Maneka Gandhi Case | मेनका गांधी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया

श्रीमती मेनका गांधी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया
भूमिका-
यह प्रकरण संविधान के अनुच्छेद 14, 15(1)(क) तथा 21 और पासपोर्ट अधिनियम 1967 की धारा 10 (3) (ग)  से संबंधित है इसमें उच्चतम न्यायालय के समक्ष अनेक विचारणीय बिंदु थे जैसे-
1. क्या विदेश भ्रमण का अधिकार मूल अधिकार है?
2. क्या सुनवाई का अवसर दिए बिना किसी पासपोर्ट को  परी बद्ध किया जा सकता है?
3. क्या पासपोर्ट को परीबद्ध किया जाना अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है?
4. क्या पासपोर्ट अधिनियम 1967 की धारा 10 (3) ग के उपबंध संविधान के अनुच्छेद 19 (1)(क)एवं (छ) का उल्लंघन करते हैं।
तथ्य
श्रीमती मेनका गांधी को विदेश भ्रमण हेतु पासपोर्ट जारी किया गया था 1 जून 1976 के इस पासपोर्ट को 2 जुलाई 1977 के आदेश द्वारा जप्त कर दिया गया था यह पासपोर्ट लोकहित में परी बंद किया जाना बताया गया तथा जनहित में ही इसके कारण बताने से इंकार कर दिया गया इस पर श्रीमती मेनका गांधी द्वारा संविधान के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय में एक याचिका दायर की गई जिसमें पासपोर्ट परिबध किए जाने के आदेश को चुनौती दी गई थी पेटीशनर की ओर से यह कहा गया कि-
1. पासपोर्ट अधिनियम 1967 की धारा 10 (3) (ग) संविधान के अनुच्छेद 14 का स्वेच्छाचारी शक्तियां प्रदान करती है लोकहित की आड़ में कारण बताने से इनकार किया जा सकता है।
2. पासपोर्ट अधिनियम 1967 की धारा 10 (
3) (ग) संविधान के अनुच्छेद 21 का भी अतिक्रमण करती है क्योंकि इसमें जिस प्रक्रिया को अंगीकृत किया गया है वह स्वेच्छाचारी एवं   अयुक्ति युक्त है।
3. पासपोर्ट अधिनियम की धारा 10 (3) (ग) इसलिए भी असंवैधानिक एवं शून्य है क्योंकि यह सुनवाई का अवसर दिए बिना ही पासपोर्ट जप्त किए जाने का प्रावधान करती है यह व्यवस्था नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के भी  विरुद्ध है।
4. पासपोर्ट अधिनियम की धारा 10 (3) (ग)  संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (क) एवं(छ)  का भी अतिक्रमण करती है क्योंकि इसमें वर्णित प्रतिबंध संविधान के अनुच्छेद 19 (2)व19(6) की परिधि में नहीं आते हैं।
उत्तर दाता की ओर से जवाब में यह कहा गया कि-
क. विदेश भ्रमण का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19(1) (क)  की परिधि में नहीं आता है क्योंकि नागरिकों को केवल भारत में भ्रमण करने की स्वतंत्रता प्रदान की गई है न कि विदेशी भ्रमण की। 
ख.  पासपोर्ट अधिनियम के अंतर्गत देश की एकता अखंडता एवं संप्रभुता की रक्षा के लिए पासपोर्ट  प्राधिकारिओं द्वारा पासपोर्ट को जब किया जा सकता है। 
ग. पासपोर्ट जप्त किए जाने के संबंध में विधिवत जांच की जाती है एवं संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का समुचित अवसर दिया जाता है। 
निर्णय
इस प्रकरण की सुनवाई उच्चतम न्यायालय की एक संविधान पीठ द्वारा की गई तथा न्यायालय की ओर से निर्णय न्यायमूर्ति एम. एच. बेग  द्वारा उद् घोषित किया गया। 
उच्चतम न्यायालय द्वारा संविधान के अनुच्छेद 14, 19, (1)(क)व (छ)  तथा 21   एवं पासपोर्ट अधिनियम 1967 की धारा 10(3)(ग)  की व्याख्या की गई न्यायालय ने यह स्वीकार किया की संविधान के अनुच्छेद 19 के अंतर्गत नागरिकों को-
1. वाक एवं अभिव्यक्ति
2. व्यापार के लिए विदेशी भ्रमण
3. प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता
का मूल अधिकार प्रदान किया गया है इन अधिकारों को मनमाने तौर पर न तो कम किया जा सकता है और नहीं छीना जा सकता है अधिकारों को प्रभावित करने वाली प्रक्रिया भी अयुक्तियुक्त एवं मनमानी नहीं हो सकती है फिर अनुच्छेद 14 के अंतर्गत नागरिकों को विधियों का समान संरक्षण भी प्राप्त है
नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को सुनवाई का समुचित अवसर प्रदान किया जाना भी जरूरी है सुनवाई का अवसर दिए बिना किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध कोई आदेश पारित नहीं किया जा सकता है। 
न्यायालय ने यह भी पाया कि पासपोर्ट जप्त करने वाले का भी उल्लेख किया जाना चाहिए अनुच्छेद 19(1) (क)  के अंतर्गत वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की कोई  भौगोलिक सीमा नहीं है इसका प्रयोग विदेश में भी किया जा सकता है बशर्ते कि वहां इस पर कोई प्रतिबंध नहीं हो। 
उपरोक्त विवेचन के बाद भी उच्चतम न्यायालय द्वारा इस याचिका में कोई निर्णय नहीं दिया गया क्योंकि भारत के महान्यायवादी दवारा इस आशय का शपथ पत्र प्रस्तुत किया गया था इस मामले में-
1. समुचित जांच की जाएगी
2. पेटीशनर  को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर प्रदान किया जाएगा। 
विधि के सिद्धांत
इस प्रकरण में उच्चतम न्यायालय द्वारा विधि के निम्नांकित सिद्धांत प्रतिपादित किए गए-
1. संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत विधि द्वारा विहित प्रक्रिया का उचित न्याय सम्मत एवं युक्ति युक्त होना जरूरी है। 
2. कार्यपालिका अर्थात केंद्र सरकार द्वारा लोकहित में किसी पासपोर्ट को परिबद्ध किया जा सकता है। 
3. प्रभावित व्यक्ति को सुनवाई का अवसर प्रदान किया जाना नैसर्गिक न्याय केसिद्धांतों की अपेक्षा है। 
4. विदेश भ्रमण का अधिकार मूल अधिकारों की परिधि में नहीं आता है।

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