Section 346 CrPC

 

Section 346 CrPC in Hindi and English



Section 346 of CrPC 1973 :- 346. Procedure where Court considers that case should not be dealt with under section 345 -

(1) If the Court, in any case, considers that a person accused of any of the offences referred to in section 345 and committed in its view or presence should be imprisoned otherwise than in default of payment of fine, or that a fine exceeding two hundred rupees should be imposed upon him, or such Court is for any other reason of opinion that the case should not be disposed of under section 345, such Court, after recording the facts constituting the offence and the statement of the accused as hereinbefore provided, may forward the case to a Magistrate having jurisdiction to try the same and may require security to be given for the appearance of such person before such Magistrate, or if sufficient security is not given shall forward such person in custody to such Magistrate

(2) The Magistrate to whom any case is forwarded under this section shall proceed to deal with, as far as may be, as if it were instituted on a police report.




Supreme Court of India Important Judgments And Case Law Related to Section 346 of Criminal Procedure Code 1973:

Kanwar Natwar Singh vs Directorate Of Enforcement & Anr on 5 October, 2010

Chandrapal Singh And Ors. vs Maharaj Singh And Anr. on 15 January, 1982

State Of Gujarat vs Utility Users Welfare on 12 April, 2018

Kiran Bedi & Ors vs Committee Of Inquiry & Anr on 4 January, 1989

Super Cassetts Industries Ltd vs Music Broadcast Pvt. Ltd on 3 May, 2012

Dr. Baliram Waman Hiray vs Justice B. Lentin And Others on 12 September, 1988

Union Of India vs M/S Premier Limited (Formerly on 29 January, 2019

Prakash H. Jain vs Ms. Marie Fernandes on 23 September, 2003

T.N.Generation & Distbn. Corpn vs Ppn Power Gen.Co.Pvt.Ltd on 4 April, 2014

T.N.Generation & Distbn. Corpn vs Ppn Power Gen.Co.Pvt.Ltd on 4 April, 1947



दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 346 का विवरण :  -  346. जहाँ न्यायालय का विचार है कि मामले में धारा 345 के अधीन कार्यवाही नहीं की जाती चाहिए वहाँ प्रक्रिया --

(1) यदि किसी मामले में न्यायालय का यह विचार है कि धारा 345 में निर्दिष्ट और उसकी दृष्टिगोचरता या उपस्थिति में किए गए अपराधों में से किसी के लिए अभियुक्त व्यक्ति जुर्माना देने में व्यतिक्रम करने से अन्यथा कारावासित किया जाना चाहिए या उस पर दो सौ रुपए से अधिक जुर्माना अधिरोपित किया जाना चाहिए या किसी अन्य कारण से उस न्यायालय की यह राय है कि मामला धारा 345 के अधीन नहीं निपटाया जाना चाहिए तो वह न्यायालय उन तथ्यों को जिनसे अपराध बनता है और अभियुक्त के कथन को इसमें इसके पूर्व उपबंधित प्रकार से अभिलिखित करने के पश्चात्, मामला उसका विचारण करने की अधिकारिता रखने वाले मजिस्ट्रेट को भेज सकेगा और ऐसे मजिस्ट्रेट के समक्ष ऐसे व्यक्ति की हाजिरी के लिए प्रतिभूति दी जाने की अपेक्षा कर सकेगा, अथवा यदि पर्याप्त प्रतिभूति न दी जाए तो ऐसे व्यक्ति को अभिरक्षा में ऐसे मजिस्ट्रेट के पास भेजेगा।

(2) वह मजिस्ट्रेट, जिसे कोई मामला इस धारा के अधीन भेजा जाता है, जहाँ तक हो सके इस प्रकार कार्यवाही करने के लिए अग्रसर होगा मानो वह मामला पुलिस रिपोर्ट पर संस्थित है।



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