Section 81 CrPC

 

Section 81 CrPC in Hindi and English


Section 81 of CrPC 1973 :- 81. Procedure by Magistrate before whom such person arrested is brought - (1) The Executive Magistrate or District Superintendent of Police or Commissioner of Police shall, if the person arrested appears to be the person intended by the Court which issued the warrant, direct his removal in custody to such Court :

Provided that, if the offence is bailable and such person is ready and willing to give bail to the satisfaction of such Magistrate, District Superintendent or Commissioner, or a direction has been endorsed under section 71 on the warrant and such person is ready and willing to give the security required by such direction, the Magistrate, District Superintendent or Commissioner shall take such bail or security, as the case may be and forward the bond, to the Court which issued the warrant :

Provided further that if the offence is a non-bailable one, it shall be lawful for the Chief Judicial Magistrate (subject to the provisions of section 437), or the Sessions Judge, of the district in which the arrest is made on consideration of the information and the documents referred to in sub-section (2) of section 78 to release such person on bail.

(2) Nothing in this section shall be deemed to prevent a police officer from taking security under section 71.


STATE AMENDMENT


Uttar Pradesh:


In section 81, to sub-section (1), the following third proviso shall be inserted, namely:-

"Provided also that where such person is not released on bail or where he fails to give such security as aforesaid, the Chief Judicial Magistrate in the case of a nonbailable offence or any Judicial Magistrate in the case of a bailable offence may pass such orders as he thinks fit for his custody till such time as may be necessary for his removal to the Court which issued that warrant."


[Vide Uttar Pradesh Act 1 of 1984, sec. 9 (w.e.f. 1-5-1984)].


Supreme Court of India Important Judgments And Case Law Related to Section 81 of Criminal Procedure Code 1973:

Bhugdomal Gangaram And Ors. vs State Of Gujarat on 19 April, 1983

Keki Bejonji And Another vs The State Of Bombay on 18 November, 1960

State Of Punjab vs Balbir Singh on 1 March, 1994


दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 81 का विवरण :  -  81. उस मजिस्ट्रेट द्वारा प्रक्रिया जिसके समक्ष ऐसे गिरफ्तार किया गया व्यक्ति लाया जाए -- (1) यदि गिरफ्तार किया गया व्यक्ति वही व्यक्ति प्रतीत होता है जो वारण्ट जारी करने वाले न्यायालय द्वारा आशयित है तो ऐसा कार्यपालक मजिस्ट्रेट या जिला पुलिस अधीक्षक या पुलिस आयुक्त उस न्यायालय के पास उसे अभिरक्षा में भेजने का निदेश देगा :

परन्तु यदि अपराध जमानतीय है और ऐसा व्यक्ति ऐसी जमानत देने के लिए तैयार और रजामन्द है, जिससे ऐसे मजिस्ट्रेट, जिला अधीक्षक या आयुक्त का समाधान हो जाए या वारण्ट पर धारा 71 के अधीन निदेश पृष्ठांकित है और ऐसा व्यक्ति ऐसे निदेश द्वारा अपेक्षित प्रतिभूति देने के लिए तैयार और रजामन्द है तो वह मजिस्ट्रेट, जिला अधीक्षक या आयुक्त यथास्थिति ऐसी जमानत या प्रतिभूति लेगा और बंधपत्र उस न्यायालय को भेज देगा जिसने वारण्ट जारी किया था :

परन्तु यह और कि यदि अपराध अजमानतीय है तो (धारा-437 के उपबंधों के अधीन रहते हुए) मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के लिए या उस जिले के जिसमें गिरफ्तारी की गई है सेशन न्यायाधीश के लिए धारा 78 की उपधारा (2) में निर्दिष्ट जानकारी और दस्तावेजों पर विचार करने के पश्चात् ऐसे व्यक्ति को छोड़ देना विधिपूर्ण होगा।

(2) इस धारा की कोई बात पुलिस अधिकारी को धारा 71 के अधीन प्रतिभूति लेने से रोकने वाली न समझी जाएगी।


राज्य संशोधन


उत्तरप्रदेश :


धारा 81 में, उपधारा (1) में अग्रलिखित तीसरा परन्तुक जोड़ा जाएगा अर्थात:-


“परन्तु यह भी कि जहाँ ऐसा व्यक्ति जमानत पर नहीं छोड़ा जाता है या जहाँ वह ऐसी पूर्वोक्त प्रतिभूति देने में असफल रहता है, चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट अजमानतीय अपराध के मामले में या ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट जमानतीय अपराध के मामले में ऐसे समय तक के लिए अभिरक्षा में रखने हेतु जो वारण्ट जारी करने वाले न्यायालय से उसके हटाये जाने के लिए आवश्यक हो, ऐसे आदेश पारित कर सकता है, जो वह ठीक समझे ।”


[देखें उत्तरप्रदेश एक्ट संख्या 1 सन् 1984, धारा 9 (दिनांक 1-5-1984 से प्रभावशील)]



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