Section 300 CrPC

 Section 300 CrPC in Hindi and English



Section 300 of CrPC 1973 :- 300. Person once convicted or acquitted not to be tried for same offence --

(1) A person who has once been tried by a Court of competent jurisdiction for an offence and convicted or acquitted of such offence shall, while such conviction or acquittal remains in force, not be liable to be tried again for the same offence, nor on the same facts for any other offence for which a different charge from the one made against him might have been made under sub-section (1) of section 221, or for which he might have been convicted under sub-section (2) thereof.

(2) A person acquitted or convicted of any offence may be afterwards tried, with the consent of the State Government, for any distinct offence for which a separate charge might have been made against him at the former trial under sub-section (1) of section 220.

(3) A person convicted of any offence constituted by any act causing consequences which, together with such act, constituted a different offence from that of which he was convicted, maybe afterwards tried for such last-mentioned offence, if the consequences had not happened, or were not known to the Court to have happened, at the time when he was convicted.

(4) A person acquitted or convicted of any offence constituted by any acts may, notwithstanding such acquittal or conviction, be subsequently charged with, and tried for, any other offence constituted by the same acts which he may have committed if the Court by which he was first tried was not competent to try the offence with which he is subsequently charged.

(5) A person discharged under section 258 shall not be tried again for the same offence except with the consent of the Court by which he was discharged or of any other Court to which the first-mentioned Court is subordinate'.

(6) Nothing in this section shall affect the provisions of section 26 of the General Clauses Act, 1897 (10 of 1897) or of section 188 of this Code.

Explanation - The dismissal of a complaint, or the discharge of the accused, is not an acquittal for the purposes of this section.

Illustrations - 

(a) A is tried upon a charge of theft as a servant and acquitted. He cannot afterwards, while the acquittal remains in force, be charged with theft as a servant, or, upon the same facts, with theft simply, or with criminal breach of trust.

(b) A is tried for causing grievous hurt and convicted. The person injured afterwards dies. A may be tried again for culpable homicide.

(c) A is charged before the Court of Session and convicted of the culpable homicide of B. A may not afterwards be tried on the same facts for the murder of B.

(d) A is charged by a Magistrate of the first class with, and convicted by him of, voluntarily causing hurt to B. A may not afterwards be tried for voluntarily causing grievous hurt to B on the same facts, unless the case comes within subsection (3) of this section.

(e) A is charged by a Magistrate of the second class with, and convicted by him of, theft of property from the person of B. A may subsequently be charged with, and tried for, robbery on the same facts.

(f) A, B and C are charged by a magistrate of the first class with, and convicted by him of, robbing D. A, B and C may afterwards be charged with, and tried for, dacoity on the same facts.




Supreme Court of India Important Judgments And Case Law Related to Section 300 of Criminal Procedure Code 1973:

Shivala Bhikhamsar vs Bablir Kumar Jatti And Ors on 8 May, 2017

State Of Jharkhand vs Sajal Chakraborty on 8 May, 2017

Sangeetaben Mahendrabhai Patel vs State Of Gujarat & Anr on 23 April, 2012

Nani Gopal Biswas vs The Municipality Of Howrah on 29 October, 1957

State Of Karnataka Through Cbi vs C. Nagarajaswamy on 7 October, 2005

Radheshyam Kejriwal vs State Of West Bengal & Anr on 18 February, 2011

Som Raj @ Soma vs State Of H.P on 22 February, 2013

Surendra Gupta vs Bhagwandevi on 5 April, 1994

Jitendra Panchal vs Intelligence Officer, Ncb & Anr on 3 February, 2009

State Of Karnataka vs K.H. Annegowda & Anr on 8 December, 1976




दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 300 का विवरण :  -  300. एक बार दोषसिद्ध या दोषमुक्त किए गए व्यक्ति का उसी अपराध के लिए विचारण न किया जाना --

(1) जिस व्यक्ति का किसी अपराध के लिए सक्षम अधिकारिता वाले न्यायालय द्वारा एक बार विचारण किया जा चुका है और जो ऐसे अपराध के लिए दोषसिद्ध या दोषमुक्त किया जा चुका है, वह, जबतक ऐसी दोषसिद्धि या दोषमुक्ति प्रवृत्त रहती है तब तक न तो उसी अपराध के लिए पुनः विचारण का भागी होगा और न उन्हीं तथ्यों पर किसी ऐसे अन्य अपराध के लिए विचारण का भागी होगा जिसके लिए उसके विरुद्ध लगाए गए आरोप से भिन्न आरोप धारा 221 की उपधारा (1) के अधीन लगाया जा सकता था या जिसके लिए वह उसकी उपधारा (2) के अधीन दोषसिद्ध किया जा सकता है।

(2) किसी अपराध के लिए दोषमुक्त या दोषसिद्ध किए गए किसी व्यक्ति का विचारण, तत्पश्चात् राज्य सरकार की सम्मति से किसी ऐसे भिन्न अपराध के लिए किया जा सकता है जिसके लिए पूर्वगामी विचारण में उसके विरुद्ध धारा 220 की उपधारा (1) के अधीन पृथक् आरोप लगाया जा सकता था।

(3) जो व्यक्ति किसी ऐसे कार्य से बनने वाले किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध किया गया है, जो ऐसे परिणाम पैदा करता है जो उस कार्य से मिलकर उस अपराध से, जिसके लिए वह दोषसिद्ध हुआ, भिन्न कोई अपराध बनाते हैं, उसका ऐसे अंतिम वर्णित अपराध के लिए तत्पश्चात् विचारण किया जा सकता है, यदि उस समय जब वह दोषसिद्ध किया गया था वे परिणाम हुए नहीं थे या उनका होना न्यायालय को ज्ञात नहीं था।

(4) जो व्यक्ति किन्हीं कार्यों से बनने वाले किसी अपराध के लिए दोषमुक्त या दोषसिद्ध किया गया है, उस पर ऐसी दोषमुक्ति या दोषसिद्धि के होने पर भी, उन्हीं कार्यों से बनने वाले और उसके द्वारा किए गए किसी अन्य अपराध के लिए तत्पश्चात् आरोप लगाया जा सकता है और उसका विचारण किया जा सकता है, यदि वह न्यायालय, जिसके द्वारा पहले उसका विचारण किया गया था, उस अपराध के विचारण के लिए सक्षम नहीं था जिसके लिए बाद में उस पर आरोप लगाया जाता है।

(5) धारा 258 के अधीन उन्मोचित किया गए व्यक्ति का उसी अपराध के लिए पुनः विचारण उस न्यायालय की, जिसके द्वारा वह उन्मोचित किया गया था, अन्य किसी ऐसे न्यायालय की, जिसके प्रथम वर्णित न्यायालय अधीनस्थ है, सम्मति के बिना नहीं किया जाएगा।

(6) इस धारा की कोई बात साधारण खण्ड अधिनियम, 1897 (1897 का 10) की धारा 26 के या इस संहिता की धारा 188 के उपबंधों पर प्रभाव न डालेगी। 

स्पष्टीकरण -- परिवाद का खारिज किया जाना या अभियुक्त का उन्मोचन इस धारा के प्रयोजन के लिए दोषमुक्ति नहीं है।

दृष्टांत - 

(क) क का विचारण सेवक की हैसियत में चोरी करने के आरोप पर किया जाता है और वह दोषमुक्त कर दिया जाता है। जब तक दोषमुक्ति प्रवृत्त रहे, उस पर सेवक के रूप में चोरी के लिए या उन्हीं तथ्यों पर केवल चोरी के लिए या आपराधिक न्यासभंग के लिए बाद में आरोप नहीं लगाया जा सकता है।

(ख) घोर उपहति कारित करने के लिए क का विचारण किया जाता है और वह दोषसिद्ध किया जाता है। क्षत व्यक्ति तत्पश्चात् मर जाता है। आपराधिक मानववध के लिए क का पुनः विचारण किया जा सकेगा।

(ग) ख के आपराधिक मानववध के लिए क पर सेशन न्यायालय के समक्ष आरोप लगाया जाता है और वह दोषसिद्ध किया जाता है। ख की हत्या के लिए क का उन्हीं तथ्यों पर तत्पश्चात् विचारण नहीं किया जा सकेगा।

(घ) ख को स्वेच्छा से उपहति कारित करने के लिए क पर प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट द्वारा आरोप लगाया जाता है और वह दोषसिद्ध किया जाता है। ख को स्वेच्छा से घोर उपहति कारित करने के लिए क का उन्हीं तथ्यों पर तत्पश्चात् विचारण नहीं किया जा सकेगा जब तक कि मामला इस धारा की उपधारा (3) के अन्दर न आए।

(ङ) ख के शरीर से सम्पत्ति की चोरी करने के लिए क पर द्वितीय वर्ग मजिस्ट्रेट द्वारा आरोप लगाया जाता है और वह दोषसिद्ध किया जाता है। उन्हीं तथ्यों पर तत्पश्चात् क पर लूट का आरोप लगाया जा सकेगा और उसका विचारण किया जा सकेगा।

(च) घ को लूटने के लिए क, ख और ग पर प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट द्वारा आरोप लगाया जाता है और वे दोषसिद्ध किए जाते हैं। डकैती के लिए उन्हीं तथ्यों पर तत्पश्चात् क, ख और ग पर आरोप लगाया जा सकेगा और उनका विचारण किया जा सकेगा।



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