Section 34 Arbitration and Conciliation Act, 1996


Section 34  Arbitration and Conciliation Act, 1996: 

Application for setting aside arbitral award. —

(1) Recourse to a Court against an arbitral award may be made only by an application for setting aside such award in accordance with sub-section (2) and sub-section (3).

(2) An arbitral award may be set aside by the Court only if—

(a) the party making the application furnishes proof that—

(i) a party was under some incapacity, or

(ii) the arbitration agreement is not valid under the law to which the parties have subjected it or, failing any indication thereon, under the law for the time being in force; or

(iii) the party making the application was not given proper notice of the appointment of an arbitrator or of the arbitral proceedings or was otherwise unable to present his case; or

(iv) the arbitral award deals with a dispute not contemplated by or not falling within the terms of the submission to arbitration, or it contains decisions on matters beyond the scope of the submission to arbitration:

Provided that, if the decisions on matters submitted to arbitration can be separated from those not so submitted, only that part of the arbitral award which contains decisions on matters not submitted to arbitration may be set aside; or

(v) the composition of the arbitral tribunal or the arbitral procedure was not in accordance with the agreement of the parties, unless such agreement was in conflict with a provision of this Part from which the parties cannot derogate, or, failing such agreement, was not in accordance with this Part; or

(b) the Court finds that—

(i) the subject-matter of the dispute is not capable of settlement by arbitration under the law for the time being in force, or

(ii) the arbitral award is in conflict with the public policy of India.

Explanation. —Without prejudice to the generality of sub-clause (ii) it is hereby declared, for the avoidance of any doubt, that an award is in conflict with the public policy of India if the making of the award was induced or affected by fraud or corruption or was in violation of section 75 or section 81.

(3) An application for setting aside may not be made after three months have elapsed from the date on which the party making that application had received the arbitral award or, if a request had been made under section 33, from the date on which that request had been disposed of by the arbitral tribunal: Provided that if the Court is satisfied that the applicant was prevented by sufficient cause from making the application within the said period of three months it may entertain the application within a further period of thirty days, but not thereafter.

(4) On receipt of an application under sub-section (1), the Court may, where it is appropriate and it is so requested by a party, adjourn the proceedings for a period of time determined by it in order to give the arbitral tribunal an opportunity to resume the arbitral proceedings or to take such other action as in the opinion of arbitral tribunal will eliminate the grounds for setting aside the arbitral award.



Supreme Court of India Important Judgments And Leading Case Law Related to Section 34  Arbitration and Conciliation Act, 1996: 

Global Aviation Services Pvt. Ltd vs Airport Authority Of India on 21 February, 2018

Bombay High Court

Mumbai Metropolitan Region vs M/S Patel Engineering Ltd on 21 February, 2018

Bombay High Court 

Vijay Shree Pal Sharma vs M/S. L And T Finance Ltd on 21 February, 2018

Bombay High Court 

Vijay Shree Pal Sharma vs M/S L And T Finance Ltd on 21 February, 2018

Bombay High Court

Smc Global Securities Ltd vs Iqbal Hussain Bhati on 21 February, 2018

Bombay High Court 

Union Of India Through Controller  vs Union Roadways Corporation on 21 February, 2018

Bombay High Court 

Haresh N. Awatramani And Anr vs The Saraswat Co-Opertaive Bank  on 21 February, 2018

Bombay High Court 

Mirc Electronic Limited vs M/S. Power Plaza on 21 February, 2018

Bombay High Court 

Jm Financial Services Ltd vs Gouri Arvind Kapoor on 21 February, 2018

Bombay High Court 

Bharat Sanchar Nigam Limited vs Trimax It Infrastructure And on 21 February, 2018

Bombay High Court 



माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 34 का विवरण : 

माध्यस्थम् पंचाट अपास्त करने के लिए आवेदन-(1) माध्यस्थम् पंचाट के विरुद्ध, न्यायालय का आश्रय केवल उपधारा (2) या उपधारा (3) के अनुसार, ऐसे पंचाट को अपास्त करने के लिए आवेदन करके ही लिया जा सकेगा ।

(2) कोई माध्यस्थम् पंचाट न्यायालय द्वारा तभी अपास्त किया जा सकेगा, यदि-

(क) आवेदन करने वाला पक्षकार यह सबूत देता है कि-

(i) कोई पक्षकार किसी असमर्थता से ग्रस्त था, या

(ii) माध्यस्थम् करार उस विधि के, जिसके अधीन पक्षकारों ने उसे किया है या इस बारे में कोई संकेत न होने पर, तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन विधिमान्य नहीं है ; या

(iii) आवेदन करने वाले पक्षकार को, मध्यस्थ की नियुक्ति की या माध्यस्थम् कार्यवाहियों की उचित सूचना नहीं दी गई थी, या वह अपना मामला प्रस्तुत करने में अन्यथा असमर्थ था ; या

(iv) माध्यस्थम् पंचाट ऐसे विवाद से संबंधित है जो अनुध्यात नहीं किया गया है या माध्यस्थम् के लिए निवेदन करने के लिए रख गए निबंधनों के भीतर नहीं आता है या उसमें ऐसी बातों के बारे में विनिश्चय है जो माध्यस्थम् के लिए निवेदित विषयक्षेत्र से बाहर है :

परन्तु यदि, माध्यस्थम् के लिए निवेदित किए गए विषयों पर विनिश्चयों को उन विषयों के बारे में किए गए विनिश्चयों से पृथक् किया जा सकता है, जिन्हें निवेदित नहीं किया गया है, तो माध्यस्थम् पंचाट के केवल उस भाग को, जिसमें माध्यस्थम् के लिए निवेदित न किए गए विषयों पर विनिश्चय है, अपास्त किया जा सकेगा ; या

(v) माध्यस्थम् अधिकरण की संरचना या माध्यस्थम् प्रक्रिया, पक्षकारों के करार के अनुसार नहीं थी, जब तक कि ऐसा करार इस भाग के उपबंधों के विरोध में न हो और जिससे पक्षकार नहीं हट सकते थे, या ऐसे करार के अभाव में, इस भाग के अनुसार नहीं थी ; या

(ख) न्यायालय का यह निष्कर्ष है कि-

(i) विवाद की विषय-वस्तु, तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन माध्यस्थम् द्वारा निपटाए जाने योग्य नहीं हैं ; या

(ii) माध्यस्थम् पंचाट भारत की लोक नीति के विरुद्ध है ।

स्पष्टीकरण-उपखंड (ii) की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, किसी शंका को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि कोई पंचाट भारत की लोक नीति के विरुद्ध है यदि पंचाट का दिया जाना कपट या भ्रष्ट आचरण द्वारा उत्प्रेरित या प्रभावित किया गया था या धारा 75 अथवा धारा 81 के अतिक्रमण में था ।

(3) अपास्त करने के लिए कोई आवेदन, उस तारीख से, जिसको आवेदन करने वाले पक्षकार ने माध्यस्थम् पंचाट प्राप्त किया था, या यदि अनुरोध धारा 33 के अधीन किया गया है तो उस तारीख से, जिसको माध्यस्थम् अधिकरण द्वारा अनुरोध का निपटारा किया गया था, तीन मास के अवसान के पश्चात् नहीं किया जाएगा :परन्तु यह कि जहां न्यायालय का यह समाधान हो जाता है कि आवेदक उक्त तीन मास की अवधि के भीतर आवेदन करने से पर्याप्त कारणों से निवारित किया गया था तो वह तीस दिन की अतिरिक्त अवधि में आवेदन ग्रहण कर सकेगा किन्तु इसके पश्चात् नहीं ।

(4) उपधारा (1) के अधीन आवेदन प्राप्त होने पर, जहां यह समुचित हो और इसके लिए किसी पक्षकार द्वारा अनुरोध किया जाए, वहां न्यायालय, माध्यस्थम् अधिकरण को इस बात का अवसर देने के लिए कि वह माध्यस्थम् कार्यवाहियों को चालू रख सके या ऐसी कोई अन्य कार्रवाई कर सके जिससे माध्यस्थम् अधिकरण की राय में माध्यस्थम् पंचाट के अपास्त करने के लिए आधार समाप्त हो जाएं, कार्यवाहियों को उतनी अवधि के लिए स्थगित कर सकेगा जो उसके द्वारा अवधारित की जाएं ।



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