Section 349 CrPC

 Section 349 CrPC in Hindi and English



Section 349 of CrPC 1973 :- 349. Imprisonment or committal of person refusing to answer or produce document -- If any witness or person called to produce a document or thing before a Criminal Court refuses to answer such questions as are put to him or to produce any document or thing, in his possession or power which the Court requires him to produce and does not, after a reasonable opportunity has been given to him so to do, offer any reasonable excuse for such refusal, such Court may, for reasons to be recorded in writing, sentence him to simple imprisonment or by warrant under the hand of the Presiding Magistrate or Judge commit him to the custody of an officer of the Court for any term not exceeding seven days, unless in the meantime, such person consents to be examined and to answer, or to produce the document or thing and in the event of his  persisting in his refusal he may be dealt with according to the provisions of section 345 or section 346.



Supreme Court of India Important Judgments And Case Law Related to Section 349 of Criminal Procedure Code 1973:

Shanti Prasad Jain vs The Director Of Enforcement on 19 April, 1962

State Of Uttar Pradesh vs Sabir Ali And Anr on 24 March, 1964

Daroga Singh & Ors vs B.K. Pandey on 13 April, 2004

Arun Paswan, S.I vs State Of Bihar & Ors on 12 December, 2003



दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 349 का विवरण :  -  349. उत्तर देने या दस्तावेज पेश करने से इंकार करने वाले व्यक्ति को कारावास या उसकी सुपुर्दगी -- यदि दण्ड न्यायालय के समक्ष कोई साक्षी या कोई व्यक्ति, जो किसी दस्तावेज या चीज को पेश करने के लिए बुलाया गया है, उन प्रश्नों का, जो उससे किए जाएँ, उत्तर देने से या अपने कब्जे या शक्ति में कि किसी दस्तावेज या चीज को, जिसे पेश करने की न्यायालय उससे अपेक्षा करे, पेश करने से इंकार करता है और ऐसे इंकार के लिए कोई उचित कारण पेश करने के लिए युक्तियुक्त अवसर दिए जाने पर ऐसा नहीं करता है तो ऐसा न्यायालय उन कारणों से, जो लेखबद्ध किए जाएंगे, उसे सात दिन से अनधिक की किसी अवधि के लिए सादा कारावास का दण्डादेश दे सकेगा अथवा पीठासीन मजिस्ट्रेट या न्यायाधीश द्वारा हस्ताक्षरित वारण्ट द्वारा न्यायालय के किसी अधिकारी की अभिरक्षा के लिए सुपुर्द कर सकेगा, जब तक कि उस बीच ऐसा व्यक्ति अपनी परीक्षा की जाने और उत्तर देने के लिए या दस्तावेज या चीज पेश करने के लिए सहमत नहीं हो जाता है और उसके इंकार पर डटे रहने की दशा में उसके बारे में धारा 345 या धारा 346 के उपबंधों के अनुसार कार्यवाही की जा सकेगी।



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