Section 137 CrPC


Section 137 CrPC in Hindi and English

Section 137 of CrPC 1973 :- 137. Procedure where existence of public right is denied — (1) Where an order is made under section 133 for the purpose of preventing obstruction, nuisance or danger to the public in the use of any way river, channel or place, the Magistrate shall, on the appearance before him of the person against whom the order was made, question him as to whether he denies the existence of any public right in respect of the way, river, channel or place and if he does so, the Magistrate shall, before proceeding under section 138, inquire into the matter.

(2) If in such inquiry the Magistrate finds that there is any reliable evidence in support of such denial, he shall stay the proceedings until the matter of the existence of such right has been decided by a competent Court; and if he finds that there is no such evidence, he shall proceed as laid down in section 138.

(3) A person who has, on being questioned by the Magistrate under sub-section (1), failed to deny the existence of a public right of the nature therein referred to, or who, having made such denial, has failed to adduce reliable evidence in support thereof, shall not in the subsequent proceedings be permitted to make any such denial.

Supreme Court of India Important Judgments And Case Law Related to Section 137 of Criminal Procedure Code 1973:

Ashish Batham vs State Of Madhya Pradesh on 9 September, 2002

Mst. Aliaria And Ors. vs Chhannu And Anr. on 4 August, 1972

दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 137 का विवरण :  -  137. जहाँ लोक अधिकार के अस्तित्व से इंकार किया जाता है वहाँ प्रक्रिया -- (1) जहाँ किसी मार्ग, नदी, जलसरणी या स्थान के उपयोग में जनता को होने वाली बाधा, न्यूसेन्स या खतरे का निवारण करने के प्रयोजन के लिए कोई आदेश धारा 133 के अधीन किया जाता है वहाँ मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति के जिसके विरुद्ध वह आदेश किया गया है अपने समक्ष हाजिर होने पर, उससे प्रश्न करेगा कि क्या वह उस मार्ग, नदी, जलसरणी या स्थान के बारे में किसी लोक अधिकार के अस्तित्व से इंकार करता है और यदि वह ऐसा करता है तो मजिस्ट्रेट धारा 138 के अधीन कार्यवाही करने के पहले उस बात की जांच करेगा।

(2) यदि ऐसी जांच में मजिस्ट्रेट इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि ऐसे इंकार के समर्थन में कोई विश्वसनीय साक्ष्य है तो वह कार्यवाही को तब तक के लिए रोक देगा जब तक ऐसे अधिकार के अस्तित्व का मामला सक्षम न्यायालय द्वारा विनिश्चित नहीं कर दिया जाता है और यदि वह इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है तो वह धारा 138 के अनुसार कार्यवाही करेगा।

(3) मजिस्ट्रेट द्वारा उपधारा (1) के अधीन प्रश्न किए जाने पर, जो व्यक्ति उसमें निर्दिष्ट प्रकार के लोक अधिकार के अस्तित्व से इंकार नहीं करता है या ऐसा इंकार करने पर उसके समर्थन में विश्वसनीय साक्ष्य देने में असफल रहता है उसे पश्चात्वर्ती कार्यवाहियों में ऐसा कोई इंकार करने नहीं दिया जाएगा।

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