Section 18 Indian Evidence Act 1872

 



Section 18 Indian Evidence Act 1872 in Hindi and English 


Section 18 Evidence Act 1872 :Admission by party to proceeding or his agent -- Statements made by a party circumstances of the case, as expressly or impliedly authorized by him to make them, are admissions.

By suitor in representative character -- Statements made by parties to suits, suing or sued in a representative character, are not admissions, unless they were made while the party making them held that character.          

Statements made by -

(1) party interested in subject matter -- persons who have any proprietary or pecuniary interest in the subject-matter of the proceeding, and who make the statement in their character of persons so interested, or

(2) person from whom interest derived -- persons from whom the parties to the suit have derived their interest in the subject-matter of the suit, are admissions, if they are made during the continuance of the interest of the persons making the statements.



Supreme Court of India Important Judgments And Case Law Related to Section 18 Indian Evidence Act 1872:

Additional District Magistrate, vs S. S. Shukla Etc. Etc on 28 April, 1976

Prakash Kumar @ Prakash Bhutto vs State Of Gujarat on 12 January, 2005

Prakash Kumar @ Prakash Bhutto vs State Of Gujarat [Alongwith on 12 January, 2005

Prakash Kumar @ Prakash Bhutto vs State Of Gujarat on 12 January, 2005

Sri Chand Gupta vs Gulzar Singh And Anr on 22 October, 1991

Ajit Singh vs State Of Punjab & Anr on 2 December, 1966

Additional District Magistrate, vs Shivakant Shukla on 28 April, 1976

Central Bureau Of Investigation vs V.C. Shukla & Ors on 2 March, 1998

Excise Commissioner. U.P., vs Ram Kumar on 5 May, 1976

Bhogilal Chunilal Pandya vs The State Of Bombay on 4 November, 1958



भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 18 का विवरण :  -स्वीकृति -- कार्यवाही के पक्षकार या उसके अभिकर्ता द्वारा -- वे कथन स्वीकृतियाँ हैं, जिन्हें कार्यवाही के किसी पक्षकार ने किया हो, या ऐसे किसी पक्षकार के ऐसे किसी अभिकर्ता ने किया हो जिसे मामले की परिस्थितियों में न्यायालय उन कथनों को करने के लिए उस पक्षकार द्वारा अभिव्यक्त या विवक्षित रूप से प्राधिकृत किया हुआ मानता है।

प्रतिनिधिक रूप से वादकर्ता द्वारा -- वाद के ऐसे पक्षकारों द्वारा, जो प्रतिनिधिक हैसियत में वाद ला रहे हों या जिन पर प्रतिनिधिक हैसियत में वाद लाया जा रहा हो, किए गए कथन, जब तक कि वे उस समय न किए गए हों, जब कि उनको करने वाला पक्षकार वैसी हैसियत धारण करता था, स्वीकृतियां नहीं हैं।

वे कथन स्वीकृतियां हैं, जो --

(1) विषयवस्तु में हितबद्ध पक्षकार द्वारा -- ऐसे व्यक्तियों द्वारा किए गए हैं, जिनका कार्यवाही की विषयवस्तु में कोई साम्पत्तिक या धन संबंधी हित है और जो इस प्रकार हितबद्ध व्यक्तियों की हैसियत में वह कथन करते हैं, अथवा

(2) उस व्यक्ति द्वारा जिससे हित व्युत्पन्न हुआ हो -- ऐसे व्यक्तियों द्वारा किए गए हैं, जिनसे वाद के पक्षकारों का वाद की विषयवस्तु में अपना हित व्युत्पन्न हुआ है,

यदि वे कथन उन्हें करने वाले व्यक्तियों के हित के चालू रहने के दौरान में किए गए हैं।


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