गरीकपति वीरवा बनाम एन. सुमिया चौधरी

गरीकपति वीरवा बनाम एन. सुमिया चौधरी
भूमिका
यह प्रकरण सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 की धारा 96, 109 एवं 110 से संबंधित है इसमें संविधान का अनुच्छेद 133, 135, 136 एवं 395 भी अंतर वलित है इस प्रकरण में उच्चतम न्यायालय के समक्ष मुख्य विचारणीय बिंदु अपील के अधिकार की व्याख्या का था।
तथ्य
प्रत्यर्थी एन. सुमिया चौधरी ने अन्य व्यक्तियों के साथ मिलकर 22. 4. 1949 को अधीनस्थ न्यायालय में एक वाद दायर किया जो 14. 11. 1950 को खारिज कर दिया गया उक्त निर्णय के विरुद्ध वादी प्रत्यय अर्थी द्वारा उच्च न्यायालय में अपील की गई जो 4. 3.1955 को स्वीकार कर ली गई तथा वादी-प्रत्यर्थी का वाद डिक्री कर दिया गया इस पर प्रतिवादी अपील आर्थी द्वारा उच्चतम न्यायालय में अपील करने की अनुमति चाही गई लेकिन वह इस कारण नहीं दी गई क्योंकि वादग्रस्त संपत्ति का मूल्य केवल 11400 रुपए ही था जबकि अपील के लिए कम से कम ₹20000 की संपत्ति होना जरूरी था प्रतिवादी अपीलार्थी ने उच्चतम न्यायालय से विशेष इजाजत मांगी। 
उच्चतम न्यायालय के समक्ष अपील आरती की ओर से यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि-
क.  अपील करने का अधिकार एक विशेष अधिकार है जिसे विधि द्वारा ही समाप्त किया जा सकता है अन्यथा नहीं,
ख.  वादी द्वारा 22. 4. 1949 को अधीनस्थ न्यायालय में वाद प्रस्तुत किया गया था उसी दिन प्रार्थी- अपीलार्थी को उच्च न्यायालय में प्रथम अपील तथा फेडरल कोर्ट में द्वितीय अपील करने का अधिकार मिल गया था क्योंकि संपत्ति का मूल्य ₹10000 से अधिक था उच्चतम न्यायालय चूंकि फेडरल कोर्ट का उत्तराधिकारी है इसलिए उसे उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध अपील करने का अधिकार है सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 की धारा 109 व110 में भी इसी प्रकार की व्यवस्था की गई है।
उत्तर में प्रत्यर्थी द्वारा यह कहा गया कि-
1. संविधान एवं सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के प्रावधानों के अनुसार उच्चतम न्यायालय में अपील के लिए संपत्ति का कम से कम ₹20000 के मूल्य की होना आवश्यक है इस मामले में चूंकि संपत्ति का मूल्य 11, 400 रुपए है इसलिए उच्चतम न्यायालय में अपील नहीं की जा सकती है।
2. प्रार्थी द्वारा जिन आधारों पर अपील की इजाजत की प्रार्थना की गई है वह आधार अब संविधान में उपलब्ध नहीं है अर्थात उन्हें समाप्त कर दिया गया है।
निर्णय
उच्चतम न्यायालय द्वारा दोनों पक्षों के तर्कों पर गंभीरता से  विचार किया गया तथा न्यायमूर्ति एस आर दास द्वारा निर्णय सुनाया गया। उच्चतम न्यायालय द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया कि-
अपील करने का अधिकार प्रक्रिया का अंग नहीं होकर एक विशेष अधिकार है इसे एक निहित अधिकार भी कहा जा सकता है इसका उद्भव उसी दिन हो जाता है जिस दिन वाद पेश किया जाता है वाद के अंतिम निर्णय तक यह अधिकार बना रहता है इस अधिकार को केवल किसी विधि द्वारा स्पष्ट प्रावधान करके ही समाप्त किया जा सकता है, अन्यथा नहीं।
इस मामले में 22. 4. 1949 को जब वाद दायर किया गया था तभी पक्षकारों को अपील करने का अधिकार मिल गया था वाद का मूल्यांकन ₹10000 से अधिक होने पर फेडरल कोर्ट में अपील की जा सकती थी कालांतर में भारत का नया संविधान लागू होने पर फेडरल कोर्ट का भारत पर प्रभाव समाप्त हो गया अर्थात उसकी अधिकारिता नहीं रह गई आगे चलकर सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 की धारा 109 व 110 में भी संशोधन हो गया तथा अब उच्चतम न्यायालय में अपील के लिए संपत्ति का मूल्य ₹10000 से बढ़ाकर ₹20000 कर दिया गया लेकिन जो अधिकार संविधान से पूर्व निहित हो गए थे वह यथावत बने रहे अभिप्राय यह हुआ कि प्रार्थी में अपील का अधिकार सन 1949 में ही निहित हो गया था जिसे समाप्त नहीं किया जा सकता है।
संविधान का अनुच्छेद 133 भी निहित अधिकारों को समाप्त नहीं करता है संविधान के अनुच्छेद 135 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय में वे सारी शक्तियां निहित  की गई जो फेडरल कोर्ट की थी इस प्रकार प्रार्थी का उच्चतम न्यायालय में अपील करने का अधिकार निहित है यदि उसे इस अधिकार से गलत तरीके से वंचित कर दिया गया है तो संविधान के अनुच्छेद 136 के अंतर्गत विशेष इजाजत देकर सुधारा जा सकता है।
  परिणाम स्वरूप उच्चतम न्यायालय द्वारा अपीलार्थी प्रार्थी को अपील करने की विशेष इजाजत प्रदान की गई है।
विधि के सिद्धांत
इस प्रकरण में उच्चतम न्यायालय द्वारा विधि के निम्नांकित सिद्धांत प्रतिपादित किए गए-
1. अपील करने का अधिकार प्रक्रिया का अंग नहीं होकर एक विशेष अधिकार है।
2.  अपील करने का अधिकार एक निहित अधिकार है जिसका उद्भव उसी दिन हो जाता है जिस दिन वाद दायर किया जाता है।
3. अपील के इस अधिकार को किसी विधि के स्पष्ट प्रावधानों द्वारा ही समाप्त किया जा सकता है अन्यथा नहीं।
4. जहां ऐसा कोई अधिकार संविधान के लागू होने से पहले ही निहित हो गया हो वहां संविधान ऐसे अधिकार को संरक्षण प्रदान करता है।

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