेता -सदस्य :
परन्तु यह और कि जहां किसी राज्य में विधान परिषद् है वहां उस परिषद् का सभापति और उस परिषद् में विपक्ष का नेता भी समिति के सदस्य होंगे :
परन्तु यह और भी कि उच्च न्यायालय का कोई आसीन न्यायाधीश या कोई आसीन जिला न्यायाधीश, संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति से परामर्श करने के पश्चात् ही नियुक्त किया जाएगा अन्यथा, नहीं ।
(2) राज्य आयोग के अध्यक्ष या किसी सदस्य की कोई नियुक्ति, केवल इस कारण अविधिमान्य नहीं होगी कि 2[उपधारा (1) में निर्दिष्ट समिति में कोई रिक्ति है] ।
23. [राज्य आयोग के अध्यक्ष या किसी सदस्य का त्यागपत्र और हटाया जाना]-[(1) राज्य आयोग का अध्यक्ष या कोई सदस्य राज्यपाल को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लिखित सूचना द्वारा अपना पद त्याग सकेगा ।
(1क) उपधारा (2) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, राज्य आयोग के अध्यक्ष या किसी सदस्य को केवल साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर किए गए राष्ट्रपति के ऐसे आदेश से उसके पद से हटाया जाएगा, जो उच्चतम न्यायालय को, राष्ट्रपति द्वारा निर्देश किए जाने पर, उच्चतम न्यायालय द्वारा इस निमित्त विहित प्रक्रिया के अनुसार की गई जांच पर वह रिपोर्ट किए जाने के पश्चात् किया गया है कि, यथास्थिति, अध्यक्ष या ऐसे सदस्य को ऐसे किसी आधार पर हटा दिया जाए ।]
(2) 3[उपधारा (1क)] में किसी बात के होते हुए भी, यदि, यथास्थिति, अध्यक्ष या कोई 3[सदस्य]-
(क) दिवालिया न्यायनिर्णीत किया जाता है; या
(ख) अपनी पदावधि में अपने पद के कर्तव्यों के बाहर किसी सवेतन नियोजन में लगता है; या
(ग) मानसिक या शारीरिक शैथिल्य के कारण अपने पद पर बने रहने के अयोग्य है; या
(घ) विकृतचित्त का है और सक्षम न्यायालय की ऐसी घोषणा विद्यमान है; या
(ङ) किसी ऐसे अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया जाता है और कारावास से दंडादिष्ट किया जाता है जिसमें राष्ट्रपति की राय में नैतिक अधमता अन्तर्ग्रस्त है,
तो राष्ट्रपति, अध्यक्ष या किसी [सदस्य] को, आदेश द्वारा, पद से हटा सकेगा ।
[24. राज्य आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की पदावधि-(1) अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया कोई व्यक्ति, अपने पद ग्रहण की तारीख से पांच वर्ष की अवधि तक या सत्तर वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने तक, इनमें से जो भी पहले हो, अपना पद धारण करेगा ।
(2) सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया कोई व्यक्ति, अपने पद ग्रहण की तारीख से पांच वर्ष की अवधि तक अपना पद धारण करेगा तथा पांच वर्ष की और अवधि के लिए पुनर्नियुक्ति का पात्र होगा :
परन्तु कोई भी सदस्य सत्तर वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने के पश्चात् अपना पद धारण नहीं करेगा ।
(3) अध्यक्ष या कोई सदस्य, अपने पद पर न रह जाने पर, किसी राज्य की सरकार के अधीन या भारत सरकार के अधीन किसी भी और नियोजन का पात्र नहीं होगा ।]
25. कतिपय परिस्थितियों में सदस्य का अध्यक्ष के रूप में कार्य करने या उसके कृत्यों का निर्वहन-(1) अध्यक्ष की मृत्यु, पदत्याग या अन्य कारण से उसके पद में हुई रिक्ति की दशा में, राज्यपाल, अधिसूचना द्वारा, सदस्यों में से किसी एक सदस्य को अध्यक्ष के रूप में तब तक कार्य करने के लिए प्राधिकृत कर सकेगा जब तक ऐसी रिक्ति को भरने के लिए नए अध्यक्ष की नियुक्ति नहीं हो जाती ।
(2) जब अध्यक्ष छुट्टी पर अनुपस्थिति के कारण या अन्य कारण से अपने कृत्यों का निर्वहन करने में असमर्थ है तब सदस्यों में से एक ऐसा सदस्य, जिसे राज्यपाल, अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त प्राधिकृत करे, उस तारीख तक अध्यक्ष के कृत्यों का निर्वहन करेगा जिस तारीख को अध्यक्ष अपने कर्तव्यों को फिर से संभालता है ।
[26. राज्य आयोगों के अध्यक्ष और सदस्यों की सेवा के निबंधन और शर्तें-(1) अध्यक्ष और सदस्यों को संदेय वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा के अन्य निबन्धन और शर्तें ऐसी होंगी, जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाएं :
परन्तु अध्यक्ष या किसी सदस्य के वेतन और भत्तों में तथा सेवा के अन्य निबंधनों और शर्तों में उसकी नियुक्ति के पश्चात् उसके लिए अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जाएगा ।]
27. राज्य आयोग के अधिकारी और अन्य कर्मचारिवृन्द-(1) राज्य सरकार, आयोग को,-
(क) राज्य सरकार के सचिव की पंक्ति से अनिम्न पंक्ति का एक अधिकारी, जो राज्य आयोग का सचिव होगा; और
(ख) ऐसे अधिकारी के अधीन, जो पुलिस महानिरीक्षक की पंक्ति से नीचे का न हो, ऐसे पुलिस और अन्वेषण कर्मचारिवृन्द तथा ऐसे अन्य अधिकारी और कर्मचारिवृन्द, जो राज्य आयोग के कृत्यों का दक्षतापूर्ण पालन करने के लिए आवश्यक हों,
उपलब्ध कराएगी ।
(2) ऐसे नियमों के अधीन रहते हुए, जो राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त बनाए जाएं, राज्य आयोग, ऐसे अन्य प्रशासनिक, तकनीकी और वैज्ञानिक कर्मचारिवृन्द नियुक्त कर सकेगा, जो वह आवश्यक समझे ।
(3) उपधारा (2) के अधीन नियुक्त अधिकारियों और अन्य कर्मचारिवृन्द के वेतन, भत्ते और सेवा की शर्तें ऐसी होंगी, जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाएं ।
28. राज्य आयोग की वार्षिक और विशेष रिपोर्टें-(1) राज्य आयोग, राज्य सरकार को वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा और किसी भी समय ऐसे विषय पर, जो उसकी राय में इतना अत्यावश्यक या महत्वपूर्ण है कि उसको वार्षिक रिपोर्ट के प्रस्तुत किए जाने तक आस्थगित नहीं किया जाना चाहिए, विशेष रिपोर्टें प्रस्तुत कर सकेगा ।
(2) राज्य सरकार, राज्य आयोग की वार्षिक और विशेष रिपोर्टों को राज्य आयोग की सिफारिशों पर की गई या की जाने के लिए प्रस्तावित कार्रवाई के ज्ञापन सहित और सिफारिशों की अस्वीकृति के कारणों सहित, यदि कोई हों, जहां राज्य विधान-मंडल दो सदनों से मिलकर बनता है वहां प्रत्येक सदन के समक्ष, या जहां ऐसा विधान-मंडल एक सदन से मिलकर बनता है वहां उस सदन के समक्ष, रखवाएगी ।
29. राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग से संबंधित कतिपय उपबन्धों का राज्य आयोगों को लागू होना-धारा 9, धारा 10, धारा 12, धारा 13, धारा 14, धारा 15, धारा 16, धारा 17 और धारा 18 के उपबन्ध राज्य आयोग को लागू होंगे और वे निम्नलिखित उपांतरणों के अधीन रहते हुए प्रभावी होंगे, अर्थात् :-
(क) आयोग" के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वे राज्य आयोग के प्रति निर्देश हैं;
(ख) धारा 10 की उपधारा (3) में, महासचिव" शब्द के स्थान पर सचिव" शब्द रखा जाएगा;
(ग) धारा 12 के खंड (च) का लोप किया जाएगा;
(घ) धारा 17 के खंड (i) में से केन्द्रीय सरकार या किसी" शब्दों का लोप किया जाएगा ।
अध्याय 6
मानव अधिकार न्यायालय
30. मानव अधिकार न्यायालय-मानव अधिकारों के अतिक्रमण से उद्भूत होने वाले अपराधों का शीघ्र विचारण करने के लिए उपबंध करने के प्रयोजन के लिए, राज्य सरकार, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति की सहमति से अधिसूचना द्वारा, उक्त अपराधों का विचारण करने के लिए, प्रत्येक जिले के किसी सेशन न्यायालय को मानव अधिकार न्यायालय के रूप में विनिर्दिष्ट कर सकेगी :
परन्तु इस धारा की कोई बात तब लागू नहीं होगी, जब तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन ऐसे अपराधों के लिए-
(क) कोई सेशन न्यायालय पहले से ही विशेष न्यायालय के रूप में विनिर्दिष्ट है; या
(ख) कोई विशेष न्यायालय पहले से ही गठित है ।
31. विशेष लोक अभियोजक-राज्य सरकार, प्रत्येक मानव अधिकार न्यायालय के लिए, अधिसूचना द्वारा, एक लोक अभियोजक विनिर्दिष्ट करेगी या किसी ऐसे अधिवक्ता को, जिसने कम से कम सात वर्ष तक अधिवक्ता के रूप में विधि-व्यवसाय किया हो, उस न्यायालय में मामलों के संचालन के प्रयोजन के लिए, विशेष लोक अभियोजक के रूप में नियुक्त करेगी ।
अध्याय 7
वित्त, लेखा और संपरीक्षा
32. केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुदान-(1) केन्द्रीय सरकार, संसद् द्वारा इस निमित्त विधि द्वारा किए गए सम्यक् विनियोग के पश्चात्, आयोग को अनुदानों के रूप में ऐसी धनराशियों का संदाय करेगी, जो केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए उपयोग किए जाने के लिए, ठीक समझे ।
(2) आयोग, इस अधिनियम के अधीन कृत्यों का पालन करने के लिए ऐसी राशियां खर्च कर सकेगा जो वह ठीक समझे और ऐसी राशियां उपधारा (1) में निर्दिष्ट अनुदानों में से संदेय व्यय मानी जाएंगी ।
33. राज्य सरकार द्वारा अनुदान-(1) राज्य सरकार, विधान-मंडल द्वारा इस निमित्त विधि द्वारा किए गए सम्यक् विनियोग के पश्चात् राज्य आयोग को अनुदानों के रूप में ऐसी धनराशियों का संदाय करेगी, जो राज्य सरकार, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए उपयोग किए जाने के लिए, ठीक समझे ।
(2) राज्य आयोग, अध्याय 5 के अधीन कृत्यों का पालन करने के लिए ऐसी राशियां खर्च कर सकेगा जो वह ठीक समझे और ऐसी राशियां उपधारा (1) में निर्दिष्ट अनुदानों में से संदेय व्यय मानी जाएंगी ।
34. लेखा और संपरीक्षा-(1) आयोग, उचित लेखा और अन्य सुसंगत अभिलेख रखेगा और लेखाओं का वार्षिक विवरण, ऐसे प्ररूप में तैयार करेगा जो केन्द्रीय सरकार, भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक से परामर्श करके, विहित करे ।
(2) आयोग के लेखाओं की संपरीक्षा, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा ऐसे अंतरालों पर की जाएगी जो उसके द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं और ऐसी संपरीक्षा के संबंध में उपगत कोई व्यय, आयोग द्वारा नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को संदेय होगा ।
(3) नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के और इस अधिनियम के अधीन आयोग के लेखाओं की संपरीक्षा के संबंध में उसके द्वारा नियुक्त किसी व्यक्ति के उस संपरीक्षा के संबंध में वे ही अधिकार और विशेषाधिकार तथा प्राधिकार होंगे जो नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के साधारणतया सरकारी लेखाओं की संपरीक्षा के संबंध में होते हैं और विशिष्टतया उसे बहियां, लेखे, संबंधित वाउचर तथा अन्य दस्तावेज और कागज-पत्र पेश किए जाने की मांग करने और आयोग के किसी भी कार्यालय का निरीक्षण करने का अधिकार होगा ।
(4) नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा या इस निमित्त उसके द्वारा नियुक्त किसी अन्य व्यक्ति द्वारा प्रमाणित, आयोग के लेखे, उन पर संपरीक्षा रिपोर्ट सहित, आयोग द्वारा, केन्द्रीय सरकार को प्रतिवर्ष भेजे जाएंगे और केन्द्रीय सरकार ऐसी संपरीक्षा रिपोर्ट को, उसके प्राप्त होने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगी ।
35. राज्य आयोग के लेखा और संपरीक्षा-(1) राज्य आयोग, उचित लेखा और अन्य सुसंगत अभिलेख रखेगा और लेखाओं का वार्षिक विवरण, ऐसे प्ररूप में तैयार करेगा जो राज्य सरकार, भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक से परामर्श करके, विहित करे ।
(2) राज्य आयोग के लेखाओं की संपरीक्षा, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा ऐसे अंतरालों पर की जाएगी जो उसके द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं और ऐसी संपरीक्षा के संबंध में उपगत कोई व्यय, राज्य आयोग द्वारा नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को संदेय होगा ।
(3) नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के और इस अधिनियम के अधीन राज्य आयोग के लेखाओं की संपरीक्षा के संबंध में उसके द्वारा नियुक्त किसी व्यक्ति के उस संपरीक्षा के संबंध में वे ही अधिकार और विशेषाधिकार तथा प्राधिकार होंगे जो नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के साधारणतया सरकारी लेखाओं की संपरीक्षा के संबंध में होते हैं और विशिष्टतया उसे बहियां, लेखे, संबंधित वाउचर तथा अन्य दस्तावेज और कागज-पत्र पेश किए जाने की मांग करने और राज्य आयोग के किसी भी कार्यालय का निरीक्षण करने का अधिकार होगा ।
(4) नियंत्रक-महोलखापरीक्षक द्वारा या इस निमित्त उसके द्वारा नियुक्त किसी अन्य व्यक्ति द्वारा प्रमाणित राज्य आयोग के लेखे, उन पर संपरीक्षा रिपोर्ट सहित, राज्य आयोग द्वारा, राज्य सरकार को प्रतिवर्ष भेजे जांएगे और राज्य सरकार, ऐसी संपरीक्षा रिपोर्ट को, उसके प्राप्त होने के पश्चात् यथाशीघ्र राज्य विधान-मंडल के समक्ष रखवाएगी ।
अध्याय 8
प्रकीर्ण
36. आयोग की अधिकारिता के अधीन न आने वाले विषय-(1) आयोग, किसी ऐसे विषय की जांच नहीं करेगा जो तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन सम्यक् रूप से गठित किसी राज्य आयोग या किसी अन्य आयोग के समक्ष लंबित है ।
(2) आयोग या राज्य आयोग उस तारीख से जिसको मानव अधिकारों का अतिक्रमण गठित करने वाले कार्य का किया जाना अभिकथित है एक वर्ष की समाप्ति के पश्चात् किसी विषय की जांच नहीं करेगा ।
37. विशेष अन्वेषण दलों का गठन-तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, जहां सरकार का यह विचार है कि ऐसा करना आवश्यक है वहां वह एक या अधिक विशेष अन्वेषण दलों का गठन कर सकेगी, जिनमें उतने पुलिस अधिकारी होंगे जितने वह मानव अधिकारों के अतिक्रमणों से उद्भूत होने वाले अपराधों के अन्वेषण और अभियोजन के प्रयोजनों के लिए आवश्यक समझती है ।
38. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम या किसी आदेश के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के बारे में अथवा किसी रिपोर्ट, कागज-पत्र, या कार्यवाही के केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकार, आयोग या राज्य आयोग के प्राधिकार द्वारा या उसके अधीन किसी प्रकाशन के बारे में कोई भी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकार, आयोग, राज्य आयोग या उसके किसी सदस्य अथवा केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकार, आयोग या राज्य आयोग के निदेशाधीन कार्य करने वाले किसी व्यक्ति के विरुद्ध नहीं होगी ।
39. सदस्यों और अधिकारियों का लोक सेवक होना-आयोग या राज्य आयोग का प्रत्येक सदस्य और इस अधिनियम के अधीन कृत्यों का प्रयोग करने के लिए आयोग या राज्य आयोग द्वारा नियुक्त या प्राधिकृत प्रत्येक अधिकारी, भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक समझा जाएगा ।
40. नियम बनाने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात् :-
(क) धारा 8 के अधीन [अध्यक्ष और सदस्यों] के वेतन और भत्ते तथा सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें;
(ख) वे शर्तें, जिनके अधीन अन्य प्रशासनिक, तकनीकी और वैज्ञानिक कर्मचारिवृन्द आयोग द्वारा नियुक्त किए जा सकेंगे तथा धारा 11 की उपधारा (3) के अधीन अधिकारियों और अन्य कर्मचारिवृन्द के वेतन और भत्ते;
(ग) सिविल न्यायालय की कोई अन्य शक्ति, जो धारा 13 की उपधारा (1) के खंड (च) के अधीन विहित की जानी अपेक्षित है;
(घ) वह प्ररूप, जिसमें आयोग द्वारा धारा 34 की उपधारा (1) के अधीन वार्षिक लेखा विवरण तैयार किए जाने है; और
(ङ) कोई अन्य विषय, जो विहित किया जाना है या किया जाए ।
(3) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उनके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
[40क. भूतलक्षी रूप से नियम बनाने की शक्ति-धारा 40 की उपधारा (2) के खंड (ख) के अधीन नियम बनाने की शक्ति के अंतर्गत ऐसे नियमों या उनमें से किसी नियम को भूतलक्षी रूप से किसी ऐसी तारीख से बनाने की शक्ति होगी, जो उस तारीख से पूर्वतर न हो जिसको इस अधिनियम को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त होती है, किन्तु किसी ऐसे नियम को ऐसा कोई भूतलक्षी प्रभाव नहीं दिया जाएगा जिससे कि किसी ऐसे व्यक्ति के, जिसको ऐसा नियम लागू हो सकता हो, हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े ।]
[40ख. आयोग की विनियम बनाने की शक्ति-(1) इस अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबंधों के अधीन रहते हुए, आयोग, केन्द्रीय सरकार के पूर्वानुमोदन से, इस अधिनियम के उपबन्धों को कार्यान्वित करने के लिए विनियम बना सकेगा ।
(2) विशिष्टता और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे विनियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात् :-
(क) धारा 10 की उपधारा (2) के अधीन आयोग द्वारा अनुसरित की जाने वाली प्रक्रिया;
(ख) राज्य आयोगों द्वारा प्रस्तुत की जाने वाली विवरणियां और आंकड़े;
(ग) कोई अन्य विषय, जो विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाना है या किया जाए ।
(3) इस अधिनियम के अधीन आयोग द्वारा बनाया गया प्रत्येक विनियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु विनियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]
41. नियम बनाने की राज्य सरकार की शक्ति-(1) राज्य सरकार, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, अधिसूचना द्वारा बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए, उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात :-
(क) धारा 26 के अधीन [अध्यक्ष और सदस्यों] के वेतन और भत्ते तथा सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें;
(ख) वे शर्तें, जिनके अधीन अन्य प्रशासनिक, तकनीकी और वैज्ञानिक कर्मचारिवृन्द राज्य आयोग द्वारा नियुक्त किए जा सकेंगे तथा धारा 27 की उपधारा (3) के अधीन अधिकारियों और अन्य कर्मचारिवृन्द के वेतन और भत्ते;
(ग) वह प्ररूप, जिसमें धारा 35 की उपधारा (1) के अधीन वार्षिक लेखा विवरण तैयार किए जाने हैं ।
(3) इस धारा के अधीन राज्य सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, जहां राज्य विधान-मंडल के दो सदन हैं वहां प्रत्येक सदन के समक्ष या जहां ऐसे विधानमंडल का एक सदन है वहां उस सदन के समक्ष रखा जाएगा ।
42. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा ऐसे उपबंध कर सकेगी जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हों और उस कठिनाई को दूर करने के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हों :
परन्तु ऐसा कोई आदेश इस अधिनियम के प्रांरभ की तारीख से दो वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।
43. निरसन और व्यावृत्ति-(1) मानव अधिकार संरक्षण अध्यादेश, 1993 (1993 का अध्यादेश संख्यांक 30) इसके द्वारा निरसित किया जाता है ।
(2) ऐसे निरसन के होते हुए भी, उक्त अध्यादेश के अधीन की गई कोई बात या कार्रवाई, इस अधिनियम के तत्संबंधी उपबंधों के अधीन की गई समझी जाएगी ।
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