Section 147 CrPC

 

Section 147 CrPC in Hindi and English



Section 147 of CrPC 1973 :- 147. Dispute concerning right of use of land or water -(1) Whenever an Executive Magistrate is satisfied from the report of a police officer or upon other information, that a dispute likely to cause a breach of the peace exists regarding any alleged right of user of any land or water within his local jurisdiction, whether such right be claimed as an easement or otherwise, he shall make an order in writing, stating the grounds of his being so satisfied and requiring the parties concerned in such dispute to attend his Court in person or by pleader on a specified date and time and to put in written statements of their respective claims.

Explanation - The expression “land or water” has the meaning given to it in subsection (2) of section 145.

(2) The Magistrate shall then peruse the statements so put in, hear the parties, receive all such evidence as may be produced by them respectively, consider the effect of such evidence, take such further evidence, if any, as he thinks necessary and, if possible, decide whether such right exists; and the provisions of section 145 shall, so far as may be, apply in the case of such inquiry.

(3) If it appears to such Magistrate that such rights exist, he may make an order prohibiting any interference with the exercise of such right, including, in a proper case, an order for the removal of any obstruction in the exercise of any such right:

Provided that no such order shall be made where the right is exercisable at all times of the year, unless such right has been exercised within three months next before the receipt under sub-section (1) of the report of a police officer or other information leading to the institution of the inquiry, or where the right is exercisable only at particular seasons or on particular occasions, unless the right has been exercised during the last of such seasons or on the last of such occasions before such receipt.

(4) When in any proceedings commenced under sub-section (1) of section 145 the Magistrate finds that the dispute is as regards an alleged right of user of land or water, he may, after recording his reasons, continue with the proceedings as if they had been commenced under sub-section (1); and when in any proceedings commenced under sub-section (1) the Magistrate finds that the dispute should be dealt with under section 145, he may, after recording his reasons, continue with the proceedings as if they had been commenced under sub-section (1) of section 145.



Supreme Court of India Important Judgments And Case Law Related to Section 147 of Criminal Procedure Code 1973:

Pampapathy vs State Of Mysore on 28 July, 1966

Upkar Singh vs Ved Prakash & Ors on 10 September, 2004

Santosh Kumari vs State Of J & K & Ors on 13 September, 2011

Upkar Singh vs Ved Prakash & Ors on 10 September, 2004

Kishun Singh And Ors vs State Of Bihar on 11 January, 1993

K.K.Sreedharan & Ors vs State Of Kerala on 21 July, 2011

Shankar Kerba Jadhav & Ors vs State Of Maharashtra on 8 September, 1969

Natabar Parida Bisnu Charan  vs State Of Orissa on 16 April, 1975

Smt. Nagawwa vs Veeranna Shivallngappa Konjalgi on 23 April, 1976

Rameshwar Dayal And Ors vs The State Of Uttar Pradesh on 15 February, 1978



दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 147 का विवरण :  -  147. भूमि या जल के उपयोग के अधिकार से संबद्ध विवाद -- (1) जब किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट का, पुलिस अधिकारी की रिपोर्ट से या अन्य इत्तिला पर, समाधान हो जाता है कि उसकी स्थानीय अधिकारिता के अंदर किसी भूमि या जल के उपयोग के किसी अभिकथित अधिकार के बारे में, चाहे ऐसे अधिकार का दावा सुखाचार के रूप में किया गया हो या अन्यथा, विवाद वर्तमान है जिससे परिशांति भंग होनी संभाव्य है, तब वह अपना ऐसा समाधान होने के आधारों का कथन करते हुए और विवाद से संबद्ध पक्षकारों से यह अपेक्षा करते हुए लिखित आदेश दे सकता है कि वे विनिर्दिष्ट तारीख और समय पर स्वयं या प्लीडर द्वारा उनके न्यायालय में हाजिर हों और अपने-अपने दावों का लिखित कथन पेश करें।


स्पष्टीकरण -- “भूमि या जल” पद का वही अर्थ होगा जो धारा 145 की उपधारा (2) में दिया गया है।

(2) मजिस्ट्रेट तब इस प्रकार पेश किए गए कथनों का परिशीलन करेगा, पक्षकारों को सुनेगा, ऐसा सब साक्ष्य लेगा जो उनके द्वारा पेश किया जाए, ऐसे साक्ष्य के प्रभाव पर विचार करेगा, ऐसा अतिरिक्त साक्ष्य, यदि कोई हो, लेगा जो वह आवश्यक समझे और, यदि संभव हो तो विनिश्चय करेगा कि क्या ऐसा अधिकार वर्तमान है; और ऐसी जांच के मामले में धारा 145 के उपबंध यावतशक्य लागू होंगे।

(3) यदि उस मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत होता है कि ऐसे अधिकार वर्तमान हैं तो वह ऐसे अधिकार के प्रयोग में किसी भी हस्तक्षेप का प्रतिषेध करने का और यथोचित मामले में ऐसे किसी अधिकार के प्रयोग में किसी बाधा को हटाने का भी आदेश दे सकता है :

परन्तु जहाँ ऐसे अधिकार का प्रयोग वर्ष में हर समय किया जा सकता है वहाँ जब तक ऐसे अधिकार का प्रयोग उपधारा (1) के अधीन पुलिस अधिकारी की रिपोर्ट या अन्य इत्तिला की, जिसके परिणामस्वरूप जांच संस्थित की गई है, प्राप्ति के ठीक पहले तीन मास के अन्दर नहीं किया गया है अथवा जहाँ ऐसे अधिकार का प्रयोग विशिष्ट मौसमों में हो या विशिष्ट अवसरों पर ही किया जा सकता है वहाँ जब तक ऐसे अधिकार का प्रयोग ऐसी प्राप्ति के पूर्व के ऐसे मौसमों में से अंतिम मौसम के दौरान या ऐसे अवसरों में से अंतिम अवसर पर नहीं किया गया है, ऐसा कोई आदेश नहीं दिया जाएगा।

(4) जब धारा 145 की उपधारा (1) के अधीन प्रारंभ की गई किसी कार्यवाही में मजिस्ट्रेट को यह मालूम पड़ता है कि विवाद भूमि या जल के उपयोग के किसी अभिकथित अधिकार के बारे में है, तो वह, अपने कारण अभिलिखित करने के पश्चात् कार्यवाही को ऐसे चालू रख सकता है, मानो वह उपधारा (1) के अधीन प्रारंभ की गई हो; और जब उपधारा (1) के अधीन प्रारंभ की गई किसी कार्यवाही में मजिस्ट्रेट को यह मालूम पड़ता है कि विवाद के संबंध में धारा 145 के अधीन कार्यवाही की जानी चाहिए तो वह अपने कारण अभिलिखित करने के पश्चात् कार्यवाही को ऐसे चालू रख सकता है, मानो वह धारा 145 की उपधारा (1) के अधीन प्रारंभ की गई हो।



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