Section 436 CrPC

 

Section 436 CrPC in Hindi and English



Section 436 of CrPC 1973 :- 436. In what cases bail to be taken — (1) When any person other than a person accused of a non-bailable offence is arrested or detained without warrant by an officer in charge of a police station, or appears or is brought before a Court and is prepared at any time while in the custody of such officer or at any stage of the proceeding before such Court to give bail, such person shall be released on bail :

Provided that such officer or Court, if he or it thinks fit, ' [may, and shall, if such person is indigent and is unable to furnish surety, instead of taking bail] from such person, discharge him on his executing a bond without sureties for his appearance as hereinafter provided.

Explanation - Where a person is unable to give bail within a week of the date of his arrest, it shall be a sufficient ground for the officer or the Court to presume that he is an indigent person for the purposes of this proviso.

Provided further that nothing in this section shall be deemed to affect the provisions of sub-section (3) of section 116 or section 446A.

(2) Notwithstanding anything contained in sub-section (1), where a person has failed to comply with the conditions of the bail-bond as regards the time and place of attendance, the Court may refuse to release him on bail, when on a subsequent occasion in the same case he appears before the Court or is brought in custody and any such refusal shall be without prejudice to the powers of the Court to call upon any person bound by such bond to pay the penalty thereof under section 446.


STATE AMENDMENT

Uttar Pradesh -

In section 436, in the first proviso, to section (1), for the word “discharge” the word "release” shall be substituted.

[Vide Uttar Pradesh Act 1 of 1984, sec. 10 (w.e.f. 1-5-1984)]




Supreme Court of India Important Judgments And Case Law Related to Section 436 of Criminal Procedure Code 1973:

Re-Inhuman Conditions In 1382  vs Vs. on 5 February, 2016

Balchand Jain vs State Of Madhya Pradesh on 5 November, 1976

M.N. Damani vs S.K. Sinha And Others on 2 May, 2001

Rasiklal vs Kishore on 20 February, 2009

State Of West Bengal vs Pranab Ranjan Roy on 6 March, 1998

Gobind Singh vs Shanti Sarup on 15 September, 1978

Shahzad Hasan Khan vs Ishtiaq Hasan Khan & Anr on 28 April, 1987

Rajinder Prasad vs Bashir & Ors on 19 September, 2001

State Of Karnataka & Anr vs Pastor P. Raju on 4 August, 2006

P.K. Shaji @ Thammanam Shaji vs State Of Kerala on 27 October, 2005




दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 436 का विवरण :  -  436. किन मामलों में जमानत ली जाएगी --

(1) जब अजमानतीय अपराध के अभियुक्त व्यक्ति से भिन्न कोई व्यक्ति पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी द्वारा वारण्ट के बिना गिरफ्तार या निरुद्ध किया जाता है या न्यायालय के समक्ष हाजिर होता है या लाया जाता है और जब वह ऐसे अधिकारी की अभिरक्षा में है उस बीच किसी समय, या ऐसे न्यायालय के समक्ष कार्यवाहियों के किसी प्रक्रम में, जमानत देने के लिए तैयार है तब ऐसा व्यक्ति जमानत पर छोड़ दिया जाएगा:

परन्तु यदि ऐसा अधिकारी या न्यायालय ठीक समझते हैं तो वह ऐसे व्यक्ति से जमानत लेने के बजाय उसे इसमें इसके पश्चात् उपबन्धित प्रकार से अपने हाजिर होने के लिए प्रतिभुओं रहित बन्ध-पत्र निष्पादित करने पर उन्मोचित कर सकेगा और यदि ऐसा व्यक्ति निर्धन है और जमानत देने में असमर्थ है, तो उसे ऐसे उन्मोचित करेगा।

स्पष्टीकरण -- जहाँ कोई व्यक्ति अपनी गिरफ्तारी की तारीख के एक सप्ताह के भीतर जमानत देने में असमर्थ है वहाँ अधिकारी या न्यायालय के लिए यह उपधारणा करने का पर्याप्त आधार होगा कि वह इस परन्तुक के प्रयोजनों के लिए निर्धन व्यक्ति है |

परन्तु यह और कि इस धारा की कोई बात धारा 116 की उपधारा (3) या धारा 446-क के उपबंधों पर प्रभाव डालने वाली न समझी जाएगी।

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहाँ कोई व्यक्ति, हाजिरी के समय और स्थान के बारे में जमानतपत्र की शर्तों का अनुपालन करने में असफल रहता है वहाँ न्यायालय उसे जब वह उसी मामले में किसी पश्चात्वर्ती अवसर पर न्यायालय के समक्ष हाजिर होता है या अभिरक्षा में लाया जाता है, जमानत पर छोड़ने से इंकार कर सकता है और ऐसी किसी इंकारी का, ऐसे जमानतपत्र से आबद्ध किसी व्यक्ति से धारा 446 के अधीन उसकी शास्ति देने की अपेक्षा करने की न्यायालय की शक्तियों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।


राज्य संशोधन

उत्तरप्रदेश --

उपधारा (1) के प्रथम परन्तुक में शब्द “उन्मोचन” के स्थान पर “निर्मुक्त" प्रतिस्थापित किया जाएगा।

[देखें उत्तरप्रदेश एक्ट संख्या 1 सन् 1984, धारा 10 (दिनांक 1-5-1984 से प्रभावशील)]




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