State of Uttar Pradesh Vs Shingara Singh

  स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश बनाम सिंघारा सिंह
भूमिका-
यह प्रकरण दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164, 364 एवं 533 से संबंधित है इसमें उत्तम न्यायालय के समक्ष मुख्य विचारणीय प्रश्न सन्स्वीकृति की विधि मान्यता एवं   गाहयता का था।
तथ्य
इस प्रकरण के तथ्य संक्षेप में इस प्रकार है 20 मार्च 1959 को उत्तर प्रदेश के एक नगर में राजाराम नाम के व्यक्ति की गोली से हत्या कर दी गई थी इस हत्या के लिए तीन अभियुक्त गणों सिंघारा सिंह,  वी. सिंह एवं तेगा  सिंह समेत 7 व्यक्तियों के विरुद्ध अभियोजन चलाया गया था अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश बिजनौर द्वारा सिंघाड़ा सिंह को मृत्युदंड वीर सिंह को धारा 302 सहपठितधारा 120 ख, 109 तथा 114 के अंतर्गत मृत्युदंड एवं तेगा सिंह को उक्त धाराओं के अंतर्गत आजीवन कारावास के दंड से दंडित किया गया तथा शेष अभियुक्त गणों को दोषमुक्त कर दिया गया उपरोक्त तीनों अभियुक्त गणों द्वारा इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अपील की गई उधर राज्य सरकार द्वारा भी उन व्यक्तियों के विरुद्ध अपील की गई जिन्हें दोषमुक्त कर दिया गया था उच्च न्यायालय द्वारा अपीलार्थी  गणों की अपील स्वीकार करते हुए उन्हें दोष मुक्त घोषित कर दिया गया।
   उक्त निर्णय के विरुद्ध राज्य सरकार द्वारा विशेष इजाजत से उच्चतम न्यायालय में अपील की गई।
निर्णय
उच्चतम न्यायालय के समक्ष अपीलार्थी की ओर से निम्नांकित तर्क प्रस्तुत किए गए-
1. दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के अंतर्गत लेखबद्धकी गई संस्वीकृति के कथन साक्ष्य अधिनियम की धारा 74 के अंतर्गत लोग दस्तावेज है इसलिए उसे धारा 80 के अंतर्गत साक्ष्य के अभिलेख के रूप में सत्य माना जा सकता है। 
2. दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 का मुख्य उद्देश्य है अभिलेख को बनाए रखना है ताकि साक्ष्य अधिनियम की धारा 74 एवं 80 का लाभ प्राप्त किया जा सके और जिस मजिस्ट्रेट द्वारा सन स्वीकृति के कथन लेखबद्ध किए गए हों उसे बुलाकर सिद्ध करने की असुविधाजनक स्थिति को टाला जा सके। 
' नजीर अहमद'(ए. आई. आर. 1936 पी. सी. 253 के मामले में प्रिवी कौंसिल द्वारा दिया गया निर्णय गलत था क्योंकि संहिता की धारा 164 के उपबंध मैंडेटरी नहीं है यानी आज्ञापक नहीं है। 
3. नजीर अहमद के मामले में दिए गए निर्णय के अनुसार यदि किसी प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट या विशेष रूप से सशक्त द्वितीय वर्ग मजिस्ट्रेट द्वारा धारा 164 के अंतर्गत कथन लिखे जाते हैं और ऐसे कथा लिखने में विहित प्रक्रिया का अनुपालन नहीं किया जाता है तो ऐसे मजिस्ट्रेट के मौखिक साक्ष्य द्वारा सन् स्वीकृति के कथनों को साबित नहीं किया जा सकता।
लेकिन नजीर अहमद के मामले और इस मामले में अंतर है नजीर अहमद के मामले से यह स्पष्ट नहीं होता है कि क्या संस्कृति के कथन लिखने वाले मजिस्ट्रेट का उल्लेख उक्त धारा में नहीं होने पर भी धारा 164 के कथनों को मौखिक साक्ष्य द्वारा साबित नहीं किया जा सकता है। 
उपरोक्त तर्कों का खंडन करते हुए प्रत्यरथी गण की ओर से यह तर्क प्रस्तुत किया गया की नजीर अहमद के मामले के अनुसार द्वितीय वर्ग का मजिस्ट्रेट कन्फेशन के कथनों को यानी सन स्वीकृति के कथनों को साबित करने के लिए मौखिक साक्ष्य नहीं दे सकता इसलिए उच्च न्यायालय का निर्णय सही था। 
उल्लेखनीय है कि उच्च न्यायालय द्वारा सन स्वीकृति लेखबद्ध करने वाले मजिस्ट्रेट की मौखिक साक्ष्य को रद्द कर दिया गया था उच्चतम न्यायालय द्वारा दोनों पक्षों के तर्कों पर गंभीरता से विचार किया गया निर्णय न्यायाधीश ए. के. सरकार द्वारा सुनाया गया। 
उच्चतम न्यायालय के समक्ष मुख्य विचारणीय प्रश्न कन्फेशन के कथन लिखने वाले मजिस्ट्रेट दीक्षित की  मौखिक साक्ष्य की   ग्राहयता का था इस मामले में सन स्वीकृति की कथा ऐसे मजिस्ट्रेट द्वारा लिखे गए थे जिसे ऐसे कथन  लिखने की अधिकारिता नहीं थी अभिप्राय यह हुआ कि उन कथनों का कोई अर्थ नहीं था और जब भी कथन अर्थहीन थे तो अभियुक्त गणों को दोष सिद्ध नहीं किया जा सकता था क्योंकि अभिलेख पर उनके विरुद्ध और कोई साक्षी उपलब्ध नहीं था। 
नजीर अहमद के मामले में यह अभिनिर्धारित किया गया था की यदि सन स्वीकृति के कथा लेखबद्ध करने में विहित प्रक्रिया का अनुसरण नहीं किया जाता है तो ऐसे कथनों को मौखिक साक्ष्य द्वारा साबित नहीं किया जा सकता है इस मामले में टेलर बनाम टेलर के मामले में प्रतिपादित इस सिद्धांत को उद्धृत किया गया कि- किसी कार्य को उसी रीति से संपन्न किया जाना चाहिए जो विहित की गई है उसे किसी भिन्न रीति से संपन्न नहीं किया जा सकता धारा 164 के अंतर्गत सन स्वीकृति के कथन लिखने की रीति का उल्लेख किया गया है उस रीति का अनुसरण किया जाना आवश्यक है यदि उसका अनुसरण नहीं किया जाता है तो  ऐसे कथनों को मौखिक साक्ष्य द्वारा साबित नहीं किया जा सकता यदि ऐसा करने की अनुमति दे दी जाती है तो धारा 164 एवं 364 में बरती गई सावधानियां व्यर्थ हो जाती है। 
जहां तक सन स्वीकृति के कथा द्वितीय वर्ग मजिस्ट्रेट द्वारा लिखे जाने पर उसके मौखिक साक्ष्य की ग्राहयता का प्रश्न है, जब प्रथम वर्ष के मजिस्ट्रेट द्वारा भी विहित प्रक्रिया का अनुसरण नहीं किए जाने पर उसकी मौखिक साक्ष्य को  ग्राह्य नहीं किया जा सकता है तो फिर द्वितीय व्रत की मजिस्ट्रेट द्वारा ऐसा किए जाने पर उसकी मौखिक साक्ष्य को ग्राह्य करने का प्रश्न ही नहीं उठता है ऐसी स्थिति में इस प्रकरण में मजिस्ट्रेट दीक्षित द्वारा संस्विकृति को साबित करने हेतु दी गई मौखिक साक्ष्य को नकारते हुए उच्चतम न्यायालय द्वारा अपील आर्थी की अपील को खारिज कर दिया गया। 
विधि के सिद्धांत
इस प्रकरण में उच्चतम न्यायालय द्वारा विधि के निम्नांकित सिद्धांत प्रतिपादित किए गए हैं-
1. जहां किसी मजिस्ट्रेट को संस्वीकृति के कथन लिखने की अधिकारिता नहीं हो वहां उसके द्वारा लेख बद्ध की गई संस्वीकृति अर्थहीन होगी और उसे साक्ष्य अधिनियम की धारा 74 एवं 80 के अंतर्गत साबित नहीं किया जा सकेगा। 
2. दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के उपबंध आज्ञा पक यानी मैंडेटरी है उनका पालन किया जाना अनिवार्य है। 
3. जब प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट को ही सन स्वीकृति के कथनों को मौखिक साक्ष्य द्वारा साबित किए जाने से निवारित किया गया है तो फिर द्वितीय औरत मजिस्ट्रेट को तो ऐसी अनुमति दिए जाने का प्रश्न ही नहीं उठता है।

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