वैध स्थिति (Locus Standi)


प्रश्न० लैटिन भाषा के शब्द Locus Standi का क्या अर्थ है |

उ०  यह लैट्रिन भाषा का शब्द  है जो न्यायालय में मुकदमा दायर करने या न्यायालय में मुकदमा चलाने के अवैध अधिकार की ओर संकेत करता है |

प्रश्न० पारमरिक एगलो सेक्शन( पुरातन अंग्रेजी भाषा) के अनुसार इस शब्द का क्या अर्थ है |

उत्तर० परंपरागत धारणा के अनुरूप केवल वह व्यक्ति जिसके  साथ दुर्व्यवहार हुआ हो न्यायालय में निवारण के लिए दावा कर सकता है | अन्य कोई भी मामले के निवारण हेतु आवेदन नहीं कर सकता | यह सिद्धांत तब  विकसित हुआ जब न्यायालय केवल व्यक्ति विशेष के अधिकारों के बारे में ही चिंतित थे |

प्रश्न०  क्या Locus standi का पुराना सिद्धांत और वर्तमान के सामूहिक अधिकारों के युग में विकासशील समाज की आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए उपयुक्त पाया गया |

उत्तर-  जी नहीं | इसी कारण आवश्यकता महसूस हुई की  Locus standi ( वैध स्थिति) के परंपरागत भाषांतर में  बदलाव लाकर इसे विस्तृत किया जाए जिससे गरीब व पिछड़े वर्ग के लोगों को न्याय प्राप्त हो सके |

प्रश्न०  उच्चतम न्यायालय द्वारा इस सिद्धांत को क्या नई व्याख्या दी गयी? 

उत्तर०. इस सिद्धांत की नई व्याख्या के अनुसार यदि किसी वर्ग के अधिकारियों की अवहेलना होती है और ऐसे व्यक्ति धन के अभाव में अथवा किसी अन्य प्रकार की असमर्थता के कारण न्याय निवारण प्राप्ति के लिए न्यायालय नहीं पहुंच सके तो कोई भी लोक हितैषी व्यक्ति अथवा संस्था सद्भावपूर्वक न कि बदले अथवा प्रतिशोध की भावना से प्रभावित होकर मामले की न्यायिक निवारण हेतु न्यायालय में आवेदन कर सकते हैं |

प्रश्न०  इसी निर्णय में वैद्य स्थिति के कड़े नियम को ढील दी गई ? 

उ०  एस  पी गुप्ता बनाम भारत राज्य संघ(A l R 1982 Sc1 49) के मामले में | 7 न्यायधीशों की संवैधानिक बैच ने बहुमत से यह निर्णय लिया कि जनता में से भी कोई भी व्यक्ति सद्भावना पूर्ण लो हानि या आलोक अन्याय निवारण हेतु उपयुक्त हितों के ध्यान में रखते हुए कोर्ट में आवेदन कर सकता है पर यह दस्तदाज नहीं होना चाहिए | ऐसा व्यक्ति जब अन्य व्यक्तियों या समूह या वर्ग विशेष जिसके साथ अन्याय हुआ हो और जो गरीब, निर्धनता, निरक्षरता, अज्ञानता या सामाजिक दुर्बलता के कारण न्याय में आवेदन न कर सकता हो उसके लिए याचिका दायर कर सकता है | न्यायालय ऐसे मामलों में प्रक्रिया की कड़े रूप से लागू करने के लिए आग्रह नहीं करेंगे |

प्रश्न०  इस निर्णय का वह क्या महत्वपूर्ण भाग है जो वैध स्थिति से संबंध रखता है |

उ०  इस निर्णय में कहा गया अब यह पूर्ण प्रमाणित तथ्य है कि जब भी किसी व्यक्ति,वर्गी या समूह को वैदिक हानि होती है या उनके साथ अवैध रूप से अन्याय होता हो जो उनके संवैधानिक या अवैध अधिकार के उल्लंघन के कारण हुआ हो या फिर उन पर ऐसा भार थोपा गया हो जो संवैधानिक या वैदिक बंधुओं के विरुद्ध हो या कानून द्वारा अधिकृत ना किया गया हो साथ ही ऐसे व्यक्ति वर्ग या समूह अपनी निर्धनता,असहाय स्थिति और अक्षमता, समाजिक या आर्थिक दुर्बलता, अज्ञानता के कारण न्यायालय तक राहत के लिए ना पहुंचे पाते हो तब जनता का कोई भी सदस्य उचित निर्णय, आदेश यार रीट के लिए हाई कोर्ट में अनुच्छेद 226 के प्रावधानों के अनुसार तथा अंतर्गत तथा उच्चतम न्यायालय के अनुच्छेद 32 अंतर्गत इस वर्ग के मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के मामले में न्यायिक रूप से वैधिक  हानि के निवारण के लिए आवेदन कर सकता है |


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