Section 248 CrPC


Section 248 CrPC in Hindi and English

Section 248 of CrPC 1973 :- 248. Acquittal or conviction —

(1) If, in any case under this Chapter in which a charge has been framed, the Magistrate finds the accused not guilty, he shall record an order of acquittal.

(2) Where, in any case under this Chapter, the Magistrate finds the accused guilty, but does not proceed in accordance with the provisions of section 325 or section 360, he shall, after hearing the accused on the question of sentence, pass sentence upon him according to law.

(3) Where, in any case under this Chapter, a previous conviction is charged under the provisions of sub-section (7) of section 211 and the accused does not admit that he has been previously convicted as alleged in the charge, the Magistrate may, after he has convicted the said accused, take evidence in respect of the alleged previous conviction, and shall record a finding thereon :

Provided that no such charge shall be read out by the Magistrate nor shall the accused be asked to plead thereto nor shall the previous conviction be referred to by the prosecution or in any evidence adduced by it, unless and until the accused has been convicted under sub-section (2).

Supreme Court of India Important Judgments And Case Law Related to Section 248 of Criminal Procedure Code 1973:

Ballavdas Agarwala vs Shri J. C. Chakravarty on 15 January, 1960

Cricket Association Of Bengal & vs State Of West Bengal & Ors on 24 March, 1971

Mohammad Giasuddin vs State Of Andhra Pradesh on 6 May, 1977

Dilbag Singh vs State Of Punjab on 25 January, 1979

V. C. Shukla vs State (Delhi Administration) on 11 April, 1980

Sri Krishan Gopal Sharma Anr vs Government Of N.C.T. Of Delhi on 7 May, 1996

दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 248 का विवरण :  -  248. दोषमुक्ति या दोषसिद्धि --

(1) यदि इस अध्याय के अधीन किसी मामले में, जिसमें आरोप विरचित किया गया है, मजिस्ट्रेट इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि अभियुक्त दोषी नहीं है तो वह दोषमुक्ति का आदेश अभिलिखित करेगा।

(2) जहाँ इस अध्याय के अधीन किसी मामले में मजिस्ट्रेट इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि अभियुक्त दोषी है, किन्तु वह धारा 325 या धारा 360 के उपबंधों के अनुसार कार्यवाही नहीं करता है वहाँ वह दण्ड के प्रश्न पर अभियुक्त को सुनने के पश्चात् विधि के अनुसार उसके बारे में दण्डादेश दे सकता है।

(3) जहाँ इस अध्याय के अधीन किसी मामले में धारा 211 की उपधारा (7) के उपबंधों के अधीन पूर्व दोषसिद्धि का आरोप लगाया गया है और अभियुक्त यह स्वीकार नहीं करता है कि आरोप में किए गए अभिकथन के अनुसार उसे पहले दोषसिद्ध किया गया था वहाँ मजिस्ट्रेट उक्त अभियुक्त को दोषसिद्ध करने के पश्चात् अभिकथित पूर्व दोषसिद्धि के बारे में साक्ष्य ले सकेगा और उस पर निष्कर्ष अभिलिखित करेगा:

परन्तु जब तक अभियुक्त उपधारा (2) के अधीन दोषसिद्ध नहीं कर दिया जाता है तब तक न तो ऐसा आरोप मजिस्ट्रेट द्वारा पढ़कर सुनाया जाएगा, न अभियुक्त से उस पर अभिवचन करने को कहा जाएगा, और न पूर्व दोषसिद्धि का निर्देश अभियोजन द्वारा, या उसके द्वारा दिए गए किसी साक्ष्य में, किया जाएगा।

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