अनुच्छेद 32 के अंतर्गत मुआवजा प्रदान करने की शक्ति

प्रश्न० मूल अधिकारों का उल्लंघन होने पर क्या उच्तम न्यायालय को यह शक्ति है कि वह अनुच्छेद 32 के तहत मुआवजा प्रदान कर सकें? 

उ० जी हाँ । अनुच्छेद 32 के तहत उत्तम न्यायालय को न केवल मूल अधिकारों के हनन को रोकने की शक्ति है बल्कि राहत प्रदान करने की भी शक्ति है अर्थात वह मुआवजा प्रदान करने के लिए भी सशक्त है। एम.सी. मेहता बनाम भारत राज्य संघ(AIR1987SC 1086) मैं न्यायालय ने कहा " न्यायालयों को राहत प्रदान करने की शक्ति है इसमें यह भी शामिल है कि वह उचित मामलों में मुआवजा भी भी प्रदान कर सके" न्यायालय ने कहा है कि मुआवजा केवल उचित मामलों में ही प्रदान किया जा सकता है प्रत्येक मामले में नहीं ।

प्रश्न०  वे  "उचित  मामले  " क्या है जहां न्यायालयों द्वारा मुआवजा प्रदान किया जा सकता है? 

उ० उचित मामलो से अभिप्राय है जहां मूल अधिकारों का गंभीर रूप से हनन हुआ हो जो चिंन्ताप्रद हो। या हनन बड़े स्तर पर हुआ हो और इससे बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हुए हैं या फिर गरीबी या दुर्बलता के कारण या कमजोर सामाजिक तथा आर्थिक स्थिति के कारण उनके साथ अन्याय हुआ हो या उनका शोषण किया हो जिस हनन के कारण प्रभावित व्यक्ति सिविल न्यायालय में कार्यवाही आरंभ करने के लिए विवश हो जाए ।

प्रश्न०  वह कौन से मामले हैं जहां उत्तम न्यायालय ने मुआवजा प्रदान किया है ? 

उ०  रुदल शाह बनाम बिहार राज्य सरकार(1983(4) SC141 मामले मैं। इस मामले में न्यायालय ने याचक को 30,000 रुपए बतौर मुआवजा प्रदान किए क्योंकि वह राज्य सरकार की लापरवाही व गैर जिम्मेदाराना व्यवहार के कारण 14 वर्ष जेल में सडता रहा ।

2, भीम सिंह बनाम जम्मू व कश्मीर राज्य सरकार( 1985 4SCC 677) के मामले में याचक को अवैध हिरासत में बंद कर उसके संवैधानिक अधिकारों के हनन के लिए 50,000 रुपए मुआवजा प्रदान किया गया ।

3, पीपुल्स यूनियन फार डेमोक्रेटिक राइटर्स बनाम पुलिस कमिश्नर दिल्ली पुलिस मुख्यालय( 1989 4SCC 370) के मामले में न्यायालय ने दिल्ली प्रशासन को आदेश दिया कि वह उस मजदूर के परिवार को 75000/- रुपए जुर्माना अदा करें जिसको पुलिस द्वारा पुलिस स्टेशन में केवल इसीलिए मारा गया क्योंकि उसने पुलिस के लिए किए गए कार्य के लिए अपनी मजदूरी की मांग की।

4, सहेली बनाम पुलिस कमिश्नर(AIR  1990 SC 513) के मामले में कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया कि वह 75000/- रुपए मुआवजा उस 9 साल के बच्चे की मां को दें जिसकी मृत्यु पुलिस अधिकारी के मारने पर हो गई थी। वह रिट याचिका सहेली नाम की महिला संस्था द्वारा मृतक की मां के स्थान पर की गई थी।

5, किरनजीत कौर बनाम भारत राज्य संघ( 1994 2SCC 1) के मामले में याचक का पति जो सेना में मेजर था। उसकी मृत्यु संदेह  पद स्थिति में हुई थी। उसकी मृत्यु की जाँच सेना प्राधिकरण द्वारा ठीक प्रकार से नहीं की गई। जांच करते समय ढील  व गंभीर  लापरवाही बरती गई जो सामने आई। न्यायालय ने ठहराया की विधवा व उसके मासूम बच्चों को 6 लाख रुपए मुआवजा मिलना चाहिए साथ ही उपयुक्त नियमों के अनुसार उसके परिवार व बच्चों को विशेष भत्ता भी दिया जाना चाहिए।

6, नीलावती मेहरा बनाम उड़ीसा राज्य सरकार( 1993(2) SCC  746) के मामले में उस व्यक्ति की मां द्वारा शिकायत दर्ज की गई जिसे गिरफ्तार करने के पश्चात यातना दी गई और पुलिस के हाथों उसकी मौत हो गई। मृतक का स्वर्ग रेल की पटरी पर पाया गया। उस समय उसे हथकड़ी लगी हुई थी। पुलिस ने बचाव में कहा कि अभियुक्त पुलिस की हिरासत से रसियां तोड़ भाग निकलने में कामयाब हो गया परंतु रेल के नीचे आकर उसकी मौत हो गई । मृतक की मां ने उत्तम न्यायालय को एक पत्र लिखते हुए शिकायत की उसके बेटे की पुलिस हिरासत में मौत हुई है और इसके लिए उसे अनुच्छेद 21 के तहत मुआवजा प्रदान किया जाए। न्यायालय ने इस रिट याचिका मान उड़ीसा राज्य सरकार, पुलिस उपायुक्त तथा कांस्टेबल को प्रतिवादी बना उसने जवाब देने को कहा । उस डॉक्टर के बयान वह सबूत के आधार पर जिसमें शव का पोस्टमार्टम किया और फॉरेंनसिक साइंस लैबोरेट्री की रिपोर्ट के आधार पर न्यायालय ने इस तथ्य की पुष्टि की मृतक की मृत्यु पुलिस की हिरासत में हुई थी।| मृतक की आयु व उसके वेतन के ध्यान में रखते हुए राज्य को 1,50,000/- रुपए मुआवजा मृतक की मां को देने को कहा गया । राज्य को यह भी कहा गया कि वह उच्चतम न्यायालय की विधिक सहायता समिति को 10 , 000/- रुपया खर्च के लिए दें । न्यायालय ने यह भी कहा कि इस मामले में दिया गया मुआवजे का प्रभाव वादी को अन्य कार्यवाही में मुआवजे के अधिकार से वंचित नहीं करता ।

7, अरविंदर एम.बग्गा बनाम यू. पी. राज्य सरकार( 1994(4) SCC602) के मामले में पुलिस ने एक विवाहित महिला को इस बात पर हिरासत में लिया कि वह बलात्कार के मामले में पीड़िता  है । उसे डरा धमका कर अपने पति तथा ससुराल वालों को झूठ अपराहन वह जबरदस्ती विवाह के मामले में फंसाने के लिए कहा गया । पुलिस अधिकारी ने उस शारीरिक तथा मानसिक यातना देकर अपने अवैध विवाह को झूठा बनाने पुलिस के समक्ष जीतने के लिए विवश किया । न्यायालय ने राज्य से पुलिस के अत्याचार से पीड़ित महिला को 10,००० रुपए मुआवजा देने को कहा।

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