Section 21 Indian Evidence Act 1872

Section 21 Indian Evidence Act 1872 in Hindi and English 


Section  21 Evidence Act 1872 :Proof of admissions against persons making them, and by or on their behalf -- Admissions are relevant and may be proved as against the person who makes them, or his representative in interest; but they cannot be proved by or on behalf of the person who makes them or by his representative in interest, except in the following cases :-

(1) An admission may be proved by or on behalf of the person making it, when it is of such a nature that, if the person making it were dead, it would be relevant as between third persons under section 32.

(2) An admission may be proved by or on behalf of the person making it, when it consists of a statement of the existence of any state of mind or body, relevant or in issue, made at or about the time when such state of mind or body existed, and is accompanied by conduct rendering its falsehood improbable.

(3) An admission may be proved by or on behalf of the person making it, if it is relevant otherwise than as an admission.

Illustrations

(a) The question between A and B is, whether a certain deed is or is not forged. A affirms that it is genuine, B that it is forged.

A may prove a statement by B that the deed is genuine, and B may prove a statement by A that the deed is forged; but A cannot prove a statement by himself that the deed is genuine, nor can B prove a statement by h

(b) A, the captain of ship, is tried for casting her away.

Evidence is given to show that the ship was taken out of her proper course. A produces a book kept by him in the ordinary course of his business showing observations alleged to have been taken by him from day to day, and indicating that the ship was not taken out of her proper course. A may prove these statements, because they would be admissible between third parties, if he were dead, under section 32, clause (2).

(c) A is accused of a crime committed by him at Calcutta.

He produces a letter written by himself and dated at Lahore on that day, and bearing the Lahore post-mark of that day.

The statement in the date of the letter is admissible, because, if A were dead, it would be admissible under section 32, clause (2).

(d) A is accused of receiving stolen goods knowing them to be stolen. He offers to prove that he refused to sell them below their value.

A may prove these statements, though they are admissions, because they are explanatory of conduct influenced by facts in issue.

(e) A is accused of fraudulently having in his possession counterfeit coin which he knew to be counterfeit.

He offers to prove that he asked a skilful person to examine the coin as he doubted whether it was counterfeit or not, and that the person did examine it and told him it was genuine.

A may prove these facts for the reasons stated in the last preceding illustration.




Supreme Court of India Important Judgments And Case Law Related to Section 21 Indian Evidence Act 1872:

Badku Joti Savant vs State Of Mysore on 1 March, 1966

Balkishan A. Devidayal Etc vs State Of Maharashtra Etc on 31 July, 1980

Faddi vs The State Of Madhya Pradesh on 24 January, 1964

Dipakbhai Jagdishchndra Patel vs The State Of Gujarat on 24 April, 2019

State Of Tamil Nadu Through  vs Nalini And 25 Others on 11 May, 1999

Yakub Abdul Razak Memon vs State Of Maharashtra Th:Cbi on 21 March, 2013

Central Bureau Of Investigation vs V.C. Shukla & Ors on 2 March, 1998

Bhogilal Chunilal Pandya vs The State Of Bombay on 4 November, 1958

Mohmed Amin @ Amin C.R.M.Shaikh & vs C.B.I Tr.Its Director on 18 November, 2008

S. Shanmugadivelu, S. Nalini & vs State By D.S.P., Cbi, Sit, Chennai on 11 May, 1999


भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 21 का विवरण :  -  स्वीकृतियों का उन्हें करने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध और उनके द्वारा या उनकी ओर से साबित किया जाना -- स्वीकृतियाँ उन्हें करने वाले व्यक्ति के या उसके हित प्रतिनिधि के विरुद्ध सुसंगत हैं और साबित की जा सकेंगी, किन्तु उन्हें करने वाले व्यक्ति द्वारा या उसकी ओर से या उसके हित प्रतिनिधि द्वारा निम्नलिखित अवस्थाओं में के सिवाय उन्हें साबित नहीं किया जा सकेगा :-

(1) कोई स्वीकृति उसे करने वाले व्यक्ति द्वारा या उसकी ओर से तब साबित की जा सकेगी, जबकि वह इस प्रकृति की है कि यदि उसे करने वाला व्यक्ति मर गया होता, तो वह अन्य व्यक्तियों के बीच धारा 32 के अधीन सुसंगत होती।

(2) कोई स्वीकृति उसे करने वाले व्यक्ति द्वारा या उसकी ओर से तब साबित की जा सकेगी, जबकि वह मन की या शरीर की सुसंगत या विवाद्य किसी दशा के अस्तित्व का ऐसा कथन है जो उस समय या उसके लगभग किया गया था, जब मन की या शरीर की ऐसी दशा विद्यमान थी और ऐसे आचरण के साथ है जो उसकी असत्यता को अनधिसम्भाव्य कर देता है।

(3) कोई स्वीकृति उसे करने वाले व्यक्ति द्वारा या उसकी ओर से साबित की जा सकेगी, यदि वह स्वीकृति के रूप में नहीं किन्तु अन्यथा सुसंगत है।


दृष्टांत

(क) क और ख के बीच प्रश्न यह है कि अमुक विलेख कूटरचित है या नहीं। क प्रतिज्ञात करता है कि वह असली है, ख प्रतिज्ञात करता है कि वह कूटरचित है।

ख का कोई कथन कि विलेख असली है, क साबित कर सकेगा तथा क का कोई कथन कि विलेख कूटरचित है, ख साबित कर सकेगा। किन्तु क अपना यह कथन कि विलेख असली है साबित नहीं कर सकेगा और न ख ही अपना यह कथन कि विलेख कूटरचित है, साबित कर सकेगा।

(ख) किसी पोत के कप्तान, क का विचारण उस पोत को संत्यक्त करने के लिए किया जाता है।

यह दर्शित करने के लिए साक्ष्य दिया जाता है कि पोत अपने उचित मार्ग से बाहर ले जाया गया था।

क अपने कारबार के मामूली अनुक्रम में अपने द्वारा रखी जाने वाली वह पुस्तक पेश करता है जिसमें वे संप्रेषण दर्शित है, जिनके बारे में यह अभिकथित है कि वे दिन-प्रतिदिन किए गए थे और जिनसे उपदर्शित है कि पोत अपने उचित मार्ग से बाहर नहीं ले जाया गया था। क इन कथनों को साबित कर सकेगा क्योंकि, यदि उसकी मृत्यु हो गई होती तो वे कथन अन्य व्यक्तियों के बीच धारा 32, खण्ड (2) के अधीन ग्राह्य होते।

(ग) क अपने द्वारा कलकत्ता में किए गए अपराध का अभियुक्त है।

वह अपने द्वारा लिखित और उस दिन लाहौर में दिनांकित और उसी दिन का लाहौर डाक चिह्न धारण करने वाला पत्र पेश करता है।

पत्र की तारीख का कथन ग्राह्य है क्योंकि, यदि क की मृत्यु हो गई होती तो वह धारा 32, खण्ड (2) के अधीन ग्राह्य होता।

(घ) क चुराए हुए माल को यह जानते हुए कि वह चुराया हुआ है प्राप्त करने का अभियुक्त है।

वह यह साबित करने की प्रस्थापना करता है कि उसने उसे उसके मूल्य से कम में बेचने से इंकार किया था। यद्यपि ये स्वीकृतियाँ हैं तथापि क इन कथनों को साबित कर सकेगा, क्योंकि ये विवाद्यक तथ्यों से प्रभावित उसके आचरण के स्पष्टीकारक हैं।

(ङ) क अपने कब्जे में कूटकृत सिक्का जिसका कूटकृत होना वह जानता था, कपटपूर्वक रखने का अभियुक्त है।

वह यह साबित करने की प्रस्थापना करता है कि उसने एक कुशल व्यक्ति से उस सिक्के की परीक्षा करने को कहा था, क्योंकि उसे शंका थी कि वह कूटकृत है या नहीं और उस व्यक्ति ने उसकी परीक्षा की थी और उसने कहा था कि वह असली है।


अंतिम पूर्ववर्ती दृष्टांत में कथित कारणों से क इन तथ्यों को साबित कर सकेगा।


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