Section 142 The Trade Marks Act, 1999

  

Section 142 The Trade Marks Act, 1999: 

Groundless threats of legal proceedings.—

(1) Where a person, by means of circulars, advertisements or otherwise, threatens a person with an action or proceeding for infringement of a trade mark which is registered, or alleged by the first-mentioned person to be registered, or with some other like proceeding, a person aggrieved may, whether the person making the threats is or is not the registered proprietor or the registered user of the trade mark, bring a suit against the first-mentioned person and may obtain a declaration to the effect that the threats are unjustifiable, and an injunction against the continuance of the threats and may recover such damages (if any) as he has sustained, unless the first-mentioned person satisfies the court that the trade mark is registered and that the acts in respect of which the proceedings were threatened, constitute, or, if done, would constitute, an infringement of the trade mark.

(2) The last preceding sub-section does not apply if the registered proprietor of the trade mark, or a registered user acting in pursuance of sub-section (1) of section 52 with due diligence commences and prosecutes an action against the person threatened for infringement of the trade mark.

(3) Nothing in this section shall render a legal practitioner or a registered trade marks agent liable to an action under this section in respect of an act done by him in his professional capacity on behalf of a client.

(4) A suit under sub-section (1) shall not be instituted in any court inferior to a District Court.



Supreme Court of India Important Judgments And Leading Case Law Related to Section 142 The Trade Marks Act, 1999: 

Ahilya Vedaant Education Welfare  vs K. Vedaant Education Society on 30 January, 2018

Madhya Pradesh High Court 

The Chartered Institute Of  vs Institute Of Chartered Tax on 22 August, 2019

Delhi High Court 

Vinod K.Sharma.J vs "15. One More Argument That Was  on 6 January, 2011

Madras High Court 

The International Association Of  vs The Association Of Lions India And  on 13 June, 2007

Bombay High Court 

M/S Shree Gokul Oil Mill vs A Luxury Litigation On The Part Of A  on 17 June, 2014

Gujarat High Court 

M/S Dharti Soap Factory vs Unknown on 8 August, 2016

Gujarat High Court 

Smt. Asha Khanna And Another vs Pran Nath Khanna And Another on 19 January, 2009

Punjab-Haryana High Court 

Research In Motion Limited vs Data Infosys Limited on 12 January, 2012

Delhi High Court 

H&M; Hennes & Mauritz Ab & Anr vs Hm Megabrands Pvt. Ltd. & Ors on 31 May, 2018

Delhi High Court 

The International Association Of vs The Association Of Lions India on 11 August, 2008

Bombay High Court 


व्यापार चिह्न अधिनियम, 1999 की धारा 142 का विवरण : 

विधिक कार्यवाहियों की निराधार धमकियां-(1) जहां कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति को ऐसे व्यापार चिह्न के अतिलंघन के लिए जो रजिस्ट्रीकृत है या जिसका रजिस्ट्रीकृत होना प्रथम उल्लिखित व्यक्ति द्वारा अभिकथित है, कोई कार्रवाई या कार्यवाही करने की या इस प्रकार की किसी अन्य कार्यवाही करने की धमकी परिपत्रों, विज्ञापनों के माध्यम से या अन्यथा देता है, वहां व्यथित व्यक्ति, चाहे धमकी देने वाला व्यक्ति उस व्यापार चिह्न का रजिस्ट्रीकृत स्वत्वधारी या रजिस्ट्रीकृत उपयोक्ता हो या न हो, प्रथम उल्लिखित व्यक्ति के विरुद्ध वाद ला सकेगा और इस प्रभाव की घोषणा अभिप्राप्त कर सकेगा कि धमकियां न्यायोचित नहीं हैं, और धमकियों के जारी रहने के विरुद्ध व्यादेश प्राप्त कर सकेगा और ऐसी नुकसानी (यदि कोई हो) वसूल कर सकेगा, जो उसने उठाई हैं । जब तक प्रथम उल्लिखित व्यक्ति न्यायालय का यह समाधान न कर दे कि व्यापार चिह्न रजिस्ट्रीकृत है और जिन कार्यों की बाबत कार्यवाहियां चलाने की धमकी दी गई थी उनसे व्यापार चिह्न का अतिलंघन हो जाता है या यदि वे किए जाएंगे तो हो जाएगा ।

(2) अंतिम पूर्वगामी धारा उस दशा में लागू नहीं होती है यदि व्यापार चिह्न का रजिस्ट्रीकृत स्वत्वधारी या धारा 52 की उपधारा (1) के अनुसरण में कार्य करने वाला रजिस्ट्रीकृत उपयोक्ता सम्यक् उद्यम से उस व्यक्ति के विरुद्ध, जिसको व्यापार चिह्न के अतिलंघन की धमकी दी गई है, कार्यवाही प्रारंभ करता है और चलाता है ।

(3) इस धारा की कोई बात किसी विधि-व्यवसायी को या रजिस्ट्रीकृत व्यापार चिह्न अभिकर्ता को उसके द्वारा उसकी व्यवसायिक हैसियत में मुवक्िकल की ओर से किए गए किसी कार्य की बाबत इस धारा के अधीन कार्रवाई के लिए दायी नहीं बनाएगी ।


(4) उपधारा (1) के अधीन कोई वाद जिला न्यायालय से अवर किसी न्यायालय में संस्थित नहीं किया जाएगा ।



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