Section 145 CrPC

 Section 145 CrPC in Hindi and English

Section 145 of CrPC 1973 :-  

145. Procedure where dispute concerning land or water is likely to cause breach of peace --- (1) Whenever an Executive Magistrate is satisfied from a report of a police officer or upon other information that a dispute likely to cause a breach of the peace exists concerning any land or water or the boundaries thereof, within his local jurisdiction, he shall make an order in writing, stating the grounds of his being so satisfied and requiring the parties concerned in such dispute to attend his Court in person or by pleader, on a specified date and time and to put in written statements of their respective claims as respects the fact of actual possession of the subject of dispute.

(2) For the purposes of this section, the expression "land or water” includes buildings, markets, fisheries, crops or other produce of land and the rents or profits of any such property.

(3) A copy of the order shall be served in the manner provided by this Code for the service of a summons upon such person or persons as the Magistrate may direct and at least one copy shall be published by being affixed to some conspicuous place at or near the subject of dispute.

(4) The Magistrate shall then, without reference to the merits or the claims of any of the parties, to a right to possess the subject of dispute, peruse the statements so put in, hear the parties, receive all such evidence as may be produced by them, take such further evidence, if any as he thinks necessary and, if possible, decide whether and which of the parties was, at the date of the order made by him under sub-section (1), in possession of the subject of dispute :

Provided that if it appears to the Magistrate that any party has been forcibly and wrongfully dispossessed within two months next before the date on which the report of a police officer or other information was received by the Magistrate, or after that date and before the date of his order under sub-section (1'), he may treat the party so dispossessed as if that party had been in possession on the date of his order under sub-section (1).

(5) Nothing in this section shall preclude any party so required to attend, or any other person interested, from showing that no such dispute as aforesaid exists or has existed; and in such case the Magistrate shall cancel his said order and all further proceedings thereon shall be stayed, but, subject to such cancellation, the order of the Magistrate under sub-section (1) shall be final.

(6) (a) If the Magistrate decides that one of the parties was, or should under the proviso to sub-section (4) be treated as being, in such possession of the said subject, he shall issue an order declaring such party to be entitled to possession thereof until evicted therefrom in due course of law and forbidding all disturbance of such possession until such eviction; and when he proceeds under the proviso to sub-section (4), may restore to possession the party forcibly and wrongfully dispossessed.

(b) The order made under this sub-section shall be served and published in the manner laid down in sub-section (3).

(7) When any party to any such proceeding dies, the Magistrate may cause the legal representative of the deceased party to be made a party to the proceeding and shall thereupon continue the inquiry and if any question arises as to who the legal representative of a deceased party for the purposes of such proceeding is, all persons claiming to be representatives of the deceased party shall be made parties thereto.

(8) If the Magistrate is of opinion that any crop or other produce of the property, the subject of dispute in a proceeding under this section pending before him, is subject to speedy and natural decay, he may make an order for the proper custody or sale of such property and, upon the completion of the inquiry, shall make such order for the disposal of such property, or the sale-proceeds thereof, as he thinks fit.

(9) The Magistrate may, if he thinks fit, at any stage of the proceedings under this section, on the application of either party, issue a summons to any witness directing him to attend or to produce any document or thing.

(10) Nothing in this section shall be deemed to be in derogation of the powers of the Magistrate to proceed under section 107.

Supreme Court of India Important Judgments And Case Law Related to Section 145 of Criminal Procedure Code 1973:

Shanti Kumar Panda vs Shakutala Devi on 3 November, 2003

Mathuralal vs Bhawarlal & Anr on 13 September, 1979

V. Kalyanaswamy (D) By Lrs. vs L. Bakthavatsalam (D) Thr. Lrs. on 17 July, 2020

Amresh Tiwari vs Lalta Prasad Dubey & Anr on 11 April, 2000

Amresh Tiwari vs Lalta Prasad Dubey & Anr on 25 April, 2000

M.P.Peter vs State Of Kerala & Ors on 11 May, 2009

Satish Chander Ahuja vs Sneha Ahuja on 15 October, 2020

Shakuntala Devi & Ors vs Chamru Mahto & Anr on 10 February, 2009

Rajpati vs Bachan & Anr on 28 July, 1980

Ashok Kumar vs State Of Uttarakhand & Ors on 13 December, 2012

दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 145 का विवरण :  -  145. जहाँ भूमि या जल से संबद्ध विवादों से परिशांति भंग होना संभाव्य है वहाँ प्रक्रिया -- (1) जब कभी किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट का, पुलिस अधिकारी की रिपोर्ट से या अन्य इत्तिला पर समाधान हो जाता है कि उसकी स्थानीय अधिकारिता के अंदर किसी भूमि या जल या उसकी सीमाओं से संबद्ध ऐसा विवाद विद्यमान है, जिससे परिशांति भंग होना संभाव्य है, तब वह अपना ऐसा समाधान होने के आधारों का कथन करते हुए और ऐसे विवाद से संबद्ध पक्षकारों से यह अपेक्षा करते हुए लिखित आदेश देगा कि वे विनिर्दिष्ट तारीख और समय पर स्वयं या प्लीडर द्वारा उसके न्यायालय में हाजिर हों, और विवाद की विषयवस्तु पर वास्तविक कब्जे के तथ्य के बारे में अपने अपने दावों का लिखित कथन पेश करें।

(2) इस धारा के प्रयोजनों के लिए “भूमि या जल” पद के अन्तर्गत भवन, बाजार, मीनक्षेत्र, फसलें, भूमि की अन्य उपज और ऐसी किसी संपत्ति के भाटक या लाभ भी हैं।

(3) इस आदेश की एक प्रति की तामील इस संहिता द्वारा समनों की तामील के लिए उपबंधित रीति से ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों पर की जाएगी, जिन्हें मजिस्ट्रेट निदिष्ट करे, और कम से कम एक प्रति विवाद की विषयवस्तु पर या उसके निकट किसी सहजदृश्य स्थान पर लगाकर प्रकाशित की जाएगी । 

(4) मजिस्ट्रेट तब विवाद की विषयवस्तु को पक्षकारों में से किसी के भी कब्जे में रखने के अधिकार के गुणागुण या दावे के प्रति निर्देश किए बिना उन कथनों का, जो ऐसे पेश किए गए हैं, परिशीलन करेगा, पक्षकारों को सुनेगा और ऐसे सभी साक्ष्य लेगा जो उनके द्वारा प्रस्तुत किया जाए, ऐसा अतिरिक्त साक्ष्य, यदि कोई हो, लेगा जैसा वह आवश्यक समझे और यदि संभव हो तो वह विनिश्चित करेगा कि क्या उन पक्षकारों में से कोई उपधारा (1) के अधीन उसके द्वारा दिए गए आदेश की तारीख पर विवाद की विषयवस्तु पर कब्जा रखता था और यदि रखता था तो वह कौन-सा पक्षकार था :

परन्तु यदि मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत होता है कि कोई पक्षकार उस तारीख के, जिसको पुलिस अधिकारी की रिपोर्ट या अन्य इत्तिला मजिस्ट्रेट को प्राप्त हुई, ठीक पूर्व दो मास के अन्दर या उस तारीख के पश्चात् और उपधारा (1) के अधीन उसके आदेश की तारीख के पूर्व बलात् और सदोष रूप से बेकब्जा किया गया है तो वह यह मान सकेगा कि उस प्रकार बेकब्जा किया गया पक्षकार उपधारा (1) के अधीन उसके आदेश की तारीख को कब्जा रखता था।

(5) इस धारा की कोई बात, हाजिर होने के लिये ऐसे अपेक्षित किसी पक्षकार को या किसी अन्य हितबद्ध व्यक्ति को यह दर्शित करने से नहीं रोकेगी कि कोई पूर्वोक्त प्रकार का विवाद वर्तमान नहीं है या नहीं रहा है और ऐसी दशा में मजिस्ट्रेट अपने उक्त आदेश को रद्द कर देगा और उस पर आगे की सब कार्यवाहियाँ रोक दी जाएंगी किन्तु उपधारा (1) के अधीन मजिस्ट्रेट का आदेश ऐसे रद्दकरण के अधीन रहते हुए अंतिम होगा।

(6) (क) यदि मजिस्ट्रेट यह विनिश्चय करता है कि पक्षकारों में से एक को उक्त विषयवस्तु पर ऐसा कब्जा था या उपधारा (4) के परन्तुक के अधीन ऐसा कब्जा माना जाना चाहिए, तो वह यह घोषणा करने वाला कि ऐसा पक्षकार उस पर तब तक कब्जा रखने का हकदार है जब तक उसे विधि के सम्यक् अनुक्रम में बेदखल न कर दिया जाए और यह निषेध करने वाला कि जब तक ऐसी बेदखली न कर दी जाए तब तक ऐसे कब्जे में कोई विघ्न न डाला जाए, आदेश जारी करेगा; और जब वह उपधारा (4) के परन्तुक के अधीन कार्यवाही करता है तब उस पक्षकार को, जो बलात् और सदोष बेकब्जा किया गया है, कब्जा लौटा सकता है।

(ख) इस उपधारा के अधीन दिया गया आदेश उपधारा (3) में अधिकथित रीति से तामील और प्रकाशित किया जाएगा।

(7) जब किसी ऐसी कार्यवाही के पक्षकार की मृत्यु हो जाती है तब मजिस्ट्रेट मृत पक्षकार के विधिक प्रतिनिधि को कार्यवाही का पक्षकार बनवा सकेगा और फिर जांच चालू रखेगा और यदि इस बारे में कोई प्रश्न उत्पन्न होता है कि मृत पक्षकार का ऐसी कार्यवाही के प्रयोजन के लिए विधिक प्रतिनिधि कौन है तो मृत पक्षकार का प्रतिनिधि होने का दावा करने वाले सब व्यक्तियों को उस कार्यवाही का पक्षकार बना लिया जाएगा।

(8) यदि मजिस्ट्रेट की यह राय है कि उस संपत्ति की, जो इस धारा के अधीन उसके समक्ष लंबित कार्यवाही में विवाद की विषयवस्तु है, कोई फसल या अन्य उपज शीघ्रतया और प्रकृत्या क्षयशील है तो वह ऐसी संपत्ति की उचित अभिरक्षा या विक्रय के लिए आदेश दे सकता है और जांच के समाप्त होने पर ऐसी संपत्ति के या उसके विक्रय के आगमों के व्ययन के लिए ऐसा आदेश दे सकता है जो वह ठीक समझे।

(9) यदि मजिस्ट्रेट ठीक समझे तो वह इस धारा के अधीन कार्यवाहियों के किसी प्रक्रम में पक्षकारों में से किसी के आवेदन पर किसी साक्षी के नाम समन यह निदेश देते हुए जारी कर सकता है कि वह हाजिर हो या कोई दस्तावेज या चीज पेश करे।

(10) इस धारा की कोई बात धारा 107 के अधीन कार्यवाही करने की मजिस्ट्रेट की शक्तियों का अल्पीकरण करने वाली नहीं समझी जाएगी। 

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