Section 309 CrPC

 

Section 309 CrPC in Hindi and English



Section 309 of CrPC 1973 :- 309. Power to postpone or adjourn proceedings —

(1) In every enquiry or trial the proceedings shall be continued from day-to-day until all the witnesses in attendance have been examined, unless the Court finds the adjournment of the same beyond the following day to be necessary for reasons to be recorded :

Provided that when the inquiry or trial relates to an offence under section 376, [section 376A, section 376AB, section 376B, section 376C, section 376D, section 376DA or section 376DB of the Indian Penal Code, the inquiry or inquiry or trial shall] be completed within a period of two months from the date of filing of the charge sheet.

(2) If the Court, after taking cognizance of an offence, or commencement of trial, finds it necessary or advisable to postpone the commencement of, or adjourn, any inquiry or trial, it may, from time to time, for reasons to be recorded, postpone or adjourn the same on such terms as it thinks fit, for such time as it considers reasonable, and may by a warrant remand the accused if in custody :

Provided that no Magistrate shall remand an accused person to custody under this section for a term exceeding fifteen days at a time :

Provided further that when witnesses are in attendance, no adjournment or postponement shall be granted, without examining them, except for special reasons to be recorded in writing:

'[Provided also that no adjournment shall be granted for the purpose only of enabling the accused person to show cause against the sentence proposed to be imposed on him.]

Provided also that

(a) no adjournment shall be granted at the request of a party, except where the circumstances are beyond the control of that party;

(b) the fact that the pleader of a party is engaged in another Court, shall not be a ground for adjournment;

(c) where a witness is present in Court but a party or his pleader is not present or the party or his pleader though present in Court, is not ready to examine or cross-examine the witness, the Court may, if thinks fit, record the statement of the witness and pass such orders as it thinks fit dispensing with the examination-in-chief or cross-examination of the witness, as the case may be.

Explanation 1 - If sufficient evidence has been obtained to raise a suspicion that the accused may have committed an offence, and it appears likely that further evidence may be obtained by a remand, this is a reasonable cause for a remand.

Explanation 2 - The terms on which an adjournment or postponement may be granted include, in appropriate cases, the payment of costs by the prosecution or the accused.


STATE AMENDMENT 

Chhattisgarh --- In proviso to sub-section (1) of Section 309, for the words, figures and letters "section 376, section 376A, section 376B, section 376C or section 376D”, the words, figures and letters “section 354, section 354A, section 354B, section 354C, section 354D, section 354E, section 376, section 376A, section 376B, section 376C, section 376D, section 376E, section 376F, section 509, section 509A or section 509B” shall be substituted. 

[Vide The Criminal Law (C.G. Amendment) Act, 2013 (No. 25 of 2015), Sec. 11 (w.e.f. 21-7-2015). Published in C.G. Rajpatra (Asadharan)

dated 21-7-2015 pages 777-778(9).]




Supreme Court of India Important Judgments And Case Law Related to Section 309 of Criminal Procedure Code 1973:

Dinesh Dalmia vs C.B.I on 18 September, 2007

Suresh Kumar Bhikamchand Jain vs State Of Maharashtra & Anr on 13 February, 2013

State Of U.P vs Shambhu Nath Singh And Ors on 29 March, 2001

Central Bureau Of Investigation, vs Anupam J. Kulkarni on 8 May, 1992

Akil @ Javed vs State Of Nct Of Delhi on 6 December, 2012

Natabar Parida Bisnu Charan vs State Of Orissa on 16 April, 1975

Doongar Singh vs The State Of Rajasthan on 28 November, 2017

Central Bureau Of Investigation vs Rathin Dandapath & Ors on 21 August, 2015

Nimeon Sangma & Ors vs Home Secretary, Govt. Of on 30 April, 1979

The State Of Maharashtra And Etc. vs Saeed Sohail Sheikh Etc. Etc on 2 November, 2012



दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 309 का विवरण :  -  309. कार्यवाही को मुल्तवी या स्थगित करने की शक्ति --

(1) प्रत्येक जांच या विचारण में, कार्यवाहियां सभी हाजिर साक्षियों की परीक्षा हो जाने तक दिन-प्रतिदिन जारी रखी जाएंगी, जब तक कि ऐसे कारणों से, जो लेखबद्ध किए जाएंगे, न्यायालय उन्हें अगले दिन से परे स्थगित करना आवश्यक न समझे :

परन्तु जब जांच या विचारण भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376, [धारा 376क, धारा 376कख, धारा 376ख, धारा 376ग, धारा 376घ, धारा 376घक या धारा 376घख के अधीन किसी अपराध से संबंधित है, तब जांच या विचारण] आरोपपत्र फाइल किए जाने की तारीख से दो मास की अवधि के भीतर पूरा किया जाएगा ।

(2) यदि न्यायालय किसी अपराध का संज्ञान करने या विचारण के प्रारंभ होने के पश्चात् यह आवश्यक या उचित समझता है कि किसी जांच या विचारण का प्रारंभ करना मुल्तवी कर दिया जाए या उसे स्थगित कर दिया जाए तो वह समय-समय पर ऐसे कारणों से, जो लेखबद्ध किए जाएंगे, ऐसे निबंधनों पर, जैसे वह ठीक समझे, उतने समय  के लिए जितना वह उचित समझे उसे मुल्तवी या स्थगित कर सकता है और यदि अभियुक्त अभिरक्षा में है तो उसे वारण्ट द्वारा प्रतिप्रेषित कर सकता है :

परन्तु कोई मजिस्ट्रेट किसी अभियुक्त को इस धारा के अधीन एक समय में पंद्रह दिन से अधिक की अवधि के लिए अभिरक्षा में प्रतिप्रेषित न करेगा :

परन्तु यह और कि जब साक्षी हाजिर हों तब उनकी परीक्षा किए बिना स्थगन या मुल्तवी करने की मंजूरी विशेष कारणों के बिना, जो लेखबद्ध किए जाएंगे, नहीं दी जाएगी :

परन्तु यह भी कि कोई स्थगन केवल इस प्रयोजन के लिए नहीं मंजूर किया जाएगा कि वह अभियुक्त व्यक्ति को उस पर अधिरोपित किए जाने के लिए प्रस्थापित दण्डादेश के विरुद्ध हेतुक दर्शित करने में समर्थ बनाए ।

परन्तु यह भी कि--

(क) जहाँ परिस्थितियाँ उस पक्षकार के नियंत्रण के परे हैं, के सिवाय पक्षकार के अनुरोध पर कोई स्थगन मंजूर नहीं किया जाएगा;

(ख) यह तथ्य कि किसी पक्षकार का अधिवक्ता किसी अन्य न्यायालय में लगा हुआ है, स्थगन का आधार नहीं होगा;

(ग) जहाँ कोई साक्षी न्यायालय में उपस्थित है परन्तु पक्षकार या उसका अधिवक्ता उपस्थित नहीं है अथवा ।

पक्षकार या उसका अधिवक्ता यद्यपि न्यायालय में उपस्थित है, लेकिन साक्षी का परीक्षण या प्रतिपरीक्षण करने के लिए तैयार नहीं है, तब न्यायालय, यदि उचित समझता है, साक्षी की यथास्थिति मुख्य परीक्षा या प्रतिपरीक्षा को अभिमुक्त करते हुए साक्षी के कथन को अभिलिखित करेगा तथा ऐसे आदेश पारित कर सकेगा जैसा वह उचित समझे ।

स्पष्टीकरण 1 -- यदि यह संदेह करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य प्राप्त कर लिया गया है कि हो सकता है कि अभियुक्त ने अपराध किया है और यह संभाव्य प्रतीत होता है कि प्रतिप्रेषण करने पर अतिरिक्त साक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है तो यह प्रतिप्रेषण के लिए एक उचित कारण होगा।

स्पष्टीकरण 2 -- जिन निबंधनों पर कोई स्थगन या मुल्तवी करना मंजूर किया जा सकता है, उनके अन्तर्गत समुचित मामलों में अभियोजन या अभियुक्त द्वारा खर्चा का दिया जाना भी है।


राज्य संशोधन 

छत्तीसगढ़ -- धारा 309 की उपधारा (1) के परन्तुक में, शब्द और अंक “धारा 376, धारा 376क, धारा 37 6ख, धारा 376ग या धारा 376घ” के स्थान पर, शब्द, अंक एवं अक्षर “धारा 354, धारा 354क, धारा 354ख, धारा 354ग, धारा 354घ, धारा 354ङ, धारा 376, धारा 376क, धारा 376ख, धारा 376ग, धारा 376घ, धारा 376ङ, धारा 376च, धारा 509, धारा 509क या धारा 509ख” प्रतिस्थापित किया जाए।

[देखें दण्ड विधि (छ.ग. संशोधन) अधिनियम, 2013 (क्र. 25 सन् 2015), धारा 11 

(दिनांक 21-7-2015 से प्रभावशील)। छ.ग. राजपत्र (असाधारण)

दिनांक 21-7-2015 पृष्ठ 777-778(9) पर प्रकाशित ।]




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