Section 464 CrPC

 

Section 464 CrPC in Hindi and English



Section 464 of CrPC 1973 :- 464. Effect of omission to frame, or absence of, or error in charge -

(1) No finding, sentence or order by a Court of competent jurisdiction shall be deemed invalid merely on the ground that no charge was framed or on the ground of any error, omission or irregularity in the charge including any misjoinder of charges, unless, in the opinion of the Court of appeal, confirmation or revision, a failure of justice has in fact been occasioned thereby.

(2) If the Court of appeal, confirmation or revision is of opinion that a failure of justice has in fact been occasioned, it may

(a) in the case of an omission to frame a charge, order that a charge be framed and that the trial be recommenced from the point immediately after the framing of the charge;

(b) in the case of an error, omission or irregularity in the charge, direct a new trial to be had upon a charge framed in whatever manner it thinks fit :

Provided that if the Court is of opinion that the facts of the case are such that no valid charge could be preferred against the accused in respect of the facts proved, it shall quash the conviction.




Supreme Court of India Important Judgments And Case Law Related to Section 464 of Criminal Procedure Code 1973:

Dr. Jai Shanker vs State Of Himachal Pradesh on 30 August, 1972

Virendra Kumar vs State Of U.P on 16 January, 2007

Kamil vs The State Of Uttar Pradesh on 31 October, 2018

Mohan Singh vs State Of Bihar on 26 August, 2011

Sushil Ansal vs State Thr.Cbi on 5 March, 2014

Chandrawati vs Ramji Tiwari & Ors on 14 January, 2010

Sushil Ansal vs State Thr.Cbi on 5 March, 1947

Main Pal vs State Of Haryana on 7 September, 2010

T. Vengama Naidu vs T. Dora Swamy Naidu & Ors on 27 February, 2007

Dalbir Singh vs State Of U.P on 8 April, 2004




दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 464 का विवरण :  -  464. आरोप विरचित न करने या उसके अभाव या उसमें गलती का प्रभाव --

(1) किसी सक्षम अधिकारिता वाले न्यायालय का कोई निष्कर्ष, दण्डादेश या आदेश केवल इस आधार पर कि कोई आरोप विरचित नहीं किया गया अथवा इस आधार पर कि आरोप में कोई गलती, लोप या अनियमितता थी, जिसके अन्तर्गत आरोपों का कुसंयोजन भी है, उस दशा में ही अविधिमान्य समझा जाएगा जब अपील, पुष्टीकरण या पुनरीक्षण न्यायालय की राय में उसके कारण वस्तुतः न्याय नहीं हो पाया है।

(2) यदि अपील, पुष्टीकरण या पुनरीक्षण न्यायालय की यह राय है कि वस्तुतः न्याय नहीं हो पाया है तो वह--

(क) आरोप विरचित न किए जाने वाली दशा में यह आदेश कर सकता है कि आरोप विरचित किया जाए और आरोप की विरचना के ठीक पश्चात् से विचारण पुनः प्रारंभ किया जाए

(ख) आरोप में किसी गलती, लोप या अनियमितता वाली दशा में यह निदेश दे सकता है कि किसी ऐसी रीति से, जिसे वह ठीक समझे, विरचित आरोप पर नया विचारण किया जाए :

परन्तु यदि न्यायालय की यह राय है कि मामले के तथ्य ऐसे हैं कि साबित तथ्यों की बाबत् अभियुक्त के विरुद्ध कोई विधिमान्य आरोप नहीं लगाया जा सकता तो वह दोषसिद्धि को अभिखण्डित कर देगा।



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