Satwant Singh Vs State of Punjab | Supreme Court Case

सतवंत सिंह- अपील कर्ता
बनाम पंजाब सरकार - उत्तर दाता
भूमिका
यह प्रकरण दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 188और197 से संबंधित है।
तथ्य
   सन 1942 में बर्मा राज्य द्वारा  जापानियों पर आक्रमण करने के फल स्वरुप बर्मा सरकार तथा सहायक शक्ति जापानियों को छोड़ने के लिए बाध्य करने लगे बर्मा का परित्याग के सिलसिले में बर्मा सरकार को कुछ काम करना पड़ा जैसे कि सड़के बनवाना,  पुल मजबूत कराना रेल लाइन हटाकर मोटर के लिए सड़के बनाना इसमें कुछ काम फौजियों द्वारा किया गया बाकी काम ठेकेदारों को सौंप दिया गया।
बर्मा का परित्याग के बाद सरकार शिमला में आ गई 1942 में बर्मा सरकार ने विज्ञापन दिया जिसके अनुसार जिन्होंने काम किया था या माल दिया था लेकिन पैसा अदा नहीं किया गया था उनके क्लेम मांगने को कहा गया था सतवंत सिंह ठेकेदार ने पहले करीब ₹18000 का क्लेम मांगा बाद में उसने कई लाख रुपए का क्लेम मांगा यह क्लेम मेजर हेंडरसन अधिकार प्राप्त अधिकारी झांसी को प्रमाणीकरण करने के लिए सरकार ने भेज दिया इस अफसर ने सारे क्लेम मंजूर किए लेकिन एक नहीं किया,  इसके लिए उसका कहना था कि यह क्लेम उसके ज्ञान में नहीं है इसलिए दूसरे अफसर के यहां मंजूर होने के लिए भेज दिया गया प्रमाणीकरण के बाद कंट्रोल  मिलिट्री  क्लेमस कोल्हापुर द्वारा पैसा दिया जाने लगा सतवंत सिंह की प्रार्थना पर इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया लाहौर का चेक मिल गया जिसका भुगतान भी हो गया सतवंत सिंह के कुल रकम मिलाकर 7, 44, 865, 12 - 0 क्लेम में मिले।
थोड़े समय बाद बर्मा सरकार को शक हुआ की कुछ कल एक फर्जी हैं जिसमें सतवंत सिंह अपील कर्ता का भी क्लेम शामिल है
पुलिस द्वारा इस मामले की छानबीन हुई और यह पाया गया कि सतवंत सिंह के कई क्लेम फर्जी थे इसलिए सतवंत सिंह अपील कर्ता को अंबाला से गिरफ्तार कर लिया गया सतवंत सिंह ने एक क्लेम अपनी पत्नी सुरजीत कौर के नाम भेजा था इसलिए उसकी पत्नी सुरजीत कौर को भी गिरफ्तार कर लिया गया हेंडरसन को इंफाल में गिरफ्तार करके जांच के लिए लाहौर लाया गया।
अभियोजन के अनुसार सतवंत सिंह ने धोखा दिया जोकि भारतीय दंड विधान की धारा 420 के अंतर्गत अपराधी है हेंडरसन ने बहका कर झूठा क्लेम मंजूर किया जिसे वह जानता था की यह झूठा तथा फर्जी है इसलिए यह भारतीय दंड विधान की धारा 420 /109 के अंतर्गत सजा पाने के लिए जिम्मेदार है।
9 मई 1944 को सतवंत सिंह ने जुर्म मंजूर किया अपराध न्यास भंग व रिश्वत देने के सतवंत सिंह के केस की तरह कई केस थे इसलिए भारत गवर्नर जनरल ने ऑर्डिनेंस द्वारा प्रस्थापित किए जिसके अनुसार इस तरह के केसों की न्यायिक जांच होनी थी उपरोक्त ऑर्डिनेंस नंबर 12 सन 45 के द्वारा इसमें संशोधन किया गया जिसके अनुसार सतवंत सिंह के केस की हेंडरसन के साथ तृतीय विशेष न्यायाधिकरण के द्वारा जांच होनी थी हेंडरसन इंग्लैंड भाग गया बाद में वह लाया गया तथा हेंडरसन के केस की कार्यवाही अपील कर्ता के खिलाफ किसके साथ होने लगी हेंडरसन के खिलाफ केस में काफी गवाहों के बयान होने   थे कुछ गवाहों के बयान कमिश्नर के द्वारा भी होने थे इसलिए उसके केस में निश्चय ही देर लगती इस वजह से सतवंत सिंह ने दरखास्त देकर अपना केस अलग करा लिया और उसके खिलाफ मुकदमे की कार्यवाही प्रारंभ हो गई।
विशेष न्यायाधिकरण- न्यायालय में अर्थदंड में सजा का हुक्म किया गया।
प्रथम अपील- सतवंत सिंह ने उच्च न्यायालय में अपील प्रस्तुत करी इस आदेश के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील हुई उसमें जरूरी अर्थदंड समाप्त कर दिया एवं सजा भी कम कर दी।
वाद उच्चतम न्यायालय में- सरकार ने उच्चतम न्यायालय में अर्थदंड बढ़ाने के लिए अपील की जिसमें सरकार की ओर से यह कहा गया की अर्थदंड सही वह कानूनी है अपील कर्ता ने भी अपील दायर की जिसमें यह कहा गया था कि अपील कर्ता का दोष सिद्ध गैरकानूनी है इसको निम्न कारणों से चुनौती दी गई थी-
1. दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 188 के अनुमोदन नहीं किया गया था अभियोजन के अनुसार अपराध कोल्हापुर व शिमला में किया गया था लेकिन कुछ समय बाद कोल्हापुर ब्रिटिश भारत से अलग हो गया था धारा 188 के अंतर्गत कोई प्रमाण पत्र भी नहीं लिया गया था इसलिए अपील कर्ता कि न्यायाधीश जांच क्षेत्र अधिकार से बाहर है।
2.   हेंडरसन नें अपराध शिमला में किया जबकि अपील कर्ता नहीं कोल्हापुर में किया था
3. धारा 233 से 239 के अंतर्गत एक साथ न्यायिक जांच नहीं होनी चाहिए थी।
4. धारा 197 के अंतर्गत एंडरसन के खिलाफ मुकदमा चलाने की इजाजत नहीं ली गई थी।
अपील कर्ता ने शिमला में क्लेम  दिया था झांसी से क्लेम मंजूर होने का प्रमाण पत्र मिला था लाहौर से पैसा भुगतान हुआ शिमला व झांसी की अदालत को मुकदमा तय करने का क्षेत्राधिकार था कोल्हापुर में कोई अपराध नहीं हुआ इसलिए कोल्हापुर अदालत को आरोप लगाने व मुकदमा चलाने का अधिकार नहीं है लेकिन यदि आरोप में जगह का नाम गलत लिख दिया जाए तो न्यायिक जांच समाप्त नहीं की जा सकती यह तो सिर्फ एक अनियमितता है जिस को ठीक किया जा सकता है 
धारा 197 में सर्टिफिकेट के बारे में यह कहा गया कि अपील कर्ता नें पहले इसके बारे में नहीं कहा था अपील कर्ता के अधिवक्ता की ओर से यह कहा गया था कि उच्च न्यायालय में भी इसके बारे में तर्क की गई थी लेकिन उच्च न्यायालय ने धारा 270 के सर्टिफिकेट जोकि दाखिल था उसको गलत समझा वास्तव में धारा 197 के सर्टिफिकेट की पूर्ति धारा 270 के सर्टिफिकेट द्वारा नहीं की जा सकती है।
काफी सुनवाई के बाद विद्वान जजों के मतानुसार यह धारा इस केस में लागू नहीं होती है क्योंकि हेंडरसन को छल कपट की दृष्टि से बहकाया था।  यह अपराध अधिकारिक हैसियत में नहीं किया गया था चूंकि हेंडरसन का सतवंत सिंह अपील कर्ता की न्यायिक जांच एक साथ नहीं हुई थी इस वजह से दूसरी व तीसरी तर्क कुछ वजन नहीं रखती है।
  वाद का निर्णय-   इसलिए अपील खारिज कर दी गई।
वाद के द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत
1. आरोप में गलत जगह का नाम लिख देने से न्यायिक जांच समाप्त नहीं की जा सकती है यह तो एक अनियमितता है जिसे ठीक किया जा सकता है।
2. अभियुक्त एवं उसके सहयोगी अभियुक्त की जांच जहां अपराध हुआ हो या जहां पर अपराध का परिणाम प्राप्त हुआ हो किसी भी स्थान पर की जा सकती है।
3. किसी एक अपराधी के विरुद्ध कई अपराधों के अभियोग लगाए गए हो एवं उसके सहयोगी के विरुद्ध भी कई अभियोग हो तो उन दोनों की जांच एक साथ की जा सकती है।
4. धोखाधड़ी का मामला साधारणतया कर्तव्य पालन के दौरान नहीं बनता है इसलिए मुकदमा चलाने की अनुमति की आवश्यकता नहीं होती है।

Satwant Singh Vs State of Punjab | Supreme Court Case

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