Section 255 CrPC

 Section 255 CrPC in Hindi and English

Section 255 of CrPC 1973 :- 255. Acquittal or conviction -

(1) If the Magistrate, upon taking the evidence referred to in section 254 and such further evidence, if any, as he may, of his own motion, cause to be produced, finds the accused not guilty, he shall record an order of acquittal.

(2) Where the Magistrate does not proceed in accordance with the provisions of section 325 or section 360, he shall, if he finds the accused guilty, pass sentence upon him according to law.

(3) A Magistrate may, under section 252 or section 255, convict the accused of any offence triable under this Chapter, which from the facts admitted or proved he appears to have committed, whatever may be the nature of the complaint or summons, if the Magistrate is satisfied that the accused would not be prejudiced thereby.

Supreme Court of India Important Judgments And Case Law Related to Section 255 of Criminal Procedure Code 1973:

S. K. Kashyap & Anr vs The State Of Rajasthan on 2 March, 1971

Lt. Col. S.K. Kashyap And Anr. vs The State Of Rajasthan on 2 March, 1971

Mohammad Chand Mulani vs Union Of India & Ors on 18 September, 2006

Jaya Simha vs State Of Karnataka on 21 September, 2007

Nanjappa vs Union Of India on 17 April, 2007

दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 255 का विवरण :  -  255. दोषमुक्ति था दोषसिद्धि --

(1) यदि मजिस्ट्रेट धारा 254 में निर्दिष्ट साक्ष्य और ऐसा अतिरिक्त साक्ष्य, यदि कोई हो, जो वह स्वप्रेरणा से पेश करवाए, लेने पर इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि अभियुक्त दोषी नहीं है तो वह दोषमुक्ति का आदेश अभिलिखित करेगा।

(2) जहाँ मजिस्ट्रेट धारा 325 या धारा 360 के उपबंधों के अनुसार कार्यवाही नहीं करता है वहाँ यदि वह इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि अभियुक्त दोषी है तो वह विधि के अनुसार उसके बारे में दण्डादेश दे सकेगा।

(3) कोई मजिस्ट्रेट, धारा 252 या धारा 255 के अधीन, किसी अभियुक्त को, चाहे परिवाद या समन किसी भी प्रकार का रहा हो, इस अध्याय के अधीन विचारणीय किसी भी ऐसे अपराध के लिए जो स्वीकृत या साबित तथ्यों से उसके द्वारा किया गया प्रतीत होता है, दोषसिद्ध कर सकता है यदि मजिस्ट्रेट का समाधान हो जाता है कि उससे अभियुक्त पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।

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