Section 106 CrPC

 Section 106 CrPC in Hindi and English

Section 106 of CrPC 1973 :- 106. Security for keeping the peace on conviction --(1) When a Court of Session or Court of a Magistrate of the first class convicts a person of any of the offences specified in sub-section (2) or of abetting any such offence and is of opinion that it is necessary to take security from such person for keeping the peace, the Court may, at the time of passing sentence on such person, order him to execute a bond, with or without sureties, for keeping the peace for such period, not exceeding three years, as it thinks fit. 

(2) The offences referred to in sub-section (1) are

(a) any offence punishable under Chapter VIII of the Indian Penal Code (45 of 1860), other than an offence, punishable under section 153A or section 153B or section 154 thereof; 

(b) any offence which consists of, or includes, assault or using criminal force or committing mischief;

(c) any offence of criminal intimidation;

(d) any other offence which caused, or was intended or known to be likely to cause, a breach of the peace.

(3) If the conviction is set aside on appeal or otherwise, the bond so executed shall become void.

(4) An order under this section may also be made by an Appellate Court or by a Court when exercising its powers of revision.

Supreme Court of India Important Judgments And Case Law Related to Section 1 of Criminal Procedure Code 1973:

दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 106 का विवरण :  -  106. दोषसिद्धि पर परिशांति कायम रखने के लिए प्रतिभूति -- (1) जब सेशन न्यायालय या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट का न्यायालय किसी व्यक्ति को उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट अपराधों में से किसी अपराध के लिए या किसी ऐसे अपराध के दुष्प्रेरण के लिए सिद्धदोष ठहराता है और उसकी यह राय है कि यह आवश्यक है कि परिशांति कायम रखने के लिए ऐसे व्यक्ति से प्रतिभूति ली जाए, तब न्यायालय ऐसे व्यक्ति को दण्डादेश देते समय उसे आदेश दे सकता है कि वह तीन वर्ष से अनधिक इतनी अवधि के लिए, जितनी वह ठीक समझे परिशांति कायम रखने के लिए प्रतिभुओं सहित या रहित, बंधपत्र निष्पादित करे । 

(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट अपराध निम्नलिखित हैं--

(क) भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) के अध्याय 8 के अधीन दण्डनीय कोई अपराध जो धारा 153क या धारा 153ख या धारा 154 के अधीन दण्डनीय अपराध से भिन्न है;

(ख) कोई ऐसा अपराध जो, या जिसके अन्तर्गत, हमला या आपराधिक बल का प्रयोग या रिष्टि करना है;

(ग) आपराधिक अभित्रास का कोई अपराध;

(घ) कोई अन्य अपराध, जिससे परिशांति भंग हुई है या जिससे परिशांति भंग आशयित है, या जिसके बारे में ज्ञात था कि उससे परिशांति भंग संभाव्य है।

(3) यदि दोषसिद्धि अपील पर या अन्यथा अपास्त कर दी जाती है तो बंधपत्र, जो ऐसे निष्पादित किया गया था, शून्य हो जाएगा।

(4) इस धारा के अधीन आदेश अपील न्यायालय द्वारा या किसी न्यायालय द्वारा भी जब वह पुनरीक्षण की अपनी शक्तियों का प्रयोग कर रहा हो, किया जा सकेगा।

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