Section 43 Arbitration and Conciliation Act, 1996

 


Section 43  Arbitration and Conciliation Act, 1996: 


Limitations.—

(1) The Limitation Act, 1963 (36 of 1963), shall apply to arbitrations as it applies to proceedings in Court.

(2) For the purposes of this section and the Limitation Act, 1963 (36 of 1963), an arbitration shall be deemed to have commenced on the date referred in section 21.

(3) Where an arbitration agreement to submit future disputes to arbitration provides that any claim to which the agreement applies shall be barred unless some step to commence arbitral proceedings is taken within a time fixed by the agreement, and a dispute arises to which the agreement applies, the Court, if it is of opinion that in the circumstances of the case undue hardship would otherwise be caused, and notwithstanding that the time so fixed has expired, may on such terms, if any, as the justice of the case may require, extend the time for such period as it thinks proper.

(4) Where the Court orders that an arbitral award be set aside, the period between the commencement of the arbitration and the date of the order of the Court shall be excluded in computing the time prescribed by the Limitation Act, 1963 (36 of 1963), for the commencement of the proceedings (including arbitration) with respect to the dispute so submitted.



Supreme Court of India Important Judgments And Leading Case Law Related to Section 43  Arbitration and Conciliation Act, 1996: 

M/S. Silpi Industries vs Kerala State Road Transport  on 29 June, 2021

Secur Industries Ltd vs M/S Godrej & Boyce Mfg. Co. Ltd. & on 26 February, 2004





माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 43 का विवरण : 

परिसीमाएं-(1) परिसीमा अधिनियम, 1963 (1963 का 36) माध्यस्थमों को वैसे ही लागू होगा जैसे वह न्यायालय में की कार्यवाहियों को लागू होता है ।

(2) इस धारा और परिसीमा अधिनियम, 1963 (1963 का 36) के प्रयोजनों के लिए, कोई माध्यस्थम् धारा 21 में निर्दिष्ट तारीख को प्रारम्भ हुआ समझा जाएगा ।

(3) जहां भावी विवादों को माध्यस्थम् के लिए निवेदित करने के किसी माध्यस्थम् करार में यह उपबंध किया गया है कि जब तक कि करार द्वारा नियत किए गए समय के भीतर माध्यस्थम् कार्यवाही प्रारम्भ करने के लिए कदम न उठाया जाए, कोई ऐसा दावा, जिसको करार लागू होता है, वर्जित होगा और कोई ऐसा विवाद पैदा होता है, जिसको यह करार लागू होता है, वहां न्यायालय, यदि उसकी राय है कि मामले की परिस्थितियों में अन्यथा असम्यक् कठिनाई होगी और इस बात के होते हुए भी कि इस प्रकार नियत किया गया समय समाप्त हो गया है, ऐसे निबंधनों पर, यदि कोई हो, जो मामले में न्याय के लिए अपेक्षित हो, समय को इतनी कालावधि के लिए विस्तारित कर सकेगा जितनी वह उचित समझे ।

(4) जहां न्यायालय आदेश दे कि माध्यस्थम् पंचाट अपास्त कर दिया जाए, वहां इस प्रकार निवेदित किए गए विवाद के बारे में कार्यवाही के (जिसके अन्तर्गत माध्यस्थम् भी है) प्रारम्भ के लिए परिसीमा अधिनियम, 1963 (1963 का 36) द्वारा विहित समय की संगणना करने में माध्यस्थम् के प्रारम्भ और न्यायालय के आदेश की तारीख के बीच की कालावधि अपवर्जित कर दी जाएगी ।




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