Section 43 Indian Evidence Act 1872

 


Section 43 Indian Evidence Act 1872 in Hindi and English



Section 43 Evidence Act 1872 :Judgments, etc., other than those mentioned in sections 40 to 42, when relevant - Judgments, orders or decrees, other than those mentioned in sections 40, 41 and 42 are irrelevant, unless the existence of such judgment, order or decree, is a fact in issue, or is relevant under some other provision of this Act.

Illustrations

(a) A and B separately sue C for a libel which reflects upon each of them. C in each case says, that the matter alleged to be libellous is true, and the circumstances are such that it is probably true in each case, or in neither.

A obtains a decree against C for damages on the ground that C failed to make out his justification. The fact is irrelevant as between B and C.

(b) A prosecutes B for adultery with C, A's wife.

B denies that C is A's wife, but the Court convicts B of adultery.

Afterwards, C is prosecuted for bigamy in marrying B during A's lifetime. C says that she never was A's wife.

The judgment against B is irrelevant as against C.

(c) A prosecutes B for stealing, a cow from him. B is convicted.

A, afterwards, sues C for the cow, which B had sold to him before his conviction.

As between, A and C, the judgment against B is irrelevant.

(d) A has obtained a decree for the possession of land against B. C, B's son, i murders A in consequence.

The existence of the judgment is relevant, as showing motive for a crime.

(e) A is charged with theft and with having been previously convicted of theft.

The previous conviction is relevant as a fact in issue.

(f) A is tried for the murder of B. The fact that B prosecuted A for libel and that A was convicted and sentenced is relevant under section 8 as showing the motive for the fact in issue.




Supreme Court of India Important Judgments And Case Law Related to Section 43 Indian Evidence Act 1872:

Satish Chander Ahuja vs Sneha Ahuja on 15 October, 2020

K.G. Premshanker vs Inspector Of Police And Anr on 12 September, 2002

State Of Bihar vs Radha Krishna Singh & Ors on 20 April, 1983

Raj Kumar Karwal vs Union Of India And Ors.Withkirpal on 21 March, 1990

Seth Ramdayal Jat vs Laxmi Prasad on 15 April, 2009

Syed Askari Hadi Ali Augustine vs State (Delhi Admn.) & Anr on 3 March, 2009

Syed Askari Hadi Ali Augustine vs State (Delhi Admn.) & Anr on 3 March, 2009

Guru Granth Saheb Sthan Meerghat vs Ved Prakash & Ors on 1 May, 2013

Vishnu Dutt Sharma vs Daya Sapra on 5 May, 2009

Radheshyam Kejriwal vs State Of West Bengal & Anr on 18 February, 2011



भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 43 का विवरण :  -  धाराओं 40 से 42 में वर्णित से भिन्न निर्णय आदि कब सुसंगत हैं -- धाराएँ 40, 41 और 42 में वर्णित से भिन्न निर्णय, आदेश या डिक्रियाँ विसंगत हैं जब तक कि ऐसे निर्णय, आदेश या डिक्री का अस्तित्व विवाद्यक तथ्य न हो या वह इस अधिनियम के किसी अन्य उपबंध के अन्तर्गत सुसंगत न हो।

दृष्टांत

(क) क और ख किसी अपमान लेख के लिए जो उनमें से हर एक पर लांछन लगाता है, ग पर पृथक्-पृथक् वाद लाते हैं। हर एक मामले में ग कहता है कि वह बात, जिसका अपमान-लेखीय होना अभिकथित है, सत्य है और परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि वह अधिसंभाव्यत: या तो हर एक मामले में सत्य है या किसी में नहीं।

ग के विरुद्ध क इस आधार पर कि ग अपना न्यायोचित साबित करने में असफल रहा नुकसानी की डिक्री अभिप्राप्त करता है। यह तथ्य ख और ग के बीच विसंगत है

(ख) क अपनी पत्नी ग के साथ जारकर्म करने के लिए ख का अभियोजन करता है।

ख इस बात का प्रत्याख्यान करता है कि ग क की पत्नी है, किन्तु न्यायालय ख को जारकर्म के लिए दोषसिद्ध करता है।

तत्पश्चात् क के जीवनकाल में ख के साथ विवाह करने पर द्वि-विवाह के लिए ग अभियोजित की जाती है। ग कहती है कि वह क की पत्नी कभी नहीं थी।

ख के विरुद्ध दिया गया निर्णय ग के विरुद्ध विसंगत है।

(ग) ख का अभियोजन क इसलिए करता है कि उसने क की गाय चुराई है। ख दोषसिद्ध किया जाता है।

तत्पश्चात् क उस गाय के लिए जिसे ख ने दोषसिद्ध होने से पूर्व ग को बेच दिया था, ग पर वाद लाता है। ख के विरुद्ध वह निर्णय क और ग के बीच विसंगत है।

(घ) क ने ख के विरुद्ध भूमि के कब्जे की डिक्री अभिप्राप्त की है। ख का पुत्र ग परिणामस्वरूपक की हत्या करता है।

उस निर्णय का अस्तित्व अपराध का हेतु दर्शित करने के नाते सुसंगत है।

(ङ) क पर चोरी का और चोरी के लिए पूर्व दोषसिद्धि का आरोप है। पूर्व दोषसिद्धि विवाद्यक तथ्य होने के नाते सुसंगत है।

(च) ख की हत्या के लिए क विचारित किया जाता है। यह तथ्य कि ख ने क पर अपमान लेख के लिए अभियोजन चलाया था और क दोषसिद्ध और दण्डित किया गया था, धारा 8 के अधीन विवाद्यक तथ्य का हेतु दर्शित करने के नाते सुसंगत है।


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