Lalman Shukla Case | लालमन शुक्ल बनाम गौरी दत्त

 लालमन शुक्ल बनाम गौरी दत्त
भूमिका
यह वाद भारतीय संविदा अधिनियम 18 सो 72 की धारा 4 से संबंधित है।   इस वाद मैं न्यायालय के समक्ष मुख्य विचारणीय प्रश्न यह था कि किसी सार्वजनिक प्रस्ताव की संस्कृत एवं संस्कृति किशन सूचना कब पूर्ण मानी जाती है।
तथ्य
इस बाद में वादी लालमन शुक्ल प्रतिवादी गौरी दत्त की फिल्म में मुनीम के पद पर कार्यरत था 1 दिन प्रतिवादी गौरीदत्त का भतीजा घर से गायब हो गया और काफी तलाश करने के बाद भी उसका पता नहीं चला इस पर प्रतिवादी ने अपने मुनीम वादी लालमन शुक्ल को अपने भतीजे की तलाश के लिए जनवरी सन 1912 में विभिन्न स्थानों पर भेजा गया कालांतर में प्रतिवादी गौरी दत्त ने एक सार्वजनिक घोषणा करते हुए कुछ सूचनाएं इससे की प्रकाशित करवाई कि जो कोई व्यक्ति मेरे भतीजे को खोज कर लाएगा उसे ₹501 पुरस्कार स्वरूप प्रदान किए जाएंगे वादी लालमन शुक्ल प्रतिवादी गौरीदत्त के भतीजे को खोजने के लिए हरिद्वार ऋषिकेश भी गया था गौरीदत्त द्वारा प्रकाशित सूचना लालमन शुक्ल को हरिद्वार ऋषिकेश में वितरण के लिए  भिजवाई गई जिससे वाडीलाल मन को भी इस घोषणा की जानकारी हो गई अंततः लाल मने गौरीदत्त के भतीजे को ऋषिकेश में ढूंढ निकाला और तार द्वारा इस आशय की सूचना गौरीदत्त को दे दी सूचना मिलने पर गौरीदत्त स्वयं ऋषिकेश पहुंचा और वहां से अपने भतीजे को घर ले आया इस कार्य के लिए प्रतिवादी गौरीदत्त नी वादी लालमन शुक्ल को कुछ पुरस्कार भी दिया उस समय अवधि ने और किसी पुरस्कार अथवा राशि की मांग नहीं की इस सारी घटना के बाद वादी छह माह तक प्रतिवादी की फर्म पर नौकरी करता रहा 6 मा भाग प्रतिवादी द्वारा वादी को नौकरी से निकाल दिया गया तत्पश्चात वादी ने प्रतिवादी के विरुद्ध पुरस्कार राशि ₹501 की वसूली के लिए वाद है क्या विचार न्यायालय द्वारा बाद खारिज कर दिया गया परिवादी द्वारा विचारण न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अपील की गई।
निर्णय
वादी की ओर से निम्नांकित तरफ प्रस्तुत किए गए थे।
क  यह कि प्रतिवादी द्वारा की गई घोषणा एवं प्रकाशित सूचना के आधार पर वादी एवं प्रतिवादी के बीच संविदा का गठन हो गया था।
ख. यह कि उक्त संविदा के अंतर्गत वादी प्रतिवादी से ₹501 पुरस्कार के प्राप्त करने का हकदार है क्योंकि उसके द्वारा प्रतिवादी के भतीजे को खोज लिया गया था।
प्रतिवादी की ओर से उत्तर में निम्नांकित तरफ प्रस्तुत किए गए।
क . पुरस्कार की सूचना वादी के प्रतिवादी के भतीजे को खोजने हेतु रवाना हो जाने के बाद प्रकाशित की गई थी
ख. यह सूचना वादी तक पहुंची इससे पहले ही वादी द्वारा प्रतिवादी के भतीजे को खोज लिया गया था इस प्रकार प्रतिवादी का यह प्रस्ताव वादी के ज्ञान में भतीजे को खोज निकालने के बाद आया था
ग. झुमकी प्रस्ताव की वादी को सन सूचना कार्य पूरा हो जाने के बाद हुई थी इसलिए दोनों के बीच संविदा का निर्माण नहीं हुआ था इसलिए वादी तथाकथित पुरस्कार की राशि प्राप्त करने का हकदार नहीं है।
न्यायालय द्वारा दोनों पक्षों के तर्कों पर गंभीरता से विचार किया गया न्यायालय द्वारा यह अभी निर्धारित किया गया कि वादी एवं प्रतिवादी के बीच किसी प्रकार की संविदा का गठन नहीं हुआ था क्योंकि प्रतिवादी के पुरस्कार के प्रस्ताव का ज्ञान वादी को प्रतिवादी के भतीजे को खोज लेने के बाद हुआ था प्रस्ताव की वादी को जानकारी होने से पहले ही वंचित कार्य पूरा हो चुका था यदि वादी को प्रतिवादी के भतीजे को खोज लेने से पहले उक्त प्रस्ताव का ज्ञान हो जाता और ऐसे ज्ञान हो जाने के बाद प्रतिवादी के भतीजे को खोजा जाता तो वह निश्चित ही पुरस्कार पाने का हकदार हो सकता था लेकिन चूंकि ऐसा नहीं हुआ है इसलिए वादी एवं प्रतिवादी के बीच संविदा का गठन होना नहीं माना जा सकता।
   इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा तदनुसार वादी की अपील को सव्यय खारिज कर दिया गया।
विधि के सिद्धांत
(क.) इस मामले में विधि के निम्नांकित सिद्धांत प्रतिपादित किए गए हैं
(ख.) संविदा के गठन के लिए प्रस्ताव एवं स्वीकृति का होना जरूरी है
(ग.) स्वीकृति प्रस्ताव का ज्ञान होने के बाद ही दी जानी आवश्यक है
(घ.) यदि प्रस्ताव का ज्ञान होने से पहले ही प्रस्तावित कार्य पूर्ण हो जाता है तो उसके बाद की गई स्वीकृति का कोई अर्थ नहीं रह जाता है
(ड.) प्रस्ताव व्यक्तिक अथवा सार्वजनिक हो सकता है
स्वीकृति के लिए किसी उद्देश्य का होना आवश्यक नहीं है आवश्यक है प्रस्ताव का ज्ञान होना।

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